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पद्मिनी तथ्यों के आईने में

गत दशकों में राजस्थान की पद्मिनी या पद्मावती रानी का नाम अनेक प्रकार के विवादों के झुरमुट में से उभरकर जनमानस में फिर छा गया था, जिसका कारण था इस नाम से फिल्म का निर्माण जिसमें पद्मिनी को परम सुंदरी चित्रित किया गया. उसका चेहरा दर्पण में देखकर दिल्ली के सुलतान अलाउद्दीन खिलजी के विभोर हो जाने की चमत्कारी घटना और अंत में रानियों के जौहर नाम से आत्मदाह करने के प्रसंग को फिल्म की सफलता का तावीज माना जा रहा था लेकिन राजपूत समाज का इसके विरोध में आंदोलन इस आधार पर चलाना बहुचर्चित रहा कि इसमें अनेक चित्रण अप्रामाणिक हैं.

प्रामाणिक क्या है, यह आज किसी को नहीं मालूम क्योंकि इतिहास के साथ मिथक, काव्य-कथाएं, कल्पनाएं आदि पूरी तरह घुल-मिल जाती हैं. इतिहास तो यह जानता है कि दिल्ली के सुलतान अलाउद्दीन खिलजी (शासनकाल 1296-1316) ने विश्व के विशालतम किलों में अग्रणी चित्तौड़ किले पर आक्रमण किया था, सुदीर्घ घेराबंदी के बाद विजय प्राप्त की थी, अनेक राजपूत शहीद हुए थे, अनेक रानियों ने जौहर किया था. यह घटना 1303 में हुई थी.

इसे सुललित कथा बनाने का श्रेय जाता है मलिक मुहम्मद जायसी को जिन्होंने लगभग ढाई सदी बाद मेवाड़ के राजा रत्नसेन और सिंहल की राजकुमारी पद्मावती की प्रेमकथा पद्मावत महाकाव्य में लिख दी, दूत के रूप में एक तोता हीरामन और ब्राह्मण राघव चेतन वर्णित कर दिया. यह महाकाव्य कालजयी हो गया है, अतः इसकी चर्चा आवश्यक नहीं. सन् 1540 के इस काव्य के बाद चित्तौड़ की घटनाओं को अपभ्रंश आदि भाषाओं में अनेक कवियों ने निबद्ध किया.

इसमें रानी का नाम पद्मिनी रखा, उस समय के राजपूत योद्धाओं गोरा, बादल आदि का वर्णन किया, रत्नसेन और पद्मिनी की प्रेमकथा लिखी. इसके साथ पद्मिनी के शौर्य का वर्णन भी किया कि किस प्रकार उसके सौंदर्य से आकर्षित सुलतान को भुलावा देने के लिए अनेक पालकियों में छिपकर राजपूत गए, सुलतान के बंदी बनाए रत्नसेन को ऐन वक्त पर छुड़वा लिया, युद्ध हुआ, हार के बाद शाका और जौहर हुआ आदि. ऐसी गाथाओं में तथ्य और मिथक जिस प्रकार घुल-मिल जाते हैं, सभी जानते हैं कि उनका नीर-क्षीर विवेक कठिन ही नहीं, असंभव-सा है.

इतना-सा तो सामान्य बुद्धि से भी समझ आ जाता है कि चित्तौड़ के किले में सुलतान का दर्पण से पद्मिनी का चेहरा देखना, उस पर रीझकर सब कुछ करने को तैयार हो जाना आदि मिथक ही होंगे, क्योंकि 1303 में घर-घर में दर्पण होते ही नहीं थे. लेकिन फिल्म या काव्यगाथाओं के लिए ऐसी घटनाओं के दृश्य संजीवनी का काम करते हैं. पिछले दिनों इन सबमें प्रामाणिक-अप्रामाणिक की छानबीन के लिए अनेक प्रयत्न हुए हैं. कुछ मध्यकालीन गाथाओं की पांडुलिपियों की तलाश भी हुई है और वे छपी भी हैं.

इस पृष्ठभूमि में राजस्थान के पुरातत्व, मध्यकालीन इतिहास और संत साहित्य के विशेषज्ञ ब्रजेंद्रकुमार सिंहल की हाल ही छपी किताब रानी पद्मिनीः चित्तौड़ का प्रथम जौहर तत्कालीन इतिहास और वस्तुस्थिति पर प्रकाश डालने वाली बहुमूल्य सामग्री लेकर अवतीर्ण हुई है. इसमें इस इतिहास से संबंधित दो गाथा पुस्तकों का मूलपाठ (जो तत्कालीन भाषा और शैली, अपभ्रंश में निबद्ध हैं) उद्धृत है, सिंहल ने उसका हिंदी अनुवाद किया है. जो पद्मिनी कथा पर प्रकाश डालने वाली सामग्री है, साथ ही अपनी विस्तृत भूमिका में लेखक ने प्रामाणिक विवेचन किया है कि जायसी से लेकर अब तक उपलब्ध गाथाओं में जो सामग्री है, उसमें तथ्यों का विश्लेषण अन्य इतिहास ग्रंथों के आधार पर किस प्रकार किया जा सकता है.

ये दोनों मूल पुस्तकें हैं अज्ञात का विकृत पद्मिनी समिओ और जटमल का विकृत गोरा बादल कथा. दोनों सत्रहवीं सदी के पूर्वार्ध में लिखी गई थीं और ग्रंथागारों में उनकी पांडुलिपियां संग्रहीत थीं. पद्मिनी समिओ में 158 पद्यों में और गोरा बादल कथा में 146 पद्यों में चित्तौड़ के युद्ध आदि का इतिहास उस समय की अपभ्रंशानुकारिणी भाषा में वर्णित मिलता है. भूमिका में लेखक ने स्पष्ट किया है कि पद्मिनी समिओ (पद्मिनी चरित्र) में रतनसी (रत्नसेन) और पद्मिनी का प्रेम, राघव चेतन की कुटिल भूमिका, पद्मिनी को पाने के लिए सुलतान का आक्रमण, पद्मिनी का बादल की सहायता से पालकियों में बैठकर राजपूतों को सुलतान के पास ले जाना, वहां से रत्नसेन को छुड़ाना, युद्ध होना, रत्नसेन का जीतना आदि वर्णित हैं.

गोरा बादल कथा में रत्नसेन की निर्बलता भी है. सुलतान रत्नसेन को बंदी बनाता है, रोज कोड़े लगवाता है, पद्मिनी सौंपने को बाध्य करता है तो वह मान जाता है. इस पर पद्मिनी खिन्न होती है. गोरा बादल की सहायता से युद्ध होता है, गोरा शहीद होता है लेकिन बादल जीतता है. पद्मिनी प्रसंग जिन गाथाओं में आया है उन सबका तुलनात्मक अध्ययन विस्तृत भूमिका में है और कई तथ्यों के प्रमाण भी. गौरीशंकर हीराचंद ओझा गोरा बादल को एक ही पात्र मानते हैं, बादल नाम है, गोरा सरनेम.

पद्मिनी सिंहलद्वीप के राजा की पुत्री बताई गई है. यह द्वीप कहां है, इस पर मतभेद हैं. कुछ लोग सीलोन (श्रीलंका) को सिंहल मानते हैं जबकि प्रबुद्ध इतिहासकारों ने इसे मरुभूमि के आसपास बताया है. रामचंद्र शुक्ल का भी यही मत है. सिंहल ने सिद्ध किया है कि रणथंभौर ही सिंहल के रूप में वर्णित है. वहां के राजा हमीर की पुत्री थी पद्मिनी. इसके प्रमाण भी दिए गए हैं. सिंहल का सिंहल पर यह अभिमत मान्य होगा, ऐसी आशा है.

लेखक ने एक प्रबंध निबंध में सहगमन (सती होना) जौहर और शाका पर रोशनी डाली है. किताब के शीर्षक चित्तौड़ का प्रथम जौहर से जिज्ञासा जगनी स्वाभाविक है. शोधलेख में स्पष्ट किया गया है कि पहला जौहर 1303, दूसरा 1535 और तीसरा 1568 में चित्तौड़ में हुआ. जौहर क्या है? स्त्रियों का आत्मदाह जौहर कहलाया और पुरुषों का शाका.

इस तरह दो गाथाओं के मूल सहित अनुवाद, विस्तृत भूमिका और शोधलेख के जरिए सिंहल ने पद्मिनी की कथा का सारा ब्यौरा, इतिहास और वस्तुस्थिति का विश्लेषण अच्छी तरह से पेश कर दिया है, जो शोधार्थियों और सामान्य पाठकों के लिए भी उपयोगी है.

आज के परिप्रेक्ष्य में यह ग्रंथ सब तरह के पाठकों के लिए उपयोगी सामग्री पेश कर कई तरह की जिज्ञासाओं को शांत करेगा और शोध के नए क्षितिज को रोशन करेगा.

रानी पद्मिनीः चित्तौड़ का प्रथम जौहर

लेखकः ब्रजेंद्र कुमार सिंहल

प्रकाशकः वाणी प्रकाशन

कीमतः 600 रु.

—कलानाथ शास्त्री

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