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बन रहे हैं 1991 जैसे हालात ,सरकार के लिए खतरे की घंटी

sandipनई दिल्ली (संदीप ठाकुर )पूरे तीन दशक बाद 2020 में फिर से वैसे ही हालात बनते दिख रहे हैं जाे 1991 में थे। कुछ याद आया। डालिए अपने जहन पर जाेर। नहीं याद आया ..चलिए हम बताते हैं कि 1991 और 2020 में क्या समानता बनती दिख रही है। 1991 में आरक्षण को लेकर मंडल कमिशन की रिपोर्ट के खिलाफ छात्रों के एक वर्ग का जोरदार विरोध प्रदर्शन हुआ था जिसने तत्कालीन सरकार काे हिला कर रख दिया था। ऐसा ही अब 2020 में भी होता दिख रहा है। भारत में देश भर के कई विश्वविद्यालयों में छात्र नागरिकता कानून व सीएए के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। देश के कई विश्वविद्यालय बंद हैं और छात्र माेदी सरकार के खिलाफ सड़काें पर हैं। 2020 के शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति के आदेश पर ईरान के मेजर जनरल कासिम सुलेमानी को हमला में मार दिया गया। ठीक ऐसा ही वाकया तब भी हुआ था, जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज एच. डब्ल्यू बुश ने सद्दाम हुसैन के नेतृत्व वाले इराक पर हमले का आदेश दिया था। इसके चलते मिडल ईस्ट में तनाव चरम पर पहुंच गया था और कच्चे तेल के दाम भी बहुत ऊंचाई पर पहुंच गए थे। ऐसा ही अब 2020 में भी होता दिख रहा है। ईरान की ओर से इराक में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलों से किए गए हमले के चलते क्षेत्र में तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। 1991 अर्थव्यवस्था के लिए भी मील का पत्थर साबित हुआ था। उस दौर में वित्त मंत्री रहे मनमोहन सिंह ने 1991 में ऐतिहासिक बजट पेश किया था।

आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई और भारतीय इकॉनमी ने रफ्तार पकड़ी थी। उससे पहले भारतीय इकॉनमी गहरे संकट से गुजर रही थी। 1990-91 के आर्थिक सुधारों के समय भारत की आबादी 90 करोड़ थी। तब भारत बड़ी आर्थिक मंदी झेल रहा था। उस समय दो हफ्तों तक आयात करने की ही रकम भारतीय अर्थव्यवस्था के पास बची थी। विदेशी मुद्रा भंडार में कुल 110 करोड़ डॉलर बचे थे। उस कठिन परिस्थिति में बड़े बदलाव की जरूरत थी जाे डॉ मनमाेहन सिंह ने बाखूवी किया था। 1991 में कुल जीडीपी 5,86,212 करोड़ रुपये की थी। आज भारत की जीडीपी लगभग 20,00,000 करोड़ रुपये की हो चुकी है। 1991 से पहले भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेश न के बराबर था।  1991 के आर्थिक सुधार के पहले वर्ष में केवल 7.40 करोड़ डॉलर का कुल निवेश हुआ था। उसके बाद के वर्षाें में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आजादी के बाद से सारे आंकड़ों को पीछे छोड़ते हुए तेज रफ्तार से आगे बढ़ा। अब उसकी रफ्तार थाेड़ी घीमी हाे चली है।

अब अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के आर्थिक फैसलों की विवेचना करें तो हमें प्रमुख रूप से चार आर्थिक पहलुओं पर चर्चा करनी होगी। इनमें नोटबंदी, वस्तु एवं सेवा कर, इनसॉल्वेंसी व बैंक्रप्सी कोड (आईबीसी) और नया मौद्रिक नीति ढांचा शामिल हैं। 8 नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का एलान किया था। इसके तहत सर्कुलेशन में 86 फीसदी करेंसी को अर्थव्यवस्था से बाहर कर दिया गया था।  नोटबंदी के कुछ समय बाद आए नतीजों से साफ हो गया कि यह फैसला अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से लाभदायक नहीं था।  न केवल आर्थिक विकास पर इसका असर हुआ, बल्कि रोजगार में भी भयंकर गिरावट आई। सरकार ने मुख्य रूप से काले धन पर अंकुश लगाने के मकसद से नोटबंदी का फैसला किया था। लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 99 फीसदी करेंसी वापस बैंकिंग सिस्टम
में आ चुकी है। नाेटबंदी के जरिए देश को डिजिटल अर्थव्यवस्था में तब्दील करने का इरादा था लेकिन ऐसा हाे न सका ।  आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था बेहद नाजुक दाैर से गुजर रही है। भारत की जीडीपी 11 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है और ग्रोथ रेट महज 5 पर्सेंट के आसपास आकर टिक गई है। औद्याेगिक क्षेत्र में भी उत्पादन का आंकड़ा तय मापदंड से बेहद नीचे यानी माइनस में चल रहा है। राेजी,राेजगार और व्यापार का संकट लगातार गहरा हाेता जा रहा है। देखना यह कि आगामी बजट में सरकार इसे सुधारने के लिए क्या कदम उठाती है।लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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