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राष्ट्रीय चुनाव में क्षेत्रीय दलों का दम

akhilesh_mayawati_ajit_singhलोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दलों ने ‘सोचो राष्ट्रीय, लड़ो स्थानीय का मंत्र अपनाया है। भले ही कांग्रेस अब भी कई जगहों पर अंदरूनी खींचतान या गुटबाजी में उलझी हो और चुनावों के दौरान गैर-जरूरी गलतियां कर रही हो, लेकिन क्षेत्रीय दल विभिन्न् राज्यों में एनडीए गठबंधन या कहें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। ऐसे में कोई आश्चर्य की बात नहीं कि ये प्रांतीय क्षत्रप ही चुनाव-पश्चात गैर-एनडीए पार्टियों का गठबंधन तैयार करने को लेकर अग्रणी भूमिका में नजर आ रहे हैं।
वर्ष 1996 से प्रमुख चुनावी संघर्ष भाजपा और कांग्रेस के बीच ही होता आया है, जिसमें क्षेत्रीय दल सहायक भूमिकाओं में रहते थे। 2004 में यूपीए की अगुआई कांग्रेस ने की और किसी ने भी सोनिया गांधी के नेतृत्व पर सवाल नहीं किया। लेकिन कहना होगा कि इस बार कांग्रेस की स्थिति बाकी दलों जैसी ही है। यही कारण है कि राकांपा सुप्रीमो शरद पवार ने संभावित प्रधानमंत्री के तौर पर ममता बनर्जी, मायावती और चंद्रबाबू नायडू का तो जिक्र किया, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का नाम नहीं लिया।

मिसाल के तौर पर पश्चिम बंगाल को ही लें। वहां पर भले ही कांग्रेस-लेफ्ट का गठबंधन नहीं हो सका और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में खींचतान मची है, लेकिन ममता बनर्जी भाजपा को तगड़ी टक्कर देते हुए उसकी राह रोकने की पूरी कोशिश कर रही हैं। यहां तक कि वहां लेफ्ट भी कांग्रेस से बेहतर टक्कर दे रहा है। तीसरे चरण के मतदान तक यह साफ हो गया कि कांग्रेस ने अपना काफी जनाधार भाजपा के हाथों गंवा दिया है और चुनावी लड़ाई तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के मध्य ध्रुवीकृत होकर रह गई है। लेकिन अब भी ‘दीदी बढ़त की स्थिति में हैं। वह 32 फीसदी अल्पसंख्यक मतों को लेकर आश्वस्त हैं और उन्हें इस बात की ज्यादा परवाह नहीं है कि मुकुल रॉय समेत कुछ अन्य नेता उनकी पार्टी छोड़कर भाजपा में चले गए।चूंकि चुनाव सात चरणों में होने हैं, लिहाजा ममता के लिए राज्य की सभी 42 सीटों में घूमने की पूरी गुंजाइश है। उनकी चुनावी मशीनरी को भाजपा से भी बेहतर बताया जा रहा है। उन्होंने अपने संगठन में कमजोर हिस्सों की पहचान की और व्यक्तिगत रूप से उन इलाकों में गईं। इसी तरह ओडिशा में भी कांग्रेस हाशिए पर है और लड़ाई भाजपा व बीजद के मध्य ही है।

महाराष्ट्र की बात करें तो वहां शरद पवार विपक्षी गठबंधन को खींचने वाले इंजन हैं। यह उन्हीं का आइडिया था कि एमएनएस के तेजतर्रार नेता राज ठाकरे को अपने पक्ष में किया जाए। हालांकि एमएनएस किसी भी सीट पर चुनाव नहीं लड़ रही है। कांग्रेस-एनसीपी के चुनाव प्रचार में राज ठाकरे एक प्रमुख हस्ती के रूप में उभरे हैं। इसी बीच कांग्रेस में अपनी ढपली अपना राग की स्थिति भी नजर आई। महाराष्ट्र विधानसभा में नेता विपक्ष राधाकृष्ण विखे पाटिल को पार्टी ने स्टार प्रचारक बना रखा था, लेकिन उनके ही बेटे सुजय कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो गए। इससे पार्टी शर्मसार हुई। हालांकि बाद में पाटिल ने पद छोड़ दिया, लेकिन नुकसान तो हो चुका था।
यहां तक कि देश की राजधानी दिल्ली में भी कांग्रेस अपने राष्ट्रीय पार्टी होने के रुतबे का लाभ लेते हुए भाजपा से नाखुश मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में नाकाम नजर आ रही है। वहां भी लड़ाई भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच है। दिल्ली में कई दौर की बातचीत के बावजूद ‘आप-कांग्रेस का गठबंधन मूर्तरूप नहीं ले पाया। इससे दिल्ली में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं अजय माकन और शीला दीक्षित के मध्य खींचतान भी रेखांकित हुई। गौरतलब है कि शीला दीक्षित ‘आप से गठजोड़ के खिलाफ थीं, जबकि माकन ने खुलेआम कहा कि गठबंधन वार्ता के नाकाम होने की वजह से कांग्रेस को नुकसान झेलना पड़ेगा।
बिहार की बात करें तो वहां कांग्रेस के पास न तो कोई नेता है और न ही जमीन पर मजबूत संगठन। ऐसे में जाहिर तौर पर वह विपक्षी गठबंधन में जूनियर पार्टनर है। राष्ट्रीय जनता दल के युवा नेता तेजस्वी यादव इसके निर्विवाद नेता हैं। इसके बावजूद सीटों के बंटवारे को लेकर मतभेद उभर आए और झारखंड में कांग्रेस के बिग ब्रदर सरीखे रवैये ने राजद के युवा नेता को खफा कर दिया। जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस भाजपा को रोकने की खातिर नेशनल कांफ्रेंस के साथ तालमेल कायम करने में जरूर सफल हो गई, लेकिन दोनों के मध्य काफी तनाव है। नेशनल कांफ्रेंस के एक नेता अकबर लोन तो यहां तक कह दिया कि कांग्रेस भाजपा से ज्यादा खतरनाक है।दक्षिण भारत में कर्नाटक इकलौता राज्य है, जहां कांग्रेस और भाजपा के मध्य सीधी लड़ाई है। यहां कांग्रेस के पास संगठन भी है और सिद्धारमैया जैसा मजबूत नेता भी। लेकिन यहां पर पूर्व प्रधानमंत्री और जद(एस) के सुप्रीमो एचडी देवेगौड़ा विपक्षी गठबंधन का चेहरा हैं, जिनके साथ सिद्धारमैया के गंभीर मतभेद हैं। ज्यादातर लोग मानते हैं कि विधानसभा चुनाव में सिद्धारमैया को ध्वस्त करने में देवेगौड़ा का हाथ था और इसी वजह से उन्हें चामुंडेश्वरी सीट पर हार का सामना करना पड़ा था।

उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-रालोद महागठबंधन अपेक्षा से कहीं बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। यह महागठबंधन भाजपा के स्पष्ट बहुमत हासिल करने के मंसूबों को गंभीर क्षति पहुंचाता लग रहा है। यह तब है, जब कांग्रेस इस गठबंधन का हिस्सा नहीं। कांग्रेस महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा ने कुछ रोज पहले कहा था कि राज्य की जिन सीटों पर उनकी पार्टी कमजोर है, वहां ऐसे प्रत्याशी खड़े किए गए जो भाजपा के वोट काटें। इस तरह उन्होंने परोक्ष रूप से सपा-बसपा गठबंधन की मदद करने की ओर इशारा किया। लेकिन यदि ऐसा है तो उन्होंने सहारनपुर में बसपा के मजबूत मुस्लिम प्रत्याशी के खिलाफ अपना दमदार मुस्लिम प्रत्याशी क्यों उतारा? बिजनौर में भी बसपा के खिलाफ अपना मजबूत प्रत्याशी खड़ा किया। साफ है कि कांग्रेस पहले यूपी में 2009 जैसा प्रदर्शन दोहराने की उम्मीद कर रही थी, जब उसने 21 सीटें जीती थीं। लेकिन अब संभवत: उसे एहसास हो गया है कि वह इससे आधी सीटें भी न जीत सके।अब उन राज्यों की बात, जहां पर भाजपा व कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है। ऐसे राज्यों में कांग्रेस के प्रांतीय क्षत्रप ही भाजपा को टक्कर दे रहे हैं। मसलन, राजस्थान व मध्य प्रदेश में कांग्रेस के चुनाव प्रचार की कमान इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों अशोक गहलोत और कमलनाथ के सक्षम हाथों में है। यही बात पंजाब के लिए भी सत्य है, जहां पर कैप्टन अमरिंदर सिंह वन-मैन आर्मी हैं। केरल में समग्र तौर पर इसकी राज्य इकाई मजबूत है। वहीं ऐसे राज्य जहां पर कांग्रेस के पास कोई ‘चेहरा नहीं है, जैसे कि गुजरात, वहां इसकी संभावनाएं क्षीण हैं।यह सब देखते हुए इन चुनावों में कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका सीमित ही लगती है। इसके सर्वथा उलट भाजपा का समूचा चुनाव अभियान पूरी तरह मोदी के इर्द-गिर्द सिमटा है।साफ है कि कांग्रेस के पास अब वह ताकत या साख नहीं बची कि वह क्षेत्रीय दलों पर अपनी मर्जी थोप सके। अब हालात पलट चुके हैं। देश में 25 वर्षों के गठबंधन सरकारों के दौर के बाद अब क्षेत्रीय दल पहले से अधिक मजबूत हो चुके हैं। वे अब चाहते हैं कि नई दिल्ली में उन्हें उनका उचित स्थान मिले और राष्ट्रीय मसलों पर उनकी आवाज का दखल बढ़े।

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच तलवारें खिंची हुई हैं. दोनों दलों के नेता आरोप-प्रत्यारोप से गुरेज नहीं कर रहे हैं. लेकिन इस बीच, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी की प्रमुख ममता बनर्जी ने कहा कि चुनाव समाप्त हो जाने के बाद सभी क्षेत्रीय पार्टियां एक मंच पर आएंगी और केंद्र में गैर मोदी सरकार बनेगी. ममता ने कहा कि बंगाल में बीजेपी कहती है, जय श्रीराम, हम कहते हैं जय बांग्ला.क्षेत्रीय पार्टियों से प्रधानमंत्री कौन बनेगा? ममता बनर्जी ने कहा कि नतीजों का इंतजार करें. हम इसे लेकर काम कर रहे हैं. इंडिया टुडे के इस सवाल पर कि आप पर हिंदू मुस्लिम को बांटने के आरोप लग रहे हैं? उन्होंने कहा कि हम किसी को बांट नहीं रहे हैं. सभी हमारे साथ हैं.यह बीजेपी का प्रोपेगैंडा है जिसे नेशनल मीडिया हवा दे रहा है.

पश्चिम बंगाल में मतदान के दौरान हिंसा के सवाल पर ममता बनर्जी ने कहा कि केंद्रीय सुरक्षा बलों की कमान केंद्र सरकार के हाथ में है. इन्हीं सुरक्षा बलों की निगरानी में मतदान हो रहा है. केंद्र में बीजेपी की सरकार है. फिर मुझ पर ऐसे आरोप क्यों लगाए जा रहे हैं? टीएमसी की प्रमुख ने बीजेपी पर चुनाव को लंबा खींचने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि बीजेपी ने जानबूझकर मतदान की तारीखें इस तरीके से तय की हैं कि जिस दौरान लू चलती है. गर्मी रहती है. हर साल इन स्थानों पर चुनाव जल्दी हो जाते हैं, लेकिन मोदी को फायदा पहुंचाने के लिए चुनाव प्रक्रिया को इंतना लंबा खींचा गया. सात चरणों में मतदान से मोदी को फायदा मिलेगा.ममता बनर्जी ने कहा कि बीजेपी बुरी तरह हारेगी. पूरे देश में हारेगी. बीजेपी कोई चुनौती नहीं है. उन्होंने कहा कि मेरा नारा जय हिंद है, न कि जय श्री राम.  मोदी अब व्यक्तिगत हमले कर रहे हैं. वह एक्सपायरी पीएम हैं. उनका टाइम खत्म हो चुका है. मोदी गंदी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं.

 

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