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2021 तक दिल्ली को बनाएंगे कॉर्निया अन्धता-मुक्त : आलोक कुमार

IMG-20190921-WA0063दिल्ली एनसीआर क्षेत्र को कॉर्नियल अन्धता मुक्त बनाने के लिए दधीचि देहदान समिति ने 2021 तक का लक्ष्य रखा है। दधीचि देहदान समिति के संरक्षक और संस्थापक माननीय आलोक कुमार ने दिल्ली के हरियाणा भवन में आयोजित दिल्ली जर्नलिस्ट एसोसिएशन के कार्यक्रम में ये खुलासा किया। आलोक कुमार ने बताया कि दिल्ली में दो बड़े अस्पताल एम्स और गुरुनानक नेत्र चिकित्सालय में कॉर्निया अंधता का इलाज नेत्रदान के माध्यम से किया जाता है। यहां वर्तमान प्रतीक्षा सूची क्रमश: 2 हजार और 1 हजार है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दधीचि देहदान समिति व्यापक स्तर पर जनजागरण अभियान चलाएगा। देहदान- वर्तमान समय की आवश्यकता विषय पर आयोजित संवाद कार्यक्रम में भिन्न मीडिया संस्थानों के पत्रकारों के समक्ष आलोक कुमार ने बताया कि भारतीय परम्पराओं और मान्यताओं में ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया’ की अवधारणा बताती है कि आज हमारे समाज को स्वस्थ रहने के लिए उसी अवधारणा पर चलने की नितांत आवश्यकता है, जिसका एकमात्र समाधान है अंगदान और देहदान। आलोक कुमार ने कहा कि देहदान विश्व में सर्वोच्च महादान है, और मृत्यु के पश्चात भी यदि मानवता के कार्य में इस देह का उपयोग हो जाए, तो इससे बड़ा पुण्यकर्म कोई हो नहीं सकता।
7 दिन के नवजात का सबसे बड़ा महादान- आलोक कुमार
बीते दशक में बढ़ा देहदान और अंगदान का आंकड़ा- आलोक कुमार
देहदान नहीं आता मोक्ष के आड़े- आलोक कुमार
देहदान और अंगदान को लेकर भ्रम दूर करना ज़रूरी- आलोक कुमार 
धार्मिक मान्यताओ के सम्मत है देहदान और अंगदान- आलोक कुमार 
IMG-20190921-WA0067आलोक कुमार जी के अनुसार 22 वर्ष पहले संस्था ने इस पुनीत कार्य की शुरुआत की, जिसमें अब तक 900 से अधिक नेत्रदान के साथ साथ सम्पूर्ण शरीर के 275 दान सम्पन्न किए जा चुके हैं। ये आंकड़ा 2010 के बाद का है। आलोक कुमार ने कहा कि वर्तमान समय में मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में देहदान व अंगदान की समुचित और सुचारू व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे सामान्य जन, स्वयं की प्रेरणा से अंगदान व देहदान का संकल्प ले सकें। आलोक कुमार के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया में परिवार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसीलिए जो भी संकल्प लेना चाहें, उन्हें परिवार की सहमति लेनी चाहिए। समिति इस मामले के सभी तकनीकि पहलुओं पर काम करती है, इसीलिए मस्तिष्क-मृत्यू की अवस्था में निश्चित समयावधि में मृतक के अंगों को जरूरतमंदों तक पहुंचा दिया जाता है। समिति केवल सरकारी संस्थानों को ही अंग या देह पहुंचाती है। सामान्य मुत्यू की अवस्था में भी नेत्रों, त्वचा व हड्डियों के दान के लिए शुरुआती कुछेक घंटों का समय महत्वपूर्ण रहता है। समाज के एक वर्ग में अंगदान या देहदान को लेकर धार्मिक मान्यताओँ के कारण विरोध भी रहता है। आलोक कुमार के अनुसार समिति के प्रयासों से ज्यादातर धर्मगुरुओं ने अपनी सार्वजनिक सभाओं में देहदान व अंगदान को धर्म सम्मत बताना शुरु किया है, जिससे समाज में बीते कुछ वर्षों से इस विषय में जागरुकता बढ़ी है। इसीलिए लगभग 3 साल पहले सिर्फ 7 दिन के बच्चे का सबसे बड़ा देहदान हुआ। इसी कारण राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने दधीचि देहदान समिति के कार्यक्रम में उस बच्चे के पिता को राष्ट्रपति भवन में मंच पर बुलाकर सम्मानित भी किया।  इस कार्यक्रम में समिति के महामंत्री कमल खुराना और उपाध्यक्ष विशाल चड्ढा उपस्थित थे। दिल्ली जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष अनुराग पुनेठा, महासचिव सचिन बुधौलिया और उपाध्यक्ष अतुल गंगवार ने कार्यक्रम का संचालन किया। इस अवसर पर नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट (इंडिया) के महासचिव मनोज वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार अनिल पांडे, आलोक गोस्वामी, आदित्य भारद्वाज, निशि भाट, राज चावला, मनीष ठाकुर, श्याम किशोर, विकास कौशिक समेत कई पत्रकार मौजूद रहे।
जागरुकता की कमी
 भारत में जागरुकता की कमी के कारण बहुत कम अंगदान हो रहा है, जबकि अंगदान की कमी के कारण प्रति वर्ष लगभग पांच लाख लोगों की मौत हो रही है। ऐसा तब है जब दुर्घटनाओं के कारण प्रति वर्ष भारी संख्या में लोग ‘ब्रेन डेड’ हो जाते हैं जिनके अंगों का दान करवाकर लाखों लोगों की जिंदगी को बचाया जा सकता है।विशेषज्ञों का कहना है कि अंगदान के लिए विशेष अभियान चलाकर जागरुकता उत्पन्न करने की कोशिश की जानी चाहिए जिससे लोग इसके लिए आगे आएं। प्रति वर्ष 13 अगस्त को अंगदान दिवस मनाया जाता है।

बहुत कम है अंगदान करने वालों की संख्या

जागरुकता की कमी के कारण भारत में अंगदान करने से लोग अब भी हिचकते हैं। धार्मिक या सामाजिक कारणों से लोग अंगदान करने से बचते हैं। यही कारण है कि अंगदान करने के मामले में भारत दुनिया में बेहद पिछड़ा हुआ है। यहां प्रति दस लाख की आबादी पर केवल 0.5 लोग अंगदान करते हैं। जबकि प्रति दस लाख की आबादी पर स्पेन में 36 लोग, क्रोएशिया में 35 और अमेरिका में 27 लोग अंगदान करते हैं।  ‘ब्रेन डेड’ या ‘मानसिक मृत’ हो चुके लोगों के परिवार जन भी अंगदान करने से बचते हैं जबकि यह निश्चित हो जाता है कि ऐसे लोगों का जीवनकाल बढ़ाना अब संभव नहीं है। यही कारण है कि इस मामले में भी अंगदान बहुत कम हो रहा है। वर्ष 2018 में महाराष्ट्र में 132, तमिलनाडु में 137, तेलंगाना में 167 और आंध्रप्रदेश में 45 और चंडीगढ़ में केवल 35 अंगदान हुए।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

जागरुकता की कमी के कारण भारत में अंगदान की कमी के कारण लाखों लोगों की मौत हो जाती है। हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए लगभग 50 हजार और फेफड़ों के ट्रांसप्लांट के लिए 20 हजार लोगों की प्रतीक्षा सूची सरकार के पास उपलब्ध रहती है। लेकिन अंगदाताओं की कमी के कारण इनमें से बहुतों को बचा पाना संभव नहीं होता।  सरकार ने अंगदान कराने के लिए काफी प्रयास भी किये हैं, लेकिन ये कारगर नहीं हुए हैं। अगर शीर्ष फिल्मी-सामाजिक हस्तियों से इसके बारे में प्रचार कराया जाए तो अंगदान बढ़ाया जा सकता है। सरकार को कानून बनाने के साथ उसके अनुपालन पर भी ध्यान देना चाहिए।

अंगदान की कमी के कारण मरते हैं पांच लाख लोग

एक आंकड़े के मुताबिक अंगदान की कमी के कारण अकेले भारत में प्रति वर्ष पांच लाख लोग मर जाते हैं। एनसीआरबी की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015 में रेल, बसों, ट्रकों या अन्य तरीके से कुल 496,762 दुर्घटनाएं हुई।इनमें सड़क हादसों की संख्या 4,64,674 थी। इन सड़क हादसों में कुल 148,707 लोगों की जान गई। डॉक्टरों का कहना है कि दुर्भाग्य से यही वे लोग हैं जिनका अंगदान कराया जा सकता है और इसके माध्यम से लाखों लोगों की जिंदगी बचाया जा सकता है।
दुर्घटना के कारण हुई मौत के बाद परिवार जनों की भावनाओं का ख्याल करते हुए उन्हें अंगदान के लिए तैयार करवाना काफी मुश्किल भरा काम होता है। कई अस्पताल इस मुश्किल की घड़ी में परिवार जनों की काउंसलिंग कर उन्हें अंगदान के लिए तैयार करवाने के लिए विशेष काउंसल की नियुक्ति करते हैं।
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