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भाषण और बस भाषण

aiyar-rahul-modiभाषण इन दिनों फिर से चर्चा में हैं। देश में जब भी चुनाव होते हैं, सबसे ज्यादा चर्चा भाषणों की ही होती है। अक्सर मुद्दों से भी ज्यादा। माना जाता है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश या समाज में राजनीतिक भाषण उसके परिपक्व और संभ्रांत होते जाने के प्रतीक होते हैं, तो दूसरी तरफ वे सामाजिक संस्कृति की प्रतिछाया भी होते हैं। हर वह नेता, जो लोकप्रिय होता है, उसके राजनीतिक भाषणों में किसी न किसी सांस्कृतिक पाठ का असर देखा जा सकता है। ये वही सांस्कृतिक पाठ होते हैं, जिनसे श्रोताओं की स्मृतियां जागती हैं। यही स्मृतियां उन्हें उस नेता के भाषणों से जोड़ती हैं।

महात्मा गांधी के भाषणों में भारतीय परंपरा के सांस्कृतिक पाठों, जैसे गीता,  बुद्ध और रामायण  की ध्वनि तो थी ही, गुजराती संत नरसी मेहता की वाणी साफ दिखती थी। कर्म आधारित जीवन की लय उनके भाषणों और संवादों का मूल थी। उनके भाषण भारतीय संस्कृति को औपनिवेशिक संस्कृति के विकल्प के रूप में पेश करते थे और इसी से उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन की नींव रखी। उस दौर में लोकप्रिय होने वाले दूसरे महत्वपूर्ण नेता, जवाहरलाल नेहरू के भाषणों का मूल आधार भारत का उनका विचार था। भारत का सामाजिक इतिहास और उसके विविध स्तर नेहरू के भाषणों को स्वर देते थे। उनके समकालीन राम मनोहर लोहिया ने जर्मनी में उच्च शिक्षा ग्रहण की थी। जर्मन ज्ञान की वाद-विवाद शैली उनके भाषणों को तराशती थी। रामायण  की भाषिकता और संवाद भी उनके भाषणों में साफ सुने जा सकते थे।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के भाषणों में गरीबी और उपेक्षितों की पीड़ा का जिक्र मुख्य पाठ के रूप में झलकता था। सामंतों, पूंजीपतियों, आधिपत्यशालियों के प्रति प्रतिरोध की कामना उनके संभाषणों की लोकप्रियता और जनप्रियता को रचते थे। उनके भाषणों के ऑडियो टेप आप सुनें, तो कई बार लगता है, मानो चारों तरफ से पहाड़ियों के बीच घिरी कोई अकेली महिला की वाणी है, जो राह नहीं पा रही हो, उसकी मजबूत आवाज गूंज रही है। ऐसे सामाजिक पाठ और तेवरों ने इंदिरा गांधी के भाषणों को जनता से जोड़ा था।

इंदिरा गांधी की विरोधी विचारधारा के नेता अटल बिहारी वाजपेयी आजादी के बाद के उत्तर भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय नेताओं में से एक माने जाते हैं। उनकी राजनीतिक वक्तृृत्व कला को अगर हम ध्यान से सुनें, तो उनमें आजादी के बाद के महत्वपूर्ण हिंदी कवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित महाकाव्य रश्मिरथी  की अनुगूंज सुनाई पड़ती है। रश्मिरथी महाभारत के एक उपेक्षित चरित्र कर्ण को लेकर रचा गया हिंदी का काफी लोकप्रिय महाकाव्य है। अटलजी के छात्र जीवन और युवा काल का यह सर्वाधिक जनप्रिय महाकाव्य था। रश्मिरथी  का ओज और वीर रस अटलजी के राजनीतिक भाषणों के क्राफ्ट में हमें अक्सर दिखाई पड़ता है। आज भी भाजपा के युवा नेताओं में अटलजी की उस शैली का असर साफ-साफ दिखता है। कई बार लगता है कि शिवमंगल सिंह सुमन की कविताएं भी सांस्कृतिक पाठ के रूप में उनके संवाद में खड़ी है। अटलजी खुद कवि थे, अत: अत्यंत कटु सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों से टकराते हुए भी उनके राजनीतिक भाषण अपने सांस्कृतिक आधार से गहरे जुडे़ होते थे।
लालू प्रसाद यादव अपनी भाषण कला के कारण बिहार के काफी लोकप्रिय नेताओं में शुमार किए जाते हैं। उनकी सभाओं में उन्हें सुनने के लिए बड़ी भीड़ अभी भी आती है। उनके राजनीतिक वक्तृता की लोकप्रियता के भी सांस्कृतिक आधार साफ दिखते हैं। लालू यादव जिस शैली में बोलते हैं, वह शैली एक बेहद लोकप्रिय रेडियो नाटक लोहा सिंह  से गहरे प्रभावित है। लोहा सिंह  नाटक हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार व नाटककार रामेश्वर सिंह कश्यप ने रचा था, जिसमें युद्ध से लौटे एक फौजी लोहा सिंह अपने संवादों के जरिए भारतीय सेना का मनोबल तो बढ़ाता ही रहता है, अपने चुटीले व्यंग्यबाणों से सामाजिक कुरीतियों पर भी आक्रमण करता रहता है। वह टूटी-फूटी गलत-सलत अंग्रेजी को हिंदी और भोजपुरी में फेटते हुए बोलता है। यह रेडियो नाटक पटना आकाशवाणी से लगभग 400 एपिसोड में प्रसारित हुआ था, बल्कि कई बार इसका पुनप्र्रसारण हुआ। बिहार के भोजपुरी भाषी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग खेत-खलिहानों, चौपालों में भीड़ लगाकर बीच में रेडियो रख सभी काम-धाम छोड़कर इस नाटक को सुनते थे। यह लालू यादव के उभार का आधार था। जब वह पटना यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे, और छात्र नेता के रूप में उभर रहे थे, उन्होंने इसी शैली में छात्रों के बीच भाषण देना शुरू किया। जयप्रकाश नारायण द्वारा छेड़े गए आंदोलन में उनकी राजनीतिक भाषण शैली पर और धार चढ़ी। उन्होंने लोहा सिंह  नाटक की भाषा शैली को आत्मसात कर उसे नए सामाजिक प्रश्नों से जोड़ते हुए एक अनोखी भाषण शैली विकसित की।

दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु के नेताओं के भाषणों में कई बार, संगम साहित्य, की छवियां दिखती हैं और ध्वनियां गूंजती हैं। वही बंगाल के नेताओं के भाषणों में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के गीतात्मक काव्यों की ध्वनियों का गूंजना आम बात है।समय के साथ भाषणों का स्वरूप भी बदला है। इस क्रम में पहले इलेक्टॅ्रानिक मीडिया का युग आया, और फिर मोबाइल, लैपटॉप, सोशल साइट्स का समय आया। नेताओं के बोल बिगड़ने लगे, हालांकि ट्विटर, फेसबुक वगैरह ने राजनीतिक संवाद के लिए एक नया और बड़ा मंच दिया। टीवी बहस के जुमले नेताओं के भाषणों में छाने लगे। फिर भी अगर आज के सर्वाधिक लोकप्रिय माने जाने वाले नेता नरेंद्र मोदी के भाषणों को सुनें, तो उनमें महाभारत के मुहावरे, स्थानीय भाषा की गूंज दिखती है। नए भारत के स्वप्न इन सांस्कृतिक पाठों की स्मृति से जुड़कर उन्हें लोकप्रियता देते हैं। विपक्ष के नेता के रूप में लगातार उभर रहे राहुल गांधी के भाषणों में भी महाभारत के प्रसंग आते हैं। यह रोचक है कि आज रामायण  से ज्यादा महाभारत  को नेताओं के राजनीतिक भाषणों में इस्तेमाल किया जा रहा है। शायद इसलिए कि बढ़ती स्पद्र्धा के साथ अब रणनीति भी बदल चुकी है। 

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