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पार्टी को छोड़ छुट्टियां मनाने चले गए राहुल गांधी

राहुल गांधी में गंभीरता की कमी

वैसे छुट्टियां मनाने जाना कोई गलत बात नहीं है. लेकिन इतने महत्वपूर्ण समय पर राहुल गांधी (Rahul Gandhi) का विदेश जाना बताता है कि पार्टी को लेकर उनकी गंभीरता कितनी कम है. 3 दिन पहले तक वो राष्ट्रपति से मुलाकात करके किसानों के पक्ष में बयान दे रहे थे. राहुल गांधी  का जोश देखकर लग रहा था कि शायद वो किसानों के आंदोलन में पहुंचकर वहीं धरना देना शुरू कर देंगे.गौरतलब है कि हमने तीन दिन पहले ही ये आशंका जता दी थी कि राहुल गांधी TV कैमरों के सामने बयान देकर एक बार फिर छुट्टियों पर निकल सकते हैं. हमारी आशंका बिल्कुल सही साबित हुई और राहुल गांधी इटली के लिए रवाना हो गए.
 पार्ट टाइम राजनेता हैं राहुल गांधी

वैसे किसानों को लेकर राहुल गांधी की गंभीरता तो पहले से ही सवालों के घेरे में रही है. लेकिन पार्टी के स्थापना दिवस के मौके पर इस तरह से उनका विदेश चले जाना एक बार फिर से साबित करता है कि वो एक ऐसे पार्ट टाइम राजनेता हैं, जिनका फुल टाइम शौक है अहम मौकों पर छुट्टियां मनाने निकल जाना.राहुल गांधी ने कुछ दिनों पहले भी किसानों के मुद्दे पर देश के राष्ट्रपति से मुलाकात की थी और उसके फौरन बाद वो छुट्टियां मनाने गोवा चले गए थे. आज किसानों के आंदोलन को 33 दिन हो चुके हैं और इन 33 दिनों में राहुल गांधी ने किसानों के मुद्दे पर 30 ट्वीट किए हैं. लेकिन राहुल गांधी हर बार ट्वीट करते हैं, टीवी कैमरों के सामने आते हैं और फिर छुट्टियां मनाने कहीं ना कहीं चले जाते हैं.

प्रवक्ता कर रहे राहुल गांधी का बचाव

अब कांग्रेस के प्रवक्ताओं का कहना है कि वो अपनी नानी से मिलने इटली गए हैं. पार्टी के 136वें स्थापना दिवस पर राहुल गांधी की गैर मौजूदगी पर कांग्रेस रक्षात्मक होकर बचाव कर रही है और कह रही है कि ये उनका निजी कार्यक्रम है. लेकिन सवाल ये उठता है कि राहुल गांधी जैसे नेता के ऐसा करने पर पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच जो असंतोष और निराशा फैलती है, उससे कांग्रेस कैसे निपटेगी?लेकिन वायनाड से कांग्रेस के सांसद राहुल गांधी राजनीति को लेकर कितने गंभीर हैं देश इसे लंबे समय से देख रहा है और पार्टी के प्रति गंभीरता की इस कमी की वजह से ही आज कांग्रेस 52 सीटों पर सिमट चुकी है.

अहम मौकों पर पार्टी को छोड़ छुट्टियां मनाने चले गए राहुल

आप सोचिए कि आज कांग्रेस पार्टी की वजह से ही राहुल गांधी को देशभर में पहचान मिली है. इसी पहचान के आधार पर उन्हें सरकार से सुरक्षा मिली है और रहने के लिए बड़ा सा बंगला मिला हुआ है. उसी पार्टी को वो इतने अहम मौके पर छोड़कर विदेश में छुट्टियां मना रहे हैं.राहुल गांधी किसानों के साथ-साथ अपनी पार्टी को भी अधर में छोड़कर विदेश जा चुके हैं. वो चाहते तो छुट्टियों पर जाने का अपना कार्यक्रम एक दो दिन के लिए टाल सकते थे. इसी तरह अगर वो किसानों की समस्याओं के लिए गंभीर होते तो आंदोलन वाली जगह पर पहुंचकर सर्द रातों में किसानों का साथ दे सकते थे.वो चाहते तो अपने लिए एक फाइव स्टार कैंप की व्यवस्था कर लेते. लेकिन इस तरह से वैकेशन मोड (Vacation Mode) पर जाकर उन्होंने ये बता दिया कि वो अपने ही द्वारा उठाए गए मुद्दों को लेकर कितने गंभीर हैं.मुद्दों को लेकर गंभीरता तो छोड़िए राहुल गांधी अपनी बातों पर भी कायम नहीं रहते. आज वो नए कृषि कानूनों का ये कहकर विरोध कर रहे हैं कि इससे किसानों को उनकी फसलों के सही दाम नहीं मिल पाएंगे.

राहुल गांधी का यू टर्न

लेकिन वर्ष 2015 में जब राहुल गांधी अमेठी से सांसद हुआ करते थे तब उन्होंने लोक सभा में एक बयान देकर कहा था कि बिचौलियों की वजह से किसानों को उनकी फसल का सही दाम नहीं मिल पाता. आपको राहुल गांधी की यू टर्न वाली पॉलिटिक्स को सही साबित करने वाला ये बयान जरूर सुनना चाहिए.ये पहली बार नहीं है कि जब राहुल गांधी किसी अहम मौके पर ऐसे अचानक छुट्टियों पर गए हैं. इसी वर्ष फरवरी में मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार संकट में थी तब भी राहुल गांधी विदेश में थे. इसी साल बिहार चुनाव के दौरान वो छुट्टियां मनाने शिमला चले गए थे. वर्ष 2019 में हरियाणा और महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार के दौरान भी राहुल गांधी ज्यादातर मौकों पर गायब रहे.लोकसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, राहुल गांधी ने वर्ष 2015 से नवंबर 2019 तक 247 विदेश यात्राएं कीं. यानी राहुल गांधी ने हर वर्ष औसतन 62 विदेश यात्राएं कीं और हर महीने करीब 5 बार राहुल गांधी अपनी पार्टी को छोड़कर विदेश में थे.

कांग्रेस के स्थापना दिवस के मौके पर कांग्रेस के इतिहास का विश्लेषण जरूरी हो जाता है ताकि ये समझा जा सके कि जिस पार्टी को भारत की आजादी के बाद महात्मा गांधी एक समाज सेवी संस्था में बदलना चाहते थे, वो नेताओं के सत्ता के लालच में कैसे एक परिवार सेवी पार्टी में बदल गई.विडंबना ये है कि परिवारवाद कैसे किसी देश को बर्बाद कर सकता है, इसे खुद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपने एक भाषण में बयान किया था. 15 अगस्त 1960 को लाल किले से दिए गए अपने एक भाषण में जवाहर लाल नेहरू ने ये कहा था कि अगर भारत के लोग देश से पहले अपनी जाति, समुदाय या खानदान को आगे रखने लगेंगे तो देश का पतन शुरू हो जाएगा.हालांकि ये विडंबना है कि जवाहर लाल नेहरू जब ये भाषण दे रहे थे उससे एक वर्ष पहले ही उनकी पुत्री और देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जा चुका था. इसलिए आज आप राजनीति के इस विरोधाभास को समझिए. अब कांग्रेस की प्रासंगिकता को समझने के लिए आपको कांग्रेस के इतिहास के बारे में जानना चाहिए.कांग्रेस की स्थापना एक ब्रिटिश व्यक्ति ने की थी. जिनका नाम था ए. ओ. ह्यूम (A. O. Hume). ए. ओ. ह्यूम वर्ष 1849 में इंडियन सिविल सर्विस (Indian Civil Service) के अधिकारी के तौर पर स्कॉटलैंड से भारत आए थे. जब वर्ष 1857 की क्रांति हुई थी और जिसे हम आजादी की पहली लड़ाई कहते हैं, उस वक्त ए. ओ. ह्यूम उत्तर-प्रदेश में प्रशासनिक अधिकारी थे.ए. ओ. ह्यूम ने वर्ष 1885 में भारत में कांग्रेस पार्टी की स्थापना की थी. इसका पहला सम्मेलन तत्कालीन बॉम्बे प्रांत में हुआ था और वो भी तत्कालीन वायसराय (Viceroy) की अनुमति से, जो उस वक्त ब्रिटिश भारत का सबसे बड़ा पद होता था.कांग्रेस के पहले सम्मेलन में 72 लोग थे, जिनमें ए. ओ. ह्यूम के साथ कुछ ब्रिटिश अधिकारी, भारत के ही कई अमीर और प्रभावशाली व्यक्ति व राजा-महाराजा शामिल थे. इनमें दादा भाई नौरोजी, जस्टिस रानाडे, फिरोज शाह मेहता और बदरुद्दीन तैयबजी के नाम प्रमुख तौर पर हैं. ये एक तरह से छोटा सा एलीट ग्रुप (Elite Group) था और इसमें भारत की आम जनता का कोई प्रतिनिधित्व नहीं था.

ए. ओ. ह्यूम ने जिन भारतीयों को कांग्रेस की स्थापना के लिए एकजुट किया था, उनमें से कोई भी आम आदमी नहीं था. इनमें से ज्यादातर लोगों की पढ़ाई-लिखाई या तो ब्रिटेन में हुई थी या ये लोग ब्रिटेन में ही रहते थे. उदाहरण के लिए कांग्रेस के संस्थापकों में से एक व्योमेश चंद्र बनर्जी अंग्रेजों की न्याय प्रणाली में बहुत यकीन रखते थे, ये भी एक तथ्य है कि कांग्रेस की स्थापना करने वाले शुरुआती लोगों में से ज्यादातर पेशे से वकील थे. इसलिए कांग्रेस को उस समय वकीलों की पार्टी भी कहा जाता था.

हालांकि कांग्रेस की स्थापना के समय इसका उद्देश्य ये बताया गया था कि ब्रिटिश राज में भारतीयों को ज्यादा से ज्यादा अधिकार दिलाना है. लेकिन कुछ इतिहासकार ये भी मानते हैं कि कांग्रेस बनाने का असली मकसद था कि वर्ष 1857 से जो विद्रोह शुरू हुआ था, उस विद्रोह की आग को ठंडा किया जाए. ऐसा कोई दूसरा विद्रोह ना हो. इसमें ब्रिटिश सरकार काफी हद तक कामयाब भी रही क्योंकि अंग्रेजों को कांग्रेस से कोई खतरा नहीं था, अंग्रेजों को क्रांतिकारियों से खतरा था.यानी एक अंग्रेज द्वारा स्थापित की गई कांग्रेस ने एक तरह से ब्रिटिश राज के लिए वर्ष 1885 से लेकर 1947 तक एक सेफ्टी वाल्व (Safety Valve) का काम किया. जिसका मकसद आम भारतीयों में विद्रोह की संभावना को खत्म करना था.वर्ष 1905 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे गोपाल कृष्ण गोखले ने एक बार कहा था कि कोई भारतीय कांग्रेस की स्थापना कर ही नहीं सकता था. अगर भारत का कोई व्यक्ति इसका प्रयास भी करता तो उस समय के अंग्रेज अधिकारी ऐसा होने ही नहीं देते.

कुल मिलाकर शुरुआत में कांग्रेस ब्रिटेन में पढ़े-लिखे कुछ ऐसे लोगों का समूह था, जो साल में एक बार वार्षिक सम्मेलन के लिए इकट्ठा होता था. हालांकि कांग्रेस में बाल गंगाधर तिलक, श्री अरबिंदो घोष, बिपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय और सुभाष चंद्र बोस जैसे कुछ नेता थे, जो दिल से भारत को अंग्रेजों से आजादी दिलाना चाहते थे.महात्मा गांधी ने अपने प्रयासों से कांग्रेस को एक आंदोलन की शक्ल देने का प्रयास किया था और वो इसमें काफी हद तक सफल भी रहे. लेकिन गांधी जी चाहते थे कि आजादी के बाद कांग्रेस को बर्खास्त कर दिया जाए और इसे एक समाज सेवा करने वाली संस्था में बदल दिया जाए. वो कांग्रेस को लोक सेवक संघ में बदलना चाहते थे.कांग्रेस की राजनीति पर एक मशहूर पुस्तक पॉलिटिक्स इन इंडिया (Politics In India) है, इसके लेखक रजनी कोठारी हैं. इस किताब के पेज नंबर 157 पर वो लिखते हैं कि महात्मा गांधी ने वर्ष 1948 में अपनी मृत्यु से पहले कांग्रेस को एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर भंग करने का प्रस्ताव दिया था. उन्होंने तर्क दिया था कि कांग्रेस को लोक सेवक संघ में बदल दिया जाए. जो एक गैर राजनीतिक संस्था होगी और जिसका काम समाज सेवा करना और सकारात्मक कार्य करना होगा.लेकिन महात्मा गांधी की मृत्यु के बाद कांग्रेस के कई नेताओं ने पार्टी को भंग करने का ख्याल पूरी तरह से छोड़ दिया और जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस 100 प्रतिशत शुद्ध राजनीतिक पार्टी बन गई.

आपको वर्ष 2011 का अन्ना हजारे आंदोलन भी याद होगा. इसी आंदोलन की समाप्ति के बाद आम आदमी पार्टी की स्थापना हुई थी. जबकि अन्ना हजारे आंदोलन में शामिल अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं को राजनीति में ना जाने के लिए लगातार कहते रहे. वो कभी अपने आंदोलन को राजनीतिक पार्टी का रूप नहीं देना चाहते थे. लेकिन ठीक जवाहर लाल नेहरू की तरह अरविंद केजरीवाल ने भी अन्ना हजारे की बात नहीं मानी और आम आदमी पार्टी की स्थापना कर दी.

आप कह सकते हैं कि अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन से उपजी कांग्रेस, देश की ओरिजनल आम आदमी पार्टी थी. जिस तरह से नेहरू ने गांधी जी की बात नहीं मानी उसी तरह से अरविंद केजरीवाल ने भी अन्ना हजारे की बात नहीं मानी.

गांधी जी के मार्गदर्शन में कांग्रेस ने भारत में तीन बड़े आंदोलन किए. ये आंदोलन थे असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन. लेकिन ये तीनों ही आंदोलन वो नतीजे हासिल नहीं कर सके, जिसकी गांधी जी को उम्मीद थी. यहां तक कि लंबे समय तक महात्मा गांधी समेत कांग्रेस के कई नेता पूर्ण स्वराज के विरोध में रहे तो कभी इसके पक्ष में बयान देते रहे. ये नेता सिर्फ इतना चाहते थे कि अंग्रेज भारत के नेताओं को ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक शक्तियां सौंप दें.

यानी आज के दौर में आंदोलन से जन्मी आम आदमी पार्टी की तरह उस समय कांग्रेस के भी कई नेता देश की आजादी के मामले पर यू टर्न लेते रहते थे. इन्हीं नीतियों का नतीजा ये हुआ कि स्थापना से लेकर अब तक कांग्रेस करीब 60 बार टूट चुकी है और इसके कई नेता अपनी अलग पार्टियां बना चुके हैं. वर्ष 1923 में जवाहर लाल नेहरू के पिता मोती लाल नेहरू खुद कांग्रेस से अलग हो गए थे और उन्होंने अपनी स्वराज पार्टी बना ली थी. हालांकि बाद में उन्होंने इसका विलय कांग्रेस में कर दिया था. इसके कुछ और उदाहरण आप देखिए.

कब-कब टूटी कांग्रेस पार्टी:

– वर्ष 1939 में सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस से अलग होकर ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (All India Forward Block) की स्थापना की थी.

– साल 1959 में जवाहर लाल नेहरू की नीतियों से नाराज होकर आजाद भारत के पहले गवर्नर सी. राजगोपालाचारी कांग्रेस से अलग हो गए थे और उन्होंने अपनी एक नई पार्टी बना ली थी.

– वर्ष 1969 में के. कामराज और मोरारजी देसाई ने इंदिरा गांधी से विरोध के बाद कांग्रेस (O) बना ली और इंदिरा के साथ बची कांग्रेस इंडियन नेशनल कांग्रेस (R) कहलाई. जबकि के. कामराज के बारे में कहा जाता है कि वो किंगमेकर थे, उन्होंने नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री और उनके बाद इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाई.

– वर्ष 1978 में इंदिरा गांधी ने आज की इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापनी की.

– साल 1986 में प्रणब मुखर्जी भी कांग्रेस से अलग हो गए थे और उन्होंने अपनी एक अलग पार्टी बना ली थी, जिसका नाम था राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस. हालांकि बाद में उन्होंने भी अपनी पार्टी का विलय इंडियन नेशनल कांग्रेस (Indian National Congress) में कर दिया था.

– वर्ष 1996 में माधव राव सिंधिया ने भी कांग्रेस से अलग होकर एक नई पार्टी बना ली थी. जिसका नाम था मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस. लेकिन बाद में माधव राव सिंधिया भी कांग्रेस में वापस आ गए थे.

– वर्ष 1999 में शरद पवार भी कांग्रेस से अलग हो गए थे और उन्होंने नेशनलिस्ट कांग्रेस (Nationalist Congress) पार्टी की स्थापना की थी.

– साल 2011 में YS जगनमोहन रेड्डी भी कांग्रेस से अलग हो गए थे और अब उनकी नई पार्टी का नाम YSR कांग्रेस पार्टी है. जो अभी आंध्र प्रदेश में सत्ता में है.

– हैरानी का बात ये है कि कांग्रेस के स्थापना दिवस के मौके पर कांग्रेस के नेता ए. के. एंटनी (A. K. Antony) ने कांग्रेस मुख्यालय में पार्टी का झंडा फहराया लेकिन खुद ए. के. एंटनी भी 1980 में कांग्रेस से अलग हो गए थे. हालांकि बाद में वो कांग्रेस में वापस आ गए थे.

यानी मोती लाल नेहरू और जवाहर लाल नेहरू के जमाने से लेकर सोनिया और राहुल गांधी के जमाने तक कांग्रेस कई मौकों पर टूट चुकी है. आज आप कांग्रेस की जो स्थिति देख रहे हैं वो कांग्रेस के अंदर फैली निराशा और असंतोष का ही नतीजा है.

अगर आप कांग्रेस के इतिहास का विश्लेषण करेंगे तो आपको ये समझ आएगा कि स्थापना से लेकर आज के दौर तक कांग्रेस कई बार देश के आम लोगों को अपने साथ जोड़ने में असफल रही है. अंग्रेजी बोलने वालों और वकीलों की पार्टी के तौर पर जन्मी कांग्रेस में हमेशा से उन लोगों का बोलबाला रहा है जो फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं और जो नेता होने के साथ-साथ वकील या ऐसे ही दूसरे पेशों से जुड़े रहे हैं.

इसे एक उदाहरण से समझिए. वर्ष 1901 में कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन हुआ था. तब पहली बार महात्मा गांधी ने कांग्रेस पार्टी के इस अधिवेशन में हिस्सा लिया था. इस अधिवेशन में अंग्रेजी का बोलबाला था. महात्मा गांधी पर लिखी गई एक किताब में इस पूरी घटना का जिक्र है.

कांग्रेस के अधिवेशन में सर फिरोजशाह मेहता ने गांधी जी का प्रस्ताव लेने की बात तो कही थी. लेकिन प्रस्ताव कौन प्रस्तुत करेगा? कब करेगा? ये सोचते हुए महात्मा गांधी बैठे रहे. हर एक प्रस्ताव पर लंबे-लंबे भाषण होते थे. सारे भाषण अंग्रेजी में ही थे. हर एक के साथ प्रसिद्ध व्यक्तियों के नाम जुड़े होते थे और गांधी जी को लगने लगा था कि ऐसे में उनकी कौन सुनेगा?

कुछ ही दिनों में गांधी जी को कांग्रेस की व्यवस्था का ज्ञान हो गया. इस दौरान उनकी कई नेताओं से भेंट हुई. गांधी जी ने उनकी परंपराएं देखीं. वहां समय की बर्बादी होती थी. कांग्रेस में अंग्रेजी भाषा का प्रभाव बहुत ज्यादा था. उन्होंने इस प्रभाव को भी देखा. इससे उस समय उन्हें बहुत दुख भी हुआ था.

अंग्रेजी वाली ये मानसिकता कांग्रेस पार्टी के डीएनए (DNA) के अंदर मौजूद है क्योंकि मूल रूप से कांग्रेस पार्टी की स्थापना ही एक अंग्रेज ने की थी. गांधी जी जीवनभर कांग्रेस के DNA को बदलने की कोशिश में लगे रहे. लेकिन कांग्रेस में इसके बावजूद कोई सुधार नहीं आया और कांग्रेस की मौजूदा स्थिति इसी का नतीजा है.

इसमें कोई शक नहीं है कि देश की सबसे पुरानी और देश पर 54 वर्ष से ज्यादा शासन करने वाली कांग्रेस राजनीतिक रूप से आज भी एक ब्रांड (Brand) है. लेकिन अब पार्टी में ऐसे नेता ना के बराबर हैं जो इस ब्रांड का उद्धार कर सकें. ऐसे में कांग्रेस को चलाने वाला परिवार और पार्टी के नेता चाहें तो वो कांग्रेस को किसी दूसरी बड़ी पार्टी को सौंप सकते हैं यानी कोई और पार्टी कांग्रेस का टेक ओवर कर ले.

जैसा कि अक्सर कॉर्पोरेट की दुनिया में जब कोई नामी गिरामी कंपनी खराब प्रदर्शन करने लगती है, उसके शेयर गिरने लगते हैं और कंपनी का ब्रांड संकट में आ जाता है तो कोई दूसरी बड़ी कंपनी उसे खरीद लेती है. इसके बाद कंपनी के मेक ओवर की प्रक्रिया शुरू होती है. कांग्रेस चाहे तो अपने लिए ऐसा ही कोई निवेशक या खरीरदार ढूंढ सकती है और सोनिया गांधी व राहुल गांधी जैसे नेता चाहें तो इसके बदले में अपने लिए रॉयलिटी (Royalty) मांग सकते हैं.

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