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ईवीएम से नहीं हो सकती है छेड़छाड़ क्योंकि ……

VVPATनई दिल्ली। लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम आने से पहले ही कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने ईवीएम पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। ईवीएम के मुदृे पर विपक्ष ने योजनाबद्ध ढंग से झूठा प्रचार भी शुरू कर दिया है। यह वही विपक्ष है जब चुनाव आयोग ने कुछ समय पहले सभी दलों को चुनौती दी थी कि वे ईवीएम में छेडछाड करके दिखाए। साबित करें लेकिन तब कोई दल आगे नहीं आया। ईवीएम को लेकर कुछ सवालों के उत्तर चुनाव आयोग ने भी समय समय पर दिए हैं जिससे यह साबित होता है कि देश में एक वर्ग बिना किसी आधार के देश के चुनाव प्रक्रिया पर संदेह खडा करने की कोशिश कर रहा है ताकि देश की जनता का भरोसा ही उठ जाए। इन सवालों और उत्तर के जरिए आप ईवीएम के बारे में जानाकरी हासिल कर सकते हैं।तमाम Exit Poll में भाजपा के नेतृत्व में NDA को बहुमत मिलता लिखाया गया है। ऐसे में एक बार फिर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) चर्चा में है। विपक्ष के नेता EVM पर सवाल उठा रहे हैं। हर बार हारने वाली पार्टियां EVM पर सवाल उठाती हैं। दूसरी तरफ जीतने वाली पार्टी इसे अपनी नीतियों और वादों की जीत बताती हैं।इससे पहले EVM पर यूपी, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, गुजरात, दिल्ली निगर निगम चुनाव में भी उंगली उठ चुकी है। मायावती, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, हरीश रावत, चंद्रबाबू नायडू और अखिलेश यादव सहित कई बड़े राष्ट्रीय नेता EVM को विलन के तौर पर पेश कर चुके हैं। EVM पर उठते इतने सवालों के बीच चलिए जानें असल में EVM क्या है? कैसे काम करती है और क्या इसमें टेंपरिंग हो सकती है?

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन क्या है? इसकी कार्यप्रणाली मतदान करने की पारम्परिक प्रणाली से किस प्रकार भिन्न है?

VVPAT (1)इस सवाल के उत्तर में बताया गया है कि इलेक्ट्रिनिक वोटिंग मशीन पांच-मीटर केबल द्वारा जुड़ी दो यूनिटों-एक कंट्रोल यूनिट एवं एक बैलेटिंग यूनिट-से बनी होती है। कंट्रोल यूनिट पीठासीन अधिकारी या मतदान अधिकारी के पास होती है तथा बैलेटिंग यूनिट वोटिंग कम्पार्टमेंट के अंदर रखी होती है। बैलेट पेपर जारी करने के बजाए, कंट्रोल यूनिट का प्रभारी मतदान अधिकारी बैलेट बटन को दबाएगा। यह मतदाता को बैलेटिंग यूनिट पर अपनी पसंद के अभ्यर्थी एवं प्रतीक के सामने नीले बटन को दबाकर अपना मत डालने के लिए सक्षम बनाएगा। वर्ष 1989-90 में विनिर्मित इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का प्रयोगात्मक आधार पर पहली बार नवम्बर, 1998 में आयोजित 16 विधानसभाओं के साधारण निर्वाचनों में इस्तेमाल किया गया। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें को ढेरों बैठकें करने, प्रोटोटाइपों की परीक्षण-जांच करने एवं व्यापक फील्ड ट्रायलों के बाद दो सार्वजनिक उपक्रमों अर्थात भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बेंगलुरु एवं इलेक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन ऑफ इण्डिया, हैदराबाद के सहयोग से निर्वाचन आयोग द्वारा तैयार एवं डिजाइन की गई है अब, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें उपर्युक्त दो उपक्रमों द्वारा विनिर्मित की जाती हैं।भारत में चुनावों के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का इस्तेमाल किया जाता है। इससे पहले बैलेट पेपर का इस्तेमाल करके चुनाव प्रक्रिया को पूरा किया जाता था। लेकिन 1980 के दशक में प्रायोगिक तौर पर शुरू होने के बाद पिछले करीब दो दशक से लगभग हर चुनाव में ईवीएम का ही इस्तेमाल होता है। बैलेट पेपर के मुकाबले ईवीएम प्रणाली ज्यादा तेज और सुरक्षित मानी जाती है। इसके अलावा पर्यावरण के लिहाज से भी इसके इस्तेमाल को उचित ठहराया जाता है, क्योंकि इसमें पेपर का इस्तेमाल नहीं होता। यही नहीं पेपर बैलेट के मुकाबले ईवीएम के माध्यम को सस्ता भी समझा जाता है।

EVM को भारत में दो जगहों पर बनाया जाता है – 

1. भारत इलेक्ट्रॉनिक लीमिटेड (बेंगलुरु)।
2. इलेक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (हैदराबाद)।

कैसे काम करती है EVM
EVM के दो हिस्से होते हैं, बैलेटिंग यूनिट और कंट्रोल यूनिट। बैलेटिंग यूनिट दरअसल वह हिस्सा होता है जो एक मतदाता के सामने होता है। इसमें अलग-अलग प्रत्याशियों के नाम और चुनाव चिन्ह होते हैं। उनके सामने बटन होते हैं। मतदाता अपनी पसंद के जिस भी प्रत्याशी को वोट देना चाहता है उसके सामने वाले बटन को दबाता है, जिसके बाद प्रत्याशी के सामने लाइट जलती है और एक बीप की आवाज भी आती है। एक मशीन में अधिकत्तम 16 प्रत्याशियों के नाम हो सकते हैं। 16 से ज्यादा प्रत्याशी होने पर ज्यादा से ज्यादा 4 मशीनें एक साथ लगाई जा सकती हैं यानि 64 प्रत्याशियों तक को ईवीएम से जोड़ा जा सकता है। इस बैलेटिंग यूनिट को एक कंट्रोल यूनिट के साथ कनेक्ट किया जाता है। जब भी कोई नया वोटर मतदान के लिए आता है तो सारी जांच प्रक्रिया पूरी करने का बाद चुनाव अधिकारी कंट्रोल यूनिट पर बैलेट बटन को दबाता है, जिससे बैलेटिंग यूनिट एक्टीवेट हो जाती है और मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकता है। एक बार चुनाव अधिकारी द्वारा बैलेट बटन दबाने पर बैलेटिंग यूनिट से एक वोट मिलने के बाद वह फिर से डिएक्टिवेट हो जाती है। एक बार इतने वोट पड़ जाने के बाद मशीन को क्लोज का बटन दबाकर बंद कर दिया जाता है। बाद में टोटल का बटन दबाकर चुनाव अधिकार कुल वोट की जांच करके क्षेत्र में हुए कुल मतदान की जानकारी चुनाव आयोग को देता है। कुल वोट की गिनती करने के बाद मशीन को मतगणना की तारीख तक के लिए सील कर दिया जाता है।

EVM में टेंपरिंग हो सकती है? 
विपक्ष बार-बार ईवीएम से छेड़छाड़ का आरोप लगा रहा है तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सच में ईवीएम टेंपरिंग हो सकती है? क्या सच में आम लोगों के मत के खिलाफ ईवीएम से छेड़छाड़ करके परिणाम लाया जा सकता है। इसका जवाब यह है कि इंसान की बनाई कोई भी मशीन ऐसी नहीं है, जिसके साथ छेड़छाड़ नहीं हो सकती। हां, ईवीएम में इतने कड़े सुरक्षा प्रबंध किए गए हैं कि इससे छेड़छाड़ लगभग ना मुमकिन है, फिर भी कुछ फीसद गुंजाइश बची रह जाती है। इससे पार पाने के लिए भारत वीवीपैट (वोटर वैरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल) का इस्तेमाल करने की तरफ कदम बढ़ा चुका है।

टेंपरिंग पर अमेरिकी विश्वविद्यालय का शोध 
साल 2010 में अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने ईवीएम टेंपरिंग को साबित किया था। उन्होंने EVM से एक डिवाइस जोड़कर अपने मोबाइल से एक टेक्स्ट मैसेज के जरिए इसके रिजल्ट को प्रभावित करके दिखाया था। इसमें उन्होंने कंट्रोल यूनिट की असली डिस्प्ले को बिल्कुल वैसी ही दिखने वाली नकली डिस्प्ले से बदल दिया था, जिसके अंदर उन्होंने ब्लूटूथ माइक्रोप्रोसेसर लगा दिया था। इसके बाद नकली डिस्प्ले ने असली रिजल्ट दिखाने की बजाय, जो रिजल्ट शोधकर्ता दिखाना चाहते थे वही दिखाया। शोधकर्ताओं का कहना था कि इस डिस्प्ले और माइक्रोप्रोसेसर को मतदान और मतगणना के बीच बदला जा सकता है।

क्यों नहीं हो सकती है EVM  टेंपरिंग 
चुनाव आयोग बार-बार कह चुका है कि भारत में इस्तेमाल होने वाली ईवीएम से किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं हो सकती। मशीन का कोड पूरी तरह से एमबेडिड है, उसे न तो निकाला जा सकता है और न ही डाला जा सकता है। पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने भी ऐसी किसी संभावना को नकारा है, हालांकि वे भी चुनाव प्रक्रिया को और ज्यादा पारदर्शी बनाने की हिमायत करते हैं। कुरैशी के अनुसार चुनाव से महीनों पहले राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों की देखरेख में ईवीएम की अच्छे से जांच की जाती है। चुनाव से 13 दिन पहले उम्मीदवारों के नाम तय होने के बाद एक बार फिर प्रत्याशियों या पार्टी प्रतिनिधियों के सामने मशीनों का परीक्षण होता है। जब मशीन ठीक से काम करती हैं तो उनसे दस्तखत भी लिए जाते हैं।

मशीन की सील पर भी पार्टियों के दस्तखत 
इसके बाद भी मशीन को बूथ पर भेजे जाने से पहले मशीनों को एक नाजुक से पेपर से सील किया जाता है। इस सील पर यूनीक सिक्योरिटी नंबर होता है। यह पेपर बहुत नाजुक होता है और हल्की सी छेड़छाड़ का भी पता चल जाता है। मशीन पर सील लगाने के बाद हर उम्मीदवार या पार्टी प्रतिनिधि के उस पर दस्तखत कराए जाते हैं।

मतदान केंद्र पर गहन जांच 
मतदान केंद्र पर भी मतदान शुरू होने से पहले करीब एक घंटे तक वोटिंग की मॉक ड्रिल की जाती है। इस दौरान पोलिंग मशीन पर सभी बटनों को दबाते हुए 60-100 वोट डाले जाते हैं। ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मशीन में कोई भी दो बटन एक ही पार्टी के पक्ष में मतदान न कर रहे हों। इसके अलावा किसी पार्टी के लिए कोई खास बटन तय नहीं है। क्षेत्र विशेष में चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के नामों के आधार पर अल्फाबेटिक ऑर्डर से उनके नाम लिखे होते हैं। इस तरह से कभी निर्दलीय, कभी क्षेत्रीय तो कभी बड़ी पार्टी के उम्मीदवारों के नाम सबसे ऊपर होते हैं।

क्या मतदान के बाद हो सकती है टेंपरिंग 
मिशिगन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अनुसार दूसरा तरीका मशीन की मेमोरी को बदलने का है। उनके बताए गए दोनों तरीके इसलिए धराशायी हो जाते हैं, क्योंकि वोटिंग के बाद मशीनों को कड़ी त्रिस्तरीय सुरक्षा के बीच स्ट्रॉन्ग रूम में रखा जाता है। यहां बड़े से बड़े वीवीआईपी को भी एंट्री नहीं मिलती है। ऐसे में डिस्प्ले या मेमोरी बदलने की गुंजाइश लगभग खत्म हो जाती है। ईवीएम को मतदान केंद्र से स्ट्रांग रूम तक ले जाने के दौरान ऐसा हो सकता है, लेकिन इतने कम समय में ऐसा काम वह भी जबरदस्त सुरक्षा व्यवस्था को भेदते हुए आसान नहीं है। चुनावों में इतनी बड़ी संख्या में इस्तेमाल होने वाली ईवीएम की मेमोरी या डिस्प्ले बदलना और उन्हें ब्लूटूथ डिवाइस से कंट्रोल करना एक असंभव जैसा काम लगता है।

विश्वास करने की एक और वजह
EVM पर विश्वास करने की अब तो एक वजह और भी है। चुनाव आयोग ने Lok Sabha Election 2019 में हर EVM के साथ वोटर वैरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) का इस्तेमाल किया है। यही नहीं हर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में किसी एक विधानसभा क्षेत्र की 5 EVM का VVPAT से मिलान होगा।

एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठता है कि क्या हमारे देश की जनसंख्या के एक काफी बड़े हिस्से के निरक्षर होने के परिणामस्वरूप क्या इससे निरक्षर मतदाताओं के लिए समस्या नहीं उत्पन्न होगी? तो चुनाव आयोग का कहना है कि ईवीएम के द्वारा मतदान किया जाना पारम्परिक प्रणाली की तुलना में कहीं अधिक सरल है जिसमें एक व्यक्ति को अपनी-अपनी पसंद के अभ्यर्थी के प्रतीक पर या उसके समीप मतदान का निशान लगाना पड़ता है, पहले उसे उर्द्धवाधर रूप में और फिर क्षैतिज रूप में मोड़ना पड़ता है और उसके बाद उसे मत पेटी में डालना पड़ता है। ईवीएम में, मतदाता को केवल अपनी पसंद के अभ्यर्थी एवं प्रतीक के सामने नीला बटल दबाना होता है और मत दर्ज हो जाता है। ग्रामीण एवं निरक्षर लोगों को अपना मत दर्ज करने में कोई कठिनाई नहीं होती है और उन्होंने तो बल्कि ईवीएम के उपयोग का स्वागत किया है।

क्या ईवीएम के उपयोग से बूथ-कैप्चरिंग को रोका जा सकता है? यदि बूथ कैप्चरिंग को उपद्रवियों द्वारा मतदान कर्मियों को धमकाने तथा मतदान पत्रों में प्रतीक पर मुहर लगाने तथा चंद मिनटों में भाग निकलने के मामले के रूप में देखा जाता है तो इसे ईवीएम के उपयोग द्वारा रोका जा सकता है। ईवीएम की प्रोग्रामिंग इस प्रकार की गई है कि मशीनें एक मिनट में केवल पांच मतों को ही दर्ज करेंगी। चूंकि मतों का दर्ज किया जाना अनिवार्य रूप से कंट्रोल यूनिट तथा बैलेटिंग यूनिट के माध्यम से ही किया जाना, इसलिए उपद्रवियों की संख्या चाहे कितनी भी हो वे केवल 5 पांचमत प्रति मिनट की दर से ही मत दर्ज कर सकते हैं। मत पत्रों के मामले में, उपद्रवी एक मतदान केन्द्र के लिए सभी 1000 विषम मत पत्रों को आपस में बांट सकते हैं, उन पर मुहर लगा सकते हैं, उन्हें मत पेटियों में ठूंस सकते हैं तथा पुलिस बलों के अधिक संख्या में पहुंचने से पहले भाग सकते हैं। प्रत्येक आधे घंटे में उपद्रवी अधिकतम 150 मतों को ही दर्ज कर सकते हैं और तब तक इस बात की संभावनाएं हैं कि पुलिस बल पहुंच जाए। इसके अतिरिक्त, पीठासीन अधिकारी या मतदान अधिकारी द्वारा मतदान केन्द्र के भीतर जैसे ही कुछ बाहरी व्यक्तियों को देखा जाए तो उनके पास “बंद” बटन दबाने का विकल्प हमेशा रहेगा। एक बार ‘बंद’ बटन दबा देने के पश्चात कोई भी मत दर्ज करना संभव नहीं होगा और इससे बूथ पर कब्जा करने वालों का प्रयास निष्फल हो जाएगा।

ईवीएम के उपयोग के क्या-क्या फायदे हैं? चुनाव आयोग का कहना है कि सबसे महत्वमपूर्ण फायदा यह है कि लाखों-करोड़ों की संख्या में मतपत्रों की छपाई से बचा जा सकता है क्योंकि प्रत्येक अलग-अलग निर्वाचक के लिए एक मत पत्र के बजाय प्रत्येक मतदान केन्द्र पर बैलेटिंग यूनिट पर केवल एक मत पत्र लगाया जाना अपेक्षित है। इसके परिणामस्व्रूप कागज, मुद्रण, परिवहन, भंडारण एवं वितरण की लागत के रूप में भारी बचत होती है। दूसरे, मतगणना बहुत तेजी से होती है और पारम्परिक प्रणाली के अंतर्गत औसतन, 30-40 घंटों की तुलना में 2 से 3 घंटों के भीतर परिणाम घोषित किए जा सकते हैं। एक सवाल यह भी उठता है कि क्या ईवीएम का उपयोग मतदान की गति धीमी कर देता है? तो इसका उत्तर नहीं है। दरअसल, ईवीएम उपयोग से मतदान की गति और तेज हो जाती है क्योंकि मतदाता के लिए यह आवश्यक नहीं होता है कि पहले वह मतपत्र को खोलें, अपनी पसंद चिह्नित करें, फिर उसे मोड़ें और वहां जाएं जहां मत पेटी रखी गई है और उसे पेटी में डालें। ईवीएम प्रणाली के अंतर्गत उसे केवल अपनी पसंद के अभ्यर्थी एवं प्रतीक के समीप बटन को दबाना होता है।

क्या बटन को बार-बार दबाकर एक से अधिक बार मतदान करना सम्भव है?
नहीं जैसे ही बैलेटिंग यूनिट पर एक विशेष बटन को दबाया जाता है, उस विशेष अभ्यर्थी के लिए मत दर्ज हो जाता है और मशीन लॉक हो जाती है। उस परिस्थिति में भी जब (चाहे) कोई व्यक्ति उस बटन को या किसी अन्य बटन को आगे और दबाता है, तो और कोई भी मत दर्ज नहीं होगा। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें इस तरह से ”एक व्यक्ति, एक मत” का सिद्धांत सुनिश्चित करती हैं। जैसे ही मतदाता अपनी पसंद के अभ्यर्थी और प्रतीक के सामने लगे ”नीले बटन” को दबाता है, प्रतीक के बायीं ओर लगे एक छोटे-से लैम्प में लाल बत्ती जल उठती है और साथ ही साथ, एक लम्बी बीप ध्वनि सुनाई देती है। इस प्रकार, मतदाता को आश्वस्त करने के लिए ऑडियो और वीडियो दोनों में संकेत मैजूद होते है कि उसका मत दर्ज हो गया है।

जाहिर है चुनाव आयोग अपनी ओर से निष्पक्ष चुनाव के कदम उठता है लेकिन बात यदि राजनीति की जाए तो ईवीएम को लेकर सवाल उठते रहे हैं खास तौर से हारने वाली पार्टियां इस तरह के सवाल उठती है। राजनीति कारणों में एक वजह श्ह भी हो सकती है कि हार का ठीकरा ईवीएम पर फूटे। कम से कम केजरीवाली और मायावती की विधानसभा चुनाव में हार से तो यही संकेत निकलता है।

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