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सच बात—देश की बात

जनता और किसानों को भड़काने की राजनीति

( मनोज वर्मा ) नई दिल्ली।चंद राजनैतिक दलों के नेताओं और कुछ किसान नेताओं की हठधर्मी और जुगलबंदी ने देश और मोदी सरकार के लिए संकट खड़ा कर दिया है। महामारी के इस दौर में भी यह लोग अपनी जहरीली जुबान बंद रखने को तैयार नहीं हैं। महामारी के इस दौर में जब इन नेताओं को देश की जनता में विश्वास पैदा करने के लिए काम करना चाहिए था, तब यह जनता को बरगलाने और भड़काने में लगे हैं। झूठी खबरें फैलाई जा रही हैं। यह वह नेता हैं जिन्हें जनता बार-बार ठुकरा चुकी है। इसमें बड़ी जमात अपने जमाने के दिग्गज नेताओं के उन पुत्रों की भी है जो कभी जनता की कसौटी पर खरे नहीं उतर पाए। यह वह नेता हैं जो अपने आप को महाज्ञानी समझते हैं जबकि इनके पास बेसिक जानकारी भी नहीं रहती है।

इन नेता पुत्रों ने राजनीति का स्तर इतना गिरा दिया है कि जब भी यह मुंह खोलते है ‘जहर’ ही उगलते हैं। राहुल गांधी akhilesh_yadav_1-sixteen_nine-sixteen_nineतो इस खेल में बदनाम हैं ही, बहन प्रियंका भी कम नहीं हैं। दोनों नेताओं को मोदी-योगी सरकार की फजीहत करने में जितना मजा आता है, उतनी ही इनकी जुबान कांग्रेस शासित राज्यों को लेकर बंद रहती है। वर्ना महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब और झारखंड के हालात भी कम खतरनाक नहीं हैं। अन्य नेता पुत्र भी राहुल-प्रियंका के पदचिन्हों पर चलते नजर आ रहे हैं। स्थिति यह है कि अखिलेश यादव हर समय योगी सरकार की खाामियां गिनाते रहते हैं। हद तो तब हो जाती है जब अखिलेश कहते हैं कि मोदी सरकार गरीबों को फ्री में कोरोना से बचाव का इंजेक्शन नहीं लगा रही है। जबकि यह इंजेक्शन शुरू से फ्री में ही लग रहा है। योगी सरकार को घेरने की दौड़ अखिलेश अकेले नहीं लगा रहे हैं इस रेस में प्रियंका गांधी भी पीछे नहीं हैं क्योंकि वह भी अखिलेश-मायावती की तरह 2022 में यूपी का सीएम बनने का सपना पाले हुए हैं। ऐसा ही कारनामा बिहार में लालू के पुत्र कर रहे हैं। वह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ जनता के गुस्से को भड़काने में लगे हैं। एक तरफ यह नेता पुत्र जनता को भड़का रहे हैं तो दूसरी तरफ किसान आंदोलन को भी हवा देने में लगे हैं। महामारी के दौर में जब हर कोई चाह रहा है कि किसान आंदोलन वापस लेकर सुरक्षित घरों में जाकर रहें तब यह नेता किसान आंदोलन की आवाज बने हुए हैं।

Rakesh-tikait_2_20210203_402_602_570_850बहरहाल, महामारी के इस दौर में किसान आंदोलनकारियों के हौसले इसलिए तो बढ़े हुए हैं ही कि कुछ नेताओं की इससे सियासत चल रही है, वहीं सकट इसलिए और बड़ा होता जा रहा है क्योंकि आंदोलनकारी किसानों के दोनों हाथों में लडडू हैं। यदि सरकार सख्ती नहीं करती है तो किसान नेता मनमानी पर उतर आते हैं और सख्ती करती है तो किसान नेता भोले-भाले किसानों को भड़का कर आगे कर देते हैं। यही वजह है तीनों केंद्रीय कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ दिल्ली-एनसीआर के बॉर्डर पर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के किसानों का धरना जारी है। कोरोना वायरस संक्रमण के बढ़ते खतरे और प्रभाव के बीच संयुक्त किसान मोर्चा धरना प्रदर्शन से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। धीरे-धीरे किसान आंदोलन का एक सच यह भी सामने आने लगा है कि प्रदर्शनकारी तीनों कृषि सुधार कानूनों की अच्छाई को न समझ कर अपने नेताओं-आकाओं के हाथ की कठपुतली बन गए हैं। खासकर संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं के अलावा, भाकियू (चढ़ूनी) के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढ़ूनी और भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत लगातार किसानों का गुमराह कर रहे हैं। कोरोना को लेकर भी यह नेता भ्रम की राजनीति में लगे हैं।

Rahul_Gandhi_migrants__PTI_कृषि कानूनों में सुधार के खिलाफ चल रहे आंदोलन में गुरनाम सिंह चढ़ूनी गत दिनों टीकरी बॉर्डर के मंच पर पहुंचे। मंच पर आए गुरनाम चढ़ूनी ने कहा कि सरकार हमारे आंदोलन को जबरन खत्म नहीं करवा सकती। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि सरकार यह न सोचे कि किसानों को दबाव में घर भेज दिया जाएगा। आंदोलन स्थल पर कोरोना का कोई खतरा नहीं है। यहां पर बता दें कि दिल्ली में लॉकडाउन लगने से पहले ही भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने ऐलान कर दिया था कि लॉकडाउन लगने के बावजूद यूपी बॉर्डर पर किसानों का प्रदर्शन नहीं थमेगा। दरअसल, राकेश टिकैत का किसानों पर प्रभाव है, ऐसे में उनके बयान असर करते हैं। यही वजह है कि किसान न तो तीनों कृषि सुधार कानूनों की अच्छाई समझ पा रहे हैं और न ही इस पर हो रही राजनीति की गहराई तक पहुंच सके हैं।

उत्तर प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर खड़ी करने का प्रयास कर रहा है विपक्ष

Rahl-Priyanka-Gandhiउत्तर प्रदेश में कोरोना महामारी का तांडव मचा हुआ है। आम और खास सब इससे दुखी और पीड़ित हैं। प्रदेश की बड़ी आबादी इसकी चपेट में आ गई है। कई घर उजड़ गए हैं। लोगों का काम धंधा चौपट हो गया है। रोजी-रोजगार चला गया है। विकास का पहिया थम-सा गया है। संकट की इस घड़ी ने योगी सरकार के लिए भी चुनौतियां खड़ी कर रखी हैं। सरकार का पूरा ध्यान इसी बात पर लगा है कि कैसे लोगों की जान बचाई जा सके या फिर जीवन का कम से कम नुकसान हो। वहीं ऐसे लोग भी कम नहीं हैं जिनके लिए महामारी ‘फलने-फूलने’ और अपनी सियासत चमकाने का मौका बन गया है। ऐसे लोगों में वह सभी दल और उनके नेता शामिल हैं जिन्हें लगता है कि अगले वर्ष उत्तर प्रदेश में होने वाले विधान सभा चुनाव में कोरोना महामारी से निपटने में योगी सरकार की सफलता अथवा असफलता बड़ा मुद्दा बन सकता है। इसीलिए गैर भाजपाई नेता लगातार इस प्रयास में लगे हुए हैं कि कोरोना महामारी की आड़ में योगी सरकार की जितनी फजीहत की जा सकती है, उतनी की जाए ताकि 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्हें इसका फायदा मिल सके।

यह हकीकत है कि यदि इस समय कोरोना महामारी का तांडव नहीं फैला होता तो सभी दलों के नेता चुनावी संग्राम में कूद कर शहर-शहर सभाएं कर रहे होते। प्रत्याशी टिकट के लिए हाथ-पैर मार रहे होते, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है तो इसका यह मतलब नहीं है कि नेताओं ने हार मान ली है। सभी दलों के नेता सोशल मीडिया के सहारे मिशन 2022 को पूरा करने में लगे हैं। यह नेता घर में बैठकर ट्विटर आदि के माध्यम से अपनी बात जन-जन तक पहुंचा रहे हैं। सोशल साइट्स पर नेता और उनके समर्थक आपस में उलझे हुए हैं। सब अपने को पाक-साफ और विरोधियों पर दोषारोपण में लगे हुए हैं। एक तरफ नेता अपनी सियासत चमकाने में लगे हैं तो दूसरी तरफ कुछ ऐसे लोग भी मैदान में कूदे हुए हैं जो अपने आप को बताते तो गैर-राजनैतिक हैं, लेकिन सियासत करने में नेताओं से पीछे नहीं हैं। इसमें किसान आंदोलन चला रहे राकेश टिकैत जैसे किसान नेता भी हैं तो कुछ बुद्धिजीवी और समाजसेवी भी किसी न किसी दल के पाले में आंख मूंदकर खड़े नजर आ रहे हैं।

AKHILESH-yogi-1-1499274997_835x547कुल मिलाकर विपक्ष इस कोशिश में है कि योगी सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर बड़ी की जा सके। इसके लिए कोरोना महामारी के सहारे योगी सरकार को घेरने से बड़ा कोई मुद्दा विपक्ष के पास नजर नहीं आ रहा है। लगातार चार वर्षों से योगी सरकार के खिलाफ मु्द्दे की तलाश कर रहे विपक्ष की कोरोना महामारी के चलते ‘पौ-बारह’ हो गई है। विपक्ष का ध्यान इस ओर बिल्कुल नहीं है कि योगी सरकार को कुछ सार्थक सुझाव दिए जाएं ताकि कोरोना से त्राहिमाम कर रही जनता को कुछ राहत मिल पाए, बल्कि कोशिश इस बात की है कि जनता को योगी सरकार के खिलाफ जितना हो सके उतना भड़काया जा सके। इसीलिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव प्रातः उठते ही अर्नगल बयानबाजी करने से बाज नहीं हा रहे हैं वहीं कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा का भी पूरा ध्यान इस ओर है कि कैसे योगी सरकार को नाकारा साबित किया जा सके। इसलिए वह कभी ट्विट करती हैं तो कभी चिट्ठी लिखती हैं। अच्छा होता प्रियंका वाड्रा यूपी सरकार पर कोरोना महामारी से निपटने में नाकामी का आरोप लगाते समय कांग्रेस शासित राज्यों के कुछ उदाहरण भी दे देतीं कि कैसे पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड की सरकारें कोरोना महामारी के खिलाफ निर्णायक जंग छेड़े हुए हैं, लेकिन उनके पास ऐसा कुछ कहने को है नहीं। कांग्रेस शासित राज्यों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। इन राज्यों की सरकारें कोरोना से निपटने के बजाए इस बात को लेकर ज्यादा चिंतित हैं कि कैसे मोदी सरकार को बदनाम किया जा सके।

महाराष्ट्र में मौत का तांडव होता रहा, न सोनिया के मुंह से बोल फूटे न राहुल-प्रियंका की जुबान खुली। महाराष्ट्र में किस तरह से लाशों का अंतिम संस्कार किया जा रहा है, वह शर्मनाक ही नहीं जघन्य अपराध की श्रेणी में भी आता है, लेकिन सत्ता का भूख के चलते सब मौन रहते हैं। यही स्थिति कमोवेश पंजाब की है, पंजाब के बारे में तो गांधी परिवार चाह कर भी मुंह नहीं खोल सकता है क्योंकि पंजाब में कांग्रेस का मतलब कैप्टन अमरिंदर सिंह है।

बात प्रियंका वाड्रा द्वारा मुख्यमंत्री योगी को लिखी गई चिट्ठी की कि जाए तो इस चिट्ठी में ऐसा कुछ नहीं लिखा गया है जिसे कोई सरकार गंभीरता से लेना चाहेगी। बिना किन्हीं तथ्यों के हवा में बातें करते हुए सीएम को पत्र लिख दिया गया है। वही ढिंढोरा ऑक्सीजन की कमी है, दवाओं की कालाबाजारी हो रही है, अस्पताल में मरीजों को इलाज नहीं मिल रहा है। यह समस्या पूरे देश की है, दिल्ली में भी यही हाल है और कांग्रेस शासित राज्यों की भी यही स्थिति है, लेकिन गांधी परिवार को बीजेपी शासित राज्यों के अलावा कहीं कुछ दिखाई-सुनाई ही नहीं देता है। इसीलिए तो यह बात दावे से कही जा रही है कि प्रियंका कोरोना महामारी की आड़ में मिशन-2022 पूरा करने की बिसात बिछाने में लगी हैं। इसी प्रकार कभी प्रियंका पूछती हैं कि पंचायत चुनाव क्यों हो रहे हैं ? कभी कहती हैं कि बीजेपी और मोदी ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में बड़ी-बड़ी जनसभाएं करके कोरोना को फैलाने का पाप किया है, लेकिन जब बात किसान आंदोलन की आती है तो गांधी परिवार किसान आंदोलन का समर्थन करने लगता है, उसे जरा भी नहीं लगता है कि कोरोना महामारी को देखते हुए किसानों को अपना आंदोलन वापस ले लेना चाहिए। कांग्रेस राकेश टिकैत के खिलाफ इसलिए मुंह बंद किए बैठी है क्योंकि उसे उम्मीद है कि 2022 के विधानसभा चुनाव के समय पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राकेश टिकैत की मदद से वह अपनी बंजर पड़ी सियासी जमीन को ‘उपजाऊ’ बना सकती है।

प्रियंका के तर्क और सुझाव कितने संजीदा हैं इसकी एक और बानगी उनके ताजा बयान में देखने को मिली जब उन्होंने बेकाबू होते कोरोना संक्रमण पर योगी सरकार को पत्र लिखकर सुझाव दिया कि वह लोगों को जेल में डालने और संपत्ति जब्त करने की जगह कोरोना से लड़ने में ध्यान केंद्रित करें। वरना प्रदेश की जनता उन्हें माफ नहीं कर पाएगी। अब प्रियंका किसकी संपत्ति नहीं जब्त करने और किसको जेल में नहीं डालने की बात कह रही हैं, वह यह भी स्पष्ट कर देतीं तो ज्यादा अच्छा रहता। क्या उन्हें बाहुबली मुख्तार अंसारी के जेल जाने से परेशानी है जिसको उनकी पंजाब सरकार ने बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक में गुहार लगाई थी या फिर कोई और वजह है या प्रियंका वाड्रा को गांधी परिवार की ओर से कथित रूप से अवैध रूप से अर्जित की गई संपत्ति जब्त होने का डर तो सता ही रहा है।

प्रियंका की तरह ही अखिलेश भी योगी सरकार के खिलाफ राग अलाप रहे हैं। उन्हें भी प्रियंका की तरह उठते-बैठते योगी सरकार में खामियां ही खामियां नजर आती हैं। ऐसा लग रहा है कोरोना को लेकर योगी सरकार कोई सार्थक प्रयास कर ही नहीं रही है। यह सच है कि हालात काफी गंभीर हैं, ऐसी चुनौती पहली बार आई है इसलिए ऐसा होना स्वभाविक भी है, पूरी दुनिया में हाहाकार मचा हुआ है तो यूपी कैसे अलग रह सकता है। एक तरफ महामारी तो दूसरी तरफ कालाबाजारी भी स्वास्थ्य सेवाओं को तार-तार करने में लगी है। विपक्षी नेताओं को योगी सरकार की चिंताओं को भी समझना चाहिए। ऐसे नहीं है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कोरोना महामारी के दौर में लोगों में भय फैलाने और संकट पैदा करने वालों को सख्त चेतावनी नहीं दे रहे हैं। यही नहीं, ऐसे लोगों पर रासुका तहत कार्रवाई भी की जा रही है। विपक्ष को इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि किस तरह से कुछ अस्पताल वाले ऑक्सीजन की कमी की झूठी बात कह कर दिक्कतों को और बढ़ा रहे हैं। कुछ अस्पताल ऑक्सीजन की कमी की बात कह रहे हैं लेकिन निरीक्षण के दौरान उनके पास पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है। ऐसे संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई के चेतावनी दी गई है। इसके अलावा जिन अस्पतालों के पास सही में ऑक्सीजन की कमी है, वे जिलाधिकारी या फिर मुख्य चिकित्सा अधिकारी से मिल कर अपनी दिक्कत दूर सकर सकते हैं। विपक्ष को जनता के बीच तनाव बढ़ाने की बजाए यह समझाना चाहिए कि प्रदेश में जरूरत के अनुसार ऑक्सीजन की सप्लाई के लिये व्यवस्था की जा रही है। योगी सरकार द्वारा ऑक्सीजन के ऑडिट से जुड़े दिशा-निर्देश भी जारी किये गये हैं। इसके तहत सभी सरकारी, प्राइवेट व कोविड अस्पताल सरकार को ऑक्सीजन का डाटा उपलब्ध करावाएंगे, जिलों से सभी अस्पतालों पर ऑक्सीजन की उपलब्धता पर निगरानी रखी जाएगी, इस डाटा से राज्य में ऑक्सीजन की आपूर्ति की वास्तविक स्थिति का पता चल जाएगा।

सबसे दुखद यह है कि विपक्ष तो योगी-मोदी सरकार पर हमलावर है ही, न्यायपालिका भी हालात नहीं समझ पा रही है। जब अदालते दूसरी संवैधानिक संस्थाओं के काम में दखलंदाजी करेंगी तो लोकतांत्रिक ढांचा मजबूत नहीं रह पाएगा। बात जहां तक कोरोना महामारी की है तो कोरोना मरीजों की संख्या अचानक बहुत बढ़ गई। इसके कारण ही अस्पतालों में बेड, दवाओं और ऑक्सीजन की तंगी हो गई। जिन अस्पतालों में पांच-दस मरीजों को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती थी, उनमें यकायक सौ-दो सौ मरीजों को उसकी आवश्यकता पड़े तो हालात हाथ से फिसलेंगे ही। अच्छा होता ऐसा न होता, लेकिन जब ऐसी स्थिति विकसित देशों तक में बन चुकी है तब फिर भारत की क्या बिसात है ? इस बुनियादी बात को सरकारों पर तंज कसने वाले राजनीतिक दलों और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया के उस वर्ग को भी समझना चाहिए, जो सरकारी तंत्र को नाकाम-निष्क्रिय बताने के लिए उत्साहित दिख रहा है। लब्बोलुआब यह है कि उत्तर प्रदेश में हालात जैसे भी हों, लेकिन विपक्ष का सरोकार यही है कि कैसे भी करके कोरोना महामारी से निपटने की योगी सरकार की कथित असफलता का ज्यादा से ज्यादा ढिंढोरा पीटा जाए ताकि अगले वर्ष होने वाले विधान सभा चुनाव में इसे मुद्दा बनाया जा सके। कोरोना माहमारी की ‘पटकथा’ अपने हिसाब से लिखकर विपक्ष मिशन 2022 को फतह करने का सपना देख रहा है।

सियासी नेता आपसी ‘टकराव’ में व्यस्त हैं, इसी का फायदा निजी अस्पताल उठा रहे हैं

171388-rahul-modiराजनैतिक आरोप-प्रत्यारोप एक ऐसा ओछा हथकंडा है, जिसके सहारे स्याह को सफेद और सफेद को स्याह कर देने का कुच्रक बेहद चालाकी और मक्कारी से हर समय चलाया जाता है। नेता और दल न तो समय देखते हैं, न मौका, उन्हें अपने प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने में ही सुकून मिलता है। सियासी दोषारोपण की राजनीति की वजह से ही कई ऐसे राज नहीं खुल पाते हैं जिस पर से पर्दा उठने से कई गुनाहगार जेल की सलाखों के पीछे पहुंच सकते हैं। महामारी के दौर में भी यही सब देखने को मिल रहा है। इसी के चलते उन लोगों के ऊपर शिकंजा नहीं कसा जा पा रहा है जो जीवन रक्षक दवाओं, इंजेक्शन, उपकरणों और ऑक्सीजन की कालाबाजारी में लगे हैं। झूठ का सहारा लेकर कोरोना पीड़ितों को मौत के मुंह में ढकेलने की साजिश रचते हैं।

इसकी सबसे बड़ी बानगी पिछले दिनों तब देखने को मिली जब लखनऊ के एक प्रतिष्ठित प्राइवेट अस्पताल के मालिकों ने अपने यहां ऑक्सीजन नहीं होने का बोर्ड चस्पा कर दिया। सरकार को इस बात की भनक लग गई कि अस्पताल वाले झूठ बोल रहे हैं। जाँच कराई गई तो पता चला कि अस्पताल में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन उपलब्ध था। इसके बाद अस्पताल ने माफी मांग कर अपना पल्ला झाड़ लिया, लेकिन सवाल यही है कि ऐसे अस्पताल संचालकों के खिलाफ रासुका के तहत कार्रवाई क्यों नहीं हुई। जब ऑक्सीजन की कालाबाजारी करने वालों पर रासुका लग सकती है तो इनका गुनाह तो और भी बड़ा हुआ। बात यहीं तक सीमित नहीं है। आज पूरे देश में कई छोटे ही नहीं, बड़े-बड़े निजी अस्पतालों के संचालक तक ऑक्सीजन की कमी का रोना रो रहे हैं, लेकिन क्या यह जरूरी नहीं था कि यह समय रहते अपने यहां ऑक्सीजन प्लांट लगा लेते।

एक-एक मरीज से लाखों रुपए के बिलों की वसूली करने वाले इन फाइव स्टार अस्पतालों की आमदनी दिन दूनी रात चैगनी बढ़ती है। अरबों रुपए की इनकी प्रॉपर्टी होती है, वेतन के नाम पर करोड़ों रुपए प्रतिमाह लेते हैं, लेकिन अपने यहां 60-70 लाख रुपए की मामूली लागत से ऑक्सीजन प्लांट लगाने की इन्होंने न जानें क्यों कभी कोशिश नहीं की। कल कांग्रेस की सरकार थी, आज मोदी सरकार है, कल कोई और सरकार होगी, जब भी इस तरह की समस्याए आएंगी तो विपक्षी दल इन बातों को अनदेखा करके सत्तारुढ़ दल को कोसना-काटना शुरू कर देते हैं, जिसके चलते तमाम गुनाहागार बच निकलते हैं। आज जो प्राइवेट अस्पताल वाले ऑक्सीजन की कमी का रोना पीटना मचाए हुए हैं, उन्हें क्या इस बात का अहसास नहीं था कि कोरोना की दूसरी लहर में ऑक्सीजन की कमी एक बड़ा फैक्टर होगा। फिर भी इन्होंने इसके लिए कोई कदम नहीं उठाया। आखिर अस्पताल वालों से अधिक सटीक जानकारी किसके पास होगी, फिर भी यह लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और अब ऑक्सीजन की कमी पर ड्रामेबाजी कर रहे हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। निजी अस्पताल मालिकों द्वारा अपने यहां ऑक्सीजन प्लांट नहीं लगाए जाने की वजह भी है। इनके लिए वेंटीलेटर, सीटी स्कैन, अल्ट्रासाउंड आदि मशीनें आदि सुविधाएं तो मोटी कमाई का जरिया होती हैं, लेकिन ऑक्सीजन प्लांट लगाने से भला क्या कमाई होगी। इसीलिए ऑक्सीजन प्लांट लगाना निजी अस्पताल मालिकों की प्राथमिकता में रहा ही नहीं दूसरी तरफ सरकार ने भी कोई ऐसे सख्त कायदे-कानून नहीं बनाए हैं जिसके चलते निजी अस्पतालों की मनमर्जी पर शिकंजा कसा जा सके। इनकी कोई जवाबदेही नहीं हैं। इसीलिए तो कहीं अस्पताल में मरीज को भर्ती नहीं किया जा रहा है तो कहीं मरीज के मर जाने के बाद भी उसके परिवार वालों से मोटी कमाई का रास्ता खुला रखा जाता है। यहां तक कि मरे हुए शख्स के लिए अस्पताल वाले परिवार से जूस और अन्य चीजें मंगाते रहते हैं। इन्हीं तमाम वजहों से लगता है कि निजी अस्पताल के मालिक महामारी का भी फायदा उठाने में लगे हैं। उन्हें पता है कि नेता तो आपस में उलझे हैं, ऐसे में उनके ऊपर कौन सवाल उठाएगा।

यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि देश में जो हालात हैं, उसका मुकाबला करने के लिए सभी राजनैतिक दलों को एकजुट होकर काम करना चाहिए। इससे सबसे बड़ा फायदा तो यही होगा कि जनता में विश्वास जगेगा, दूसरे महामारी के नाम पर लूटपाट करने वालों पर भी शिकंजा कसेगा। जिस दिन महामारी के दौर में लूटपाट करने वालों को पता चल जाएगा कि उन्हें कहीं से कोई राजनैतिक संरक्षण नहीं मिलेगा, उसी दिन से इनके होश ठिकाने आ जायेंगे। लेकिन इसके उलट हो क्या रहा है, नेतागण नीचा दिखाने की सियासत में फंसे हैं। कांग्रेस के शासन वाले राज्यों- पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के साथ झारखंड ने 01 मई से शुरू होने वाले अगले चरण के टीकाकरण अभियान पर अभी से जिस तरह संदेह जताना शुरू कर दिया है, उससे यही लगता है कि देश में आपदा के समय भी ओछी राजनीति करने का कोई मौका नहीं छोड़ा जा रहा है। बस कोई 19 तो कोई 20 है। कांग्रेस शासित चार राज्यों ने एक मई से टीकाकरण अभियान की हवा निकालने की अभी से तैयारी कर ली है। इसीलिए तो राज्य की कांग्रेस सरकारें केंद्र सरकार पर टीकों पर कब्जा कर लेने का आरोप लगा रही हैं। मकसद येनकेन प्रकारेणः केवल संकीर्ण राजनीतिक हित साधना है। यदि थोड़ी देर को यह मान भी लिया जाए कि इस आरोप में कुछ सत्यता है तो सवाल उठेगा कि आखिर अन्य गैर भाजपा शासित राज्यों के सामने वैसी कोई समस्या क्यों नहीं, जैसी इन चार राज्यों के समक्ष कथित तौर पर आने जा रही है? इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि केंद्र सरकार अपने हिस्से के टीके राज्यों को देने के लिए ही खरीद रही है। वास्तव में यह पहली बार नहीं, जब कांग्रेस की ओर से कोरोना संक्रमण अथवा टीकाकरण को लेकर क्षुद्र राजनीति की जा रही। कांग्रेस नेता राहुल गांधी तो टीकाकरण अभियान की तुलना नोटबंदी तक से कर चुके हैं। उन्हें हमेशा की तरह यही लगता है कि मोदी सरकार टीकाकरण अभियान के सहारे अपने पूंजीपति दोस्तों को फायदा पहुंचा रही है।

इससे हास्यास्पद क्या हो सकता है कि जो कांग्रेस पिछले वर्ष कोरोना महामारी के समय लॉकडाउन लगाने से लेकर मोदी सरकार को कोस रही थी, वही अब पूछ रही है कि मोदी सरकार लॉकडाउन क्यों नहीं लगा रही है। कांग्रेस की नीयत में खोट साफ दिखाई देता है। वह देश की अर्थव्यवस्था चौपट होते देखना चाहती है ताकि मोदी सरकार को कोसने का उसे मौका मिल सके। यह दुखद है कि चाहे लॉकडाउन की बात हो या फिर अन्य कदमों की अथवा टीकाकरण अभियान शुरू करने तक के केंद्र सरकार के फैसले रहे हों, कांग्रेस ने हर एक पर चुन-चुनकर सवाल उठाए। उन मामलों को लेकर भी सवाल उठाए गए, जिनमें ऐसा करने की गुंजाइश भी नहीं थी।

दरअसल, कांग्रेस का एकमात्र मकसद येन-केन प्रकारेण केंद्रीय सत्ता को नीचा दिखाना है, इसलिए उसके नेताओं ने कभी लॉकडाउन लगाने में देरी को लेकर सवाल उठाए तो कभी कहा कि उसे खत्म क्यों नहीं किया जाता? इसी तरह उन मसलों को लेकर भी केंद्र सरकार को घेरा गया, जिनके लिए राज्य सरकारें जवाबदेह थीं। आखिर इसे क्या कहेंगे कि कांग्रेस टीकाकरण अभियान को गति देने के लिए तो संकल्पित दिख रही है, लेकिन उसके कई बड़े नेताओं ने इस तथ्य को सार्वजनिक करना उचित नहीं समझा कि खुद उन्होंने टीका लगवा लिया है या नहीं ? कांग्रेसी नेता केवल यहीं तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने टीका बनाने अथवा उनका उत्पादन करने वाली भारतीय कंपनियों को कठघरे में खड़ा करने का भी काम इस हद तक किया कि उन्हें इस सवाल से दो-चार होना पड़ा कि क्या वे टीका बनाने वाली विदेशी कंपनियों की पैरवी कर रहे हैं? वैसे तो कोई भी दल ऐसा नहीं, जिसने कोरोना संकट के समय संकीर्ण राजनीति का परिचय न दिया हो, लेकिन इस मामले में कांग्रेस का कोई जोड़ नहीं। शायद उसे यह बुनियादी बात पता ही नहीं कि गहन संकट के समय राजनीतिक क्षुद्रता का परिचय देकर पार्टी को नुकसान पहुंचाने के अलावा और कुछ हासिल नहीं होगा।

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