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हम सब बापू की आवाज सुनें

ramnathराम नाथ कोविंद, राष्ट्रपति असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों के प्रति जन-चेतना जगाने के लिए प्रकाशित लेखों के कारण गांधीजी को 1922 में जेल में डाल दिया गया। उनके सहयोगी शंकरलाल बैंकर को भी साथ ही कारावास मिला था। बैंकर ने देखा कि महात्मा गांधी सवेरे चार बजे अपनी दिनचर्या शुरू करने से लेकर देर रात तक एक मिनट भी बरबाद नहीं करते हैं। रोज छह घंटे सूत कातने से लेकर नियमित तौर पर शास्त्रों के स्वाध्याय तक वह किसी न किसी काम में लगे ही रहते हैं। बैंकर भी उत्साहपूर्वक उनके साथ सक्रिय रहते। गांधीजी ने उनके लिए भी एक टाइम-टेबल बना दिया था। गांधीजी से पहले रिहा होते समय बैंकर ने उनसे कहा कि अब उन्हें जीने की नई राह मिल गई है। इस पर गांधीजी ने उनसे कहा, आप अपनी सीख दूसरों के साथ भी साझा करें।
फिर उन्होंने बैंकर से पूछा, क्या आपको इस बात का अंदाजा है कि ऐसी दिनचर्या के बारे में लोगों की प्रतिक्रिया क्या होगी? बैंकर को इसका तनिक भी अंदाजा नहीं था। गांधीजी बोले, ‘मैं आपको बता सकता हूं कि लोग क्या कहेंगे। वे कहेंगे, वह तो महात्मा हैं, वह ऐसी जीवन-शैली अपना सकते हैं। ऐसा कर पाना हमारे लिए संभव नहीं।’ गांधीजी ने बैंकर से लोगों को यह बताने के लिए कहा कि वह कोई जन्मजात महात्मा नहीं हैं। उनके शब्द थे, ‘मुझमें भी बहुत से दोष थे और मैंने उन्हें दूर करने के लिए सजगता के साथ अथक प्रयास किए हैं। अब लोग मुझे महात्मा कहने लगे हैं, हालांकि मैं उस अवस्था से बहुत दूर हूं। लेकिन यह मार्ग सभी के लिए खुला हुआ है, और प्रत्येक व्यक्ति इस राह पर चल सकता है, यदि वह इस पर मनन करे और आत्मविश्वास तथा प्रतिबद्धता के साथ सही दिशा में  प्रगति करे।’
गांधीजी की 151वीं जयंती के अवसर पर मैं उनकी सीख के बारे में चिंतन करता हूं, तो यह पाता हूं कि उनकी यह शिक्षा हमें सशक्त भी बनाती है और विनम्र भी। बापू ने अपनी ओर से कभी अपने महात्मा होने का दावा नहीं किया। सच तो यह है कि वह अपनी दुर्बलताओं को दुनिया के सामने उजागर करने के लिए तत्पर रहते थे। फिर भी, उन्हें मानवीय क्षमता के उच्चतम शिखर तक पहुंचने का सर्वोत्तम उदाहरण माना जाता है। हम सबको उनकी उपलब्धियां अलौकिक सी लगती हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन ने बापू के प्रति अपनी श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए जो कहा था, वह सर्वथा सत्य है। आने वाली पीढ़ियों के लिए सचमुच यह विश्वास करना कठिन होगा कि उन्मुक्त मुस्कान वाले एक कृशकाय वृद्ध ने बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के आजादी की लड़ाई में विजय का मार्ग प्रशस्त किया।
बापू ने स्वयं बताया है कि वह एक सामान्य बालक थे, जिसकी अपनी कमजोरियां थीं। अंतर बस इतना था कि उन्होंने अपनी नैतिकता की नींव को मजबूत बनाने पर पूरी लगन से काम किया। युवावस्था में वह स्वभाव से शर्मीले थे और उनमें आत्म-विश्वास की कमी थी। लेकिन वह अपनी नैतिकतापूर्ण सोच को निरंतर सुदृढ़ बनाते रहे। एक बेहतर इंसान बनने और अपने आसपास के लोगों के प्रति अधिक संवेदनशील होने के अहर्निश प्रयास ने उन्हें महात्मा बना दिया। मार्ग कठिन था, कई विफलताओं से भी उन्हें गुजरना पड़ा। लेकिन बिना हिम्मत हारे, वह अपने कदम आगे बढ़ाते गए।
अपनी आत्मकथा में बापू ने लिखा है, ‘मुझे जो करना है, तीस वर्षों से मैं जिसकी आतुर भाव से रट लगाए हुए हूं, वह आत्म-दर्शन है, ईश्वर का साक्षात्कार है, मोक्ष है।’ उनका प्रयास इस अर्थ में अनूठा था कि उन्होंने संसार का त्याग नहीं किया, बल्कि निर्बलों के उत्थान और सभी देशवासियों के सशक्तीकरण के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया। गांधीजी अधिकारों की तुलना में अपने कर्तव्यों के बारे में अधिक सचेत थे और दूसरों के हितों के लिए संघर्ष करते रहे। इनमें हरिजन, किसान, मजदूर, महिलाएं और अन्य लोग शामिल थे। उन्होंने करुणा पर आधारित एक अलग तरह की राजनीति विकसित की, जिसमें समकालीन विश्व के सभी अहम सवालों के जवाब निहित हैं। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, आर्थिक व सामाजिक समानता के लिए व्यक्ति, संगठन और राष्ट्र को क्या करने की जरूरत है, यह गांधीजी बडे़ विस्तार से बताते हैं।
बडे़-बडे़ कार्य करते हुए भी गांधीजी सदैव विनम्र बने रहते। उनके सहयोगी और अनुयायी उनमें एक पिता का नहीं, बल्कि एक मां का रूप देखते थे। जॉर्ज ऑरवेल ने कहा था कि किसी स्थान से गांधीजी के जाने के बाद भी वहां के वातावरण में एक सात्विक सुगंध बनी रहती है। अंग्रेजी के उस लेखक के आशय का प्रत्यक्ष अनुभव मुझे तीन साल पहले अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की यात्रा के दौरान हुआ। आश्रम की पवित्रता अब भी अक्षुण्ण बनी हुई है और आज भी वहां उसी गहरी शांति का अनुभव होता है, जो गांधीजी के सान्निध्य में उस परिसर में व्याप्त रहती थी। दिल्ली में राजघाट पर जब-जब मैं उनकी समाधि पर गया हूं, मैंने वहां शांति का वैसा ही स्पंदन अनुभव किया है।
गांधीजी की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में वर्ष-पर्यंत मनाए गए समारोह आज संपन्न हो रहे हैं। इन समारोहों ने लोगों को गांधीजी की स्मृति को नमन करने और सार्वजनिक जीवन की नैतिक आधारशिला को मजबूत बनाने के अवसर प्रदान किए हैं। बीते वर्ष में भारत और अन्य देशों के अनेक युवाओं को गांधीजी के अमर संदेश से परिचित होने का अवसर अवश्य मिला होगा। यदि हम उनके जीवन से सबक लेना चाहें, तो गांधीजी के पास हमें देने के लिए बहुत कुछ है, खासकर आज की स्थिति में, जब हम एक वैश्विक महामारी का सामना कर रहे हैं। प्लेग की महामारी के दौरान उन्होंने सेवा और स्वच्छता के काम में खुद को झोंक दिया था और नि:स्वार्थ सेवा का आदर्श प्रस्तुत किया था।
जनवरी 1934 में आलप्पुझा में एक भाषण में उन्होंने कहा था, ‘मुझे अपने जीवन-लक्ष्य में इतनी गहरी आस्था है कि यदि उसकी प्राप्ति में सफलता मिलती है, और मिलना अवश्यंभावी है, तो इतिहास में यह बात दर्ज होगी कि यह आंदोलन विश्व के सभी लोगों को एक सूत्र में पिरोने के लिए था, जो एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक समष्टि के अंग होंगे।’ मुझे विश्वास है कि उसी आस्था और सोच को जागृत रखते हुए हम एक बेहतर विश्व की परिकल्पना और निर्माण करने में सक्षम होंगे। गांधीजी की 151वीं जयंती, उनके जीवन और चिंतन के आलोक में अपनी प्राथमिकताएं तय करने और अपने हृदय की गहराई से उनकी आवाज को फिर से सुनने का एक पुनीत अवसर है।

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