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तो पाकिस्तान में कृष्ण मंदिर का निर्माण इस्लाम के ख़िलाफ़….

pakistan mandirपाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में पहले हिंदू मंदिर के निर्माण की पहल हुई ही थी कि इसे लेकर विवाद भी खड़ा हो गया है.कुछ दिनों पहले इस्लामाबाद कैपिटल डेवलपमेंट अथॉरिटी ने मंदिर के लिए ज़मीन दी थी लेकिन मज़हबी शिक्षा देने वाली संस्था जामिया अशर्फ़िया मदरसा के एक मुफ़्ती ने इसके ख़िलाफ़ फ़तवा जारी कर दिया है. इतना ही नहीं, मंदिर का निर्माण रोकने के लिए एक वकील हाईकोर्ट तक पहुंच गए हैं.23 जून को एक साधारण कार्यक्रम में सांसद और मानवाधिक मामलों के संसदीय सचिव लाल चंद माल्ही को मंदिर निर्माण के ऐतिहासिक काम की निगरानी के लिए नियुक्त किया गया था.20 हज़ार स्क्वायर फ़ीट की ये ज़मीन वैसे तो साल 2017 में ही एक स्थानीय हिंदू समिति को सौंपी गई थी लेकिन प्रशासनिक वजहों से मंदिर निर्माण का काम अटका हुआ था.मंदिर निर्माण के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी करने वाली संस्था जामिया अशर्फ़िया लाहौर की देवबंदी इस्लामिक संस्था है. ये साल 1947 में पाकिस्तान के जन्म के साथ ही अस्तित्व में आई थी और तब से इस संस्था से हज़ारों देवबंदी छात्र इस संस्थान से पढ़कर निकले हैं.जामिया अशर्फ़िया को पाकिस्तान में देवबंदी शिक्षा के सबसे अहम संस्थानों में से एक माना जाता है और दुनिया भर के लोग यहां इस्लामी शिक्षा लेने आते हैं. जामिया अशर्फ़िया के प्रवक्ता के अनुसार मंदिर निर्माण के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी करने वाले मुफ़्ती मुहम्मद ज़कारिया पिछले दो दशकों से संस्थान से जुड़े हैं.उनके फ़तवे को एक अन्य वरिष्ठ मुफ़्ती ने अपना समर्थन दिया है. इस फ़तवे में मुहम्मद ज़कारिया ने कहा है कि इस्लाम में अल्पसंख्यकों के धर्मस्थलों की देखभाल करना और उन्हें चलाना तो ठीक है लेकिन नए मंदिरों और नए धर्मस्थलों के निर्माण की इजाज़त इस्लाम में नहीं है.

उन्होंने अपने फ़तवे में कुछ ऐतिहासिक संदर्भों और लेखों का उदाहरण भी दिया है.  मुफ़्ती मुहम्मद ज़कारिया ने कहा कि उन्होंने लोगों के सवालों के बाद ये फ़तवा जारी किया है.उन्होंने कहा, “हम कुरान और सुन्ना के ज़रिए लोगों का मार्गदर्शन करने की कोशिश करते हैं. हम अपने मन से कुछ भी नहीं बोलते. मेरी समझ है कि एक इस्लामी मुल्क में नए मंदिर और या कोई अन्य धर्मस्थल बनाना ग़ैर-इस्लामी है.”अगर सरकार ने उनकी बात नहीं सुनी तो वो क्या करेंगे? इसके जवाब में उन्होंने कहा, “हमारे पास सरकार से अपनी बात मनवाने की ताकत नहीं है. हम सिर्फ़ धर्म के आधार पर उसे समझाने की कोशिश कर सकते हैं और हमने अपना काम कर दिया है.”जामिया अशर्फ़िया के प्रवक्ता मौलाना मुजीबुर्रहमान इंक़लाबी ने बीबीसी से कहा कि फ़तवा जारी करने का मक़सद किसी का विरोध करना नहीं बल्कि कुछ लोगों के सवालों का जवाब देना था. उन्होंने कहा कि मुफ़्तियों ने इस्लाम की जानकारी के अनुसार लोगों की शंकाओं का समाधान करने की पूरी कोशिश की है.

‘मंदिर बनना पवित्र मदीना का अपमान’

pakistan temple noमंदिर और इसके ख़िलाफ़ जारी हुए फ़तवे को लेकर पाकिस्तान से अलग-अलग तरह की राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं. पंजाब विधान सभा के स्पीकर और पाकिस्तान मुस्लिम लीग वरिष्ठ नेता परवेज़ इलाही ने मुफ़्ती मुहम्मद ज़कारिया के फ़तवे का समर्थन किया है.अपने मीडिया सेल के ज़रिए जारी किए गए एक वीडियो में परवेज़ इलाही ने कहा है कि पाकिस्तान को इस्लाम के नाम पर बनाया गया था और राजधानी इस्लामाबाद में नए मंदिर का निर्माण न सिर्फ़ इस्लामी भावना के ख़िलाफ़ है बल्कि पैगंबर मोहम्मद के बनाए मदीना शहर का भी अपमान है.उन्होंने ये भी कहा कि मक्का पर फ़तह पाने के बाद पैगंबर मोहम्मद ने काबा की 300 मूर्तियों को नष्ट कर दिया था. परवेज़ इलाही ने कहा कि वो और उनकी पार्टी अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा का समर्थन करते हैं लेकिन साथ ही ये भी मानते हैं कि नए मंदिर बनाए जाने के बजाय पहले से मौजूद मंदिरों की देखभाल की जानी चाहिए.परवेज़ इलाही वही नेता हैं जिन्होंने पंजाब के मुख्यमंत्री के तौर पर कटासराज मंदिर का जीर्णोद्धार शुरू करवाया था.वहीं, प्रधानमंत्री इमरान ख़ान लगातार कहते रहे हैं कि पाकिस्तान में उनकी सरकार अल्पसंख्यकों को बराबर के अधिकार दिलाएगी.

इस्लामाबाद में मंदिर की मांग

पाकिस्तान में लगभग 80 लाख हिंदू रहते हैं. दक्षिणी सिंध प्रांत के उमरकोट, मीरपुर ख़ास और थारपाकर में अच्छी-खासी संख्या में हिंदू रहते हैं. वहीं, इस्लामाबाद में लगभग 3,000 हिंदू रहते हैं.इस्लामाबाद हिंदू पंचायत के पूर्व अध्यक्ष प्रीतम दास उन चंद लोगों में से हैं जो साल 1973 थारपाकर से इस्लामाबाद आए थे.वो बताते हैं, “मैं उन चंद शुरुआती लोगों में से था जो नई राजधानी इस्लामाबाद में आए थे. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यहां हिंदू लोगों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है.”इस्लामाबाद के गांव सैदपुर में एक छोटी से मूर्ति थी जिसे उस वक्त संरक्षित किया गया जब गांव को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया गया. लेकिन प्रीतम दास के मुताबिक़ ये सिर्फ़ एक सांकेतिक मूर्ति है जो इस्लामाबाद में बढ़ती हिंदू आबादी की पूजा-अर्चना के लिए नाकाफ़ी है.उहोंने कहा, “इस्लामाबाद में हिंदुओं के लिए पूजा-पाठ करना और रीति-रिवाज निभाना बेहद मुश्किल होता है. जैसे, पहले यहां श्मशान नहीं था जिसकी वजह से हमें शवों के अंतिम संस्कार के लिए उन्हें दूसरे शहरों में ले जाना पड़ता था. यहां कोई सामुदायिक केंद्र भी नहीं था जिसकी वजह से हमें होली-दिवाली जैसे त्योहार मनाने में भी मुश्किल होती थी. इस मंदिर का बनना हमारी पुरानी मांग थी और मुझे ख़ुशी है कि आख़िरकार सरकार ने हमारी आवाज़ सुन ली है.”

इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने पाकिस्तान की राजधानी में एक कृष्ण मंदिर के निर्माण के ख़िलाफ़ दायर याचिकाओं को प्रभावहीन बताते हुए ख़ारिज कर दिया है.इन याचिकाओं पर फ़ैसला सुनाते हुए इस्लामाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस आमिर फ़ारूक़ ने कहा कि ‘राजधानी विकास प्राधिकरण (सीडीए) के अध्यक्ष और बोर्ड के सदस्यों के पास राजधानी के भीतर किसी भी धार्मिक स्थल को ज़मीन देने की शक्तियाँ हैं और मंदिर के लिए ज़मीन राजधानी के मास्टर प्लान के अनुसार दी गई है, इसलिए अदालत याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाये गए बिंदुओं को ख़ारिज करती है.’फ़ैसला पढ़ते हुए, जस्टिस आमिर फ़ारूक़ ने कहा कि ‘इन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान उन्हें बतलाया गया कि इस्लामाबाद और रावलपिंडी में तीन हिन्दू मंदिर हैं जो इन दो शहरों में रहने वाली हिन्दू आबादी की ज़रूरतों के लिए पर्याप्त हैं.’उन्होंने बताया कि कोर्ट में यह दलील भी दी गई कि महामारी के दौरान जब देश की अर्थव्यवस्था पहले से ही सिकुड़ रही है, तब कृष्ण मंदिर के निर्माण के लिए करोड़ों रुपये ख़र्च करना राष्ट्रीय ख़ज़ाने को बर्बाद करने के समान है.अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा है कि ‘मंदिर निर्माण के लिए अभी तक कोई धनराशि जारी नहीं की गई है और सरकार ने पहले ही इस विषय पर इस्लामिक वैचारिक परिषद से सुझाव लेने की बात कही है.’पाकिस्तान के कुछ मौलवियों द्वारा यह दलील दी गई थी कि ‘उनके यहाँ की इस्लामिक सरकार धार्मिक नज़रिये से किसी मंदिर के निर्माण के लिए फंड नहीं दे सकती.’

मंदिर निर्माण के ख़िलाफ़ थीं तीन याचिकाएं

अदालत ने अपने निर्णय में कहा है कि ‘पाकिस्तान के संविधान में दिये अनुच्छेद-20 के तहत, देश में रहने वाले सभी अल्पसंख्यकों को स्वतंत्र रूप से अपने धार्मिक संस्कार करने का अधिकार है.’अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा है कि ‘मंदिर निर्माण के ख़िलाफ़ दायर हुई इन याचिकाओं में उठाये गए बिन्दुओं के मद्देनज़र, अदालत मानती है कि वो इस मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकती, इसलिए इनका निपटारा किया जाता है. हालांकि, अगर भविष्य में याचिकाकर्ताओं को लगता है कि उनके अधिकारों का किसी भी तरह से उल्लंघन हुआ है तो वे फिर से अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं.’ग़ौरतलब है कि इस्लामाबाद में कृष्ण मंदिर के निर्माण को रोकने के लिए कोर्ट में तीन याचिकाएं दायर की गई थीं और यह मुद्दा बनाया गया था कि मंदिर का निर्माण इस्लामाबाद के मास्टर प्लान में शामिल नहीं था.पाकिस्तान में मानवाधिकारों के संसदीय सचिव और इमरान ख़ान की सत्ताधारी तहरीक़-ए-इंसाफ़ पार्टी (पीटीआई) के सदस्य लाल चंद मल्ही ने अदालत के निर्णय का स्वागत किया है.उन्होंने ट्विटर पर लिखा है, “रिपोर्टों से पता चलता है कि मंदिर के निर्माण के ख़िलाफ़ दायर हुईं याचिकाएं ख़ारिज कर दी गई हैं और इस्लामाबाद हिन्दू पंचायत को निर्माण से पहले क़ागज़ी औपचारिकताएं पूरी करने के लिए कहा गया है. हिन्दू समुदाय अदालत के फ़ैसले का स्वागत करता है और ईमानदारी से इसका पालन करने की कसम खाता है.”

विवाद शुरू कैसे हुआ?

पिछले सप्ताह पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में कृष्ण मंदिर के निर्माण पर विवाद ने तब एक नया मोड़ ले लिया था, जब इसकी चारदीवारी के निर्माण का काम रोका गया.

कई दिनों से सोशल मीडिया पर अटकलें लगाई जा रही थीं कि धार्मिक भेदभाव की वजह से मंदिर के निर्माण का काम रोका गया है, लेकिन सीडीए ने ऐसी तमाम अटकलों का खंडन किया है. सीडीए के प्रवक्ता मज़हर हुसैन ने कहा कि ‘मंदिर का निर्माण कार्य बिल्डिंग प्लान (नक्शा) जमा ना कराये जाने के कारण रोका गया है. सीडीए को अब तक नक्शा नहीं मिला है. इसलिए ये कहना सही होगा कि मंदिर निर्माण का काम स्थगित कर दिया गया है.’उन्होंने कहा कि मंदिर भवन का प्लान मिलने पर निर्माण की इजाज़त दे दी जाएगी. सीडीए के अध्यक्ष आमिर अहमद अली ने कहा कि ‘इस्लामाबाद के सेक्टर-एच 9 में मंदिर के लिए भूमि का आवंटन करने पर कोई विवाद नहीं था. कुछ साल पहले भूमि हिन्दू समुदाय को सौंप दी गई थी. हालांकि, निर्माण कार्य के लिए आगे बढ़ने से पहले समुदाय द्वारा बिल्डिंग प्लान के लिए मंज़ूरी लेना ज़रूरी था.’कुछ मीडिया रिपोर्ट्स को बेबुनियाद बताते हुए, सीडीए के अध्यक्ष ने कहा कि ‘मंदिर का निर्माण कार्य रोका नहीं गया था, बल्कि उसे निलंबित कर दिया गया है. सीडीए स्टाफ़ निर्माण की अनुमति देने से पहले भूमि पर सीमांकन की समीक्षा करेगा.’लाल चंद मल्ही का कहना है कि ‘इस्लामाबाद हिन्दू पंचायत फ़िलहाल आवंटित भूमि पर सिर्फ़ अपनी एक दीवार खड़ी करना चाहती थी. मई के महीने में इस संबंध में सीडीए को एक अनुरोध पत्र भेजा गया था, लेकिन संबंधित अधिकारियों से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है.’लाल चंद के अनुसार, परियोजना से संबंधित सभी दस्तावेज़ धार्मिक मामलों के मंत्रालय के माध्यम से प्रधानमंत्री कार्यालय को प्रस्तुत किए गए हैं.

राजनीतिक और धार्मिक दलों का विरोध

पाकिस्तान में लगभग 8,00,000 हिन्दू हैं. अधिकांश हिन्दू परिवार सिंध प्रांत में रहते हैं, जबकि राजधानी इस्लामाबाद में रहने वाले हिंदुओं की संख्या लगभग 3,000 है.जब से पाकिस्तान की केंद्र सरकार ने इस मंदिर परियोजना के लिए ज़मीन दी है, तभी से धार्मिक हलकों में इसका विरोध हो रहा है.लाहौर के जामिया अशरफ़िया के मुफ़्ती मोहम्मद ज़कारिया ने मंदिर के निर्माण पर फ़तवा जारी करते हुए कहा कि ‘इस्लाम के अनुसार अल्पसंख्यकों के लिए पूजा स्थलों को बनाए रखना और उन्हें बहाल करना जायज़ है, लेकिन नए मंदिर नहीं बनाये जा सकते हैं.’सोशल मीडिया पर भी मंदिर के निर्माण का विरोध करने वाले अधिकांश लोग यह तर्क दे रहे हैं कि हिंदू मंदिर के निर्माण का पैसा सरकारी ख़ज़ाने से नहीं जाना चाहिए क्योंकि यह एक इस्लामिक देश है और इस्लामाबाद में हिन्दुओं की संख्या भी बहुत कम है.दूसरी ओर, धार्मिक मामलों के संघीय मंत्री नूरुल-हक़ क़ादरी ने भी मंदिर के निर्माण के संबंध में एक बयान जारी किया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि ‘इस परियोजना के लिए इस्लामिक वैचारिक परिषद की सिफ़ारिशों के अनुसार ही धन आवंटित किया जाएगा.’

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने 27 जून को अल्पसंख्यक प्रतिनिधिमंडल के साथ अपनी बैठक में मंदिर परियोजना के पहले चरण के लिए 10 करोड़ पाकिस्तानी रुपये के आवंटन को मंज़ूरी देने पर सहमति व्यक्त की.इस मंदिर परियोजना का राजनीतिक विरोध भी हुआ है. इमरान ख़ान की सरकार के गठबंधन सहयोगियों में से एक और पंजाब विधानसभा के स्पीकर चौधरी परवेज़ इलाही ने मंदिर के निर्माण का विरोध करते हुए कहा कि ‘नए मंदिरों का निर्माण करना इस्लाम की भावना के ख़िलाफ़ है.’हालांकि, उन्होंने कहा कि सरकार को हिन्दू समुदाय की सुविधा और उनकी श्रद्धा को ध्यान में रखते हुए मौजूदा मंदिरों को बहाल करना चाहिए और उनकी मरम्मत करवानी चाहिए.कुछ राजनेता और सोशल मीडिया यूज़र नए मंदिर के निर्माण के विचार का समर्थन भी कर रहे हैं. विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री फ़वाद चौधरी ने एक ट्वीट में लिखा है कि “यह अल्पसंख्यकों के प्रति सहिष्णुता और सद्भावना का प्रतीक होगा.”इस बीच लाल चंद ने आरोप लगाया कि मंदिर के निर्माण स्थल पर तोड़फोड़ की गई हैउन्होंने अपने एक ट्वीट में लिखा, “स्थानीय प्रशासन द्वारा मिले आश्वासन के बावजूद कि वहाँ पुलिस की तैनाती की जाएगी, कोई कार्यवाही नहीं हुई. इस वजह से कुछ अज्ञात आरोपियों ने सुरक्षा गार्डों पर काबू पा लिया और कल रात लगभग एक टन लोहा निकाल ले गये.”लेकिन पुलिस ने इन दावों को ख़ारिज कर दिया है. पुलिस का कहना है कि ठेकेदार ने परियोजना की क़ानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं होने तक निर्माण सामग्री को साइट से हटा लिया है.

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