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कांग्रेस का ओल्ड गार्ड राहुल गांधी के लिये सबसे बडी चुनौती

rahul-gandhiनई दिल्ली  ( नन्दिनी सिंह )  कांग्रेस पार्टी में पिछले काफी लंबे समय से ओल्ड गार्ड – न्यू गार्ड के बीच गतिरोध की खबरें आती रही हैं. राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष बनने के समय से यह सिलसिला जारी है और इसी हफ्ते हुयी कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक के बाद भी इस तरह के आंतरिक टकराव की खबरें लगातार आ रही हैं.सबसे बडी समस्या जो पार्टी के भीतर है और जिसे कोई वरिष्ठ नेता पब्लिकली स्वीकार नहीं करना चाहता परंतु अनौपचारिक बातचीत में दबी ज़ुबान से हमेशा उनका दर्द नज़र आता है, वह है कि पार्टी का ओल्ड गार्ड राहुल गांधी को फिर से अध्यक्ष के रूप में देखने की किसी जल्दबाज़ी में नहीं है. वे सभी चाहते हैं कि जितना समय सोनिया गांधी अध्यक्ष बनी रह सकें, उतना ही अच्छा.

पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को राहुल गांधी की अध्यक्षता में स्वयं के लिये ही खतरा नज़र आता है. उन्हें लगता है कि राहुल फिर से अध्यक्ष बने तो उनकी ड्राइंग रूम राजनीति समाप्त हो जायेगी, ट्विटर पर चला रहे राजनीतिक दांव पेंचों का अंत हो जायेगा. पार्टी के अधिकांश वरिष्ठ नेता जनाधार वाले नेता नहीं हैं. पार्टी अध्यक्ष की चापलूसी करके, जी-हुज़ूरी करके अपना अस्तित्व व प्रभुत्व बनाये रखते आये हैं, राहुल गांधी के साथ यह संभव नहीं है.राहुल की उदारवादी मानसिकता, खुलापन, बेबाकी, हायरार्की, पार्टी ऑर्डर को न मानना, परिपाटी से हटकर सोचना, ये कांग्रेस के ओल्ड गार्ड के तौर-तरीकों से मेल नहीं खाता. एक विडम्बना यह भी है कि ये वरिष्ठ कांग्रेसी चाहे राहुल को नापसंद करने में एकजुट हों परंतु वे अध्यक्ष के रूप में अपने में से किसी को भी स्वीकार नहीं करेंगे. गांधी परिवार के अतिरिक्त किसी और की अध्यक्षता भी उन्हें स्वीकार नहीं है इसलिये राहुल के अध्यक्ष पद छोडने के बाद किसी नाम पर विचार तक नहीं किया गया और सोनिया गांधी को ही वापिस अध्यक्ष बना दिया गया.

बैठकों में राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाये जाने की मांग अगर किसी वरिष्ठ नेता द्वारा की भी जाती है तो वह सिर्फ रस्म अदायगी होती है. पार्टी के सीनियर नेता चाहते हैं कि जब तक हो सके सोनिया गांधी ही अध्यक्ष रहें जिससे उनका अपना प्रभुत्व कायम रह सके. इतने लंबे समय में उन्होंने सोनिया को किस तरह गुड ह्यूमर में रखना है, ये सीख लिया है.राहुल गांधी को मज़बूत करने की बजाय, वरिष्ठ नेताओं को उनकी फजीयत होते देखने में सैडिस्टिक प्लैज़र मिलने लगा है इसलिये जब भाजपा राहुल गांधी पर वार कर रही होती है, उनपर कटाक्ष कर रही होती है, कोई वरिष्ठ नेता राहुल के समर्थन में ट्वीट करता भी नज़र नहीं आता. राहुल गांधी की टीम के सदस्य जब पार्टी छोडकर जाते हैं तो ये सीनियर्स के लिये जश्न का मौका होता है. ज्योतिरादित्य सिंधिया को रोकने की वरिष्ठ नेताओं ने कोई कोशिश नहीं की बल्कि सोनिया गांधी को समझाते रहे कि उनके जाने से मध्य प्रदेश में सरकार को कोई खतरा नहीं है.

एक और काम जो पार्टी के वरिष्ठ नेता बडी चालाकी और एकजुटता से करते हैं, वह है राहुल गांधी के टीम के सदस्यों को सोनिया गांधी की नज़रों में गिराना, उनके बीच दूरियां बढाना. राहुल की टीम बिगडती रहे, इसमें सीनियर्स काफी समय व्यतीत करते हैं, पार्टी हित पर ध्यान देने की बजाय.इन वरिष्ठ नेताओं का भाग्य कहें या राहुल गांधी का दुर्भाग्य कि इलोक्टोरल सक्सेस राहुल से दूर रही है, पार्टी का प्रदर्शन उनके नेतृत्व में अच्छा नहीं रहा जिससे इन नेताओं को सोनिया गांधी को यह समझाने का बल मिल गया कि वे ही अध्यक्ष बनी रहें.सोनिया गांधी की दुविधा ये है कि वे अपने पुत्र को राज-पाट सौंपना चाहती हैं परंतु दरबारी उन्हें ऐसा न करने के कई परोक्ष कारण समझाते रहते हैं. इन दरबारियों ने आपस में तय कर रखा है कि राहुल के लिये स्थितियां इतनी विकट कर दी जायें कि वे स्वयं ही ज़िम्मेदारी लेने से दूर भागते रहें. इन मंझे हुये दरबारियों की चालें इतनी गहरी हैं कि सोनिया गांधी तक इस षडयंत्र में मोहरा बनने से खुद को बचा नहीं पायीं. स्थिति इतनी गंभीर है कि कार्यसमिति की बैठकों में राहुल के साथ केवल प्रियंका गांधी ही खडी नज़र आती हैं, कोई वरिष्ठ नेता उनकी बात का समर्थन तक नहीं करता. सोनिया गांधी एक लाचार बुज़ुर्ग की तरह मौन धारण किये रहती हैं.

राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी ने अगर चुनावी सफलता पायी होती तो इन सीनियर नेताओं के सामने राहुल को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता परंतु अभी ये राहुल के नाकाबिल होने की ओर इनडायरेक्टली इशारा करते हुये, लामबंद हैं और सोनिया गांधी को भी निर्णायक पहल करने के प्रति आशंकित करते रहते हैं.कांग्रेस के सामने एक ही विकल्प है पार्टी का अस्तित्व बचाये रखने का कि राहुल गांधी को फिर अध्यक्ष बनाया जाये, केन्द्रीय स्तर से लेकर राज्यों तक उनकी टीम बने और एकजुटता के साथ पार्टी प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभाये व अगले लोकसभा चुनावों की रणनीति पर पूरी गंभीरता से काम करे. पार्टी की अंदरूनी गुटबाज़ी भी हार का एक बडा कारण रही है.राहुल गांधी को ये देश स्वीकार करेगा या नहीं, इससे पहले सवाल ये है कि उनकी अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता उन्हें गंभीरता से काम करने देंगे या नहीं?

nandni

 

नन्दिनी सिंह ने एक दशक से अधिक समय तक ब्रिटेन और जर्मनी में पत्रकारिता की है. हाल ही में उनका अंग्रेज़ी उपन्यास, ए हाउस ऑफ बटरफ्लाइज़: स्टोरी अबाउट ए विमेन्स हॉस्टल भी प्रकाशित हुआ है.

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