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सुर्खियों के सरताजःराहुल गांधी

rahul-gandhi_new-(1)राहुल गांधी के सियासी करियर में 2017 का साल बड़े बदलाव के साल के तौर पर देखा जाएगा. देश ने उनका नया अवतार देखा—जो लगातार जन अभियान चलाता है, आगे बढ़कर सक्रिय रहता है, सोशल मीडिया पर असरदार है और पुरजोर ढंग से फैसले करता है. साल के अंत तक उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष की गद्दी भी संभाल ली, जो वैसे तो तय ही थी पर वे खुद वर्षों से उसे टालते आ रहे थे. मगर यह नाटकीय बदलाव एक नाकाम प्रयोग के साथ शुरू हुआ था. 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावों की दौड़ में राहुल ने प्रशांत किशोर को अपनी पार्टी के अभियान के रणनीतिकार के तौर पर नियुक्त किया था. किशोर परदे के पीछे 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के और 2015 के बिहार विधानसभा के चुनाव में नीतीश कुमार के रणनीतिकार रह चुके थे. कई कांग्रेसियों ने किशोर की सेवाएं लेने के राहुल के फैसले का नकलची कहकर मजाक उड़ाया था. मगर राहुल ने इस पर ध्यान नहीं दिया और किशोर को चुनाव अभियान चलाने के लिए खुली छूट देने का भरोसा दिया.

पेशेवर रणनीतिकार किशोर का मकसद कांग्रेस की जीत पक्की करना था. वे प्रियंका गांधी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने सरीखी बुनियादी सूझ लेकर आए. पार्टी की कमजोरियों का उन्होंने बेरहमी से विश्लेषण किया—संगठन बिल्कुल पस्त हालत में है, सोशल मीडिया इकाई भाजपा के पासंग भी नहीं है और ज्यादातर हिंदू धर्मनिरपेक्षता पर कांग्रेस के रुख को मुस्लिम तुष्टिकरण का जरिया मानते हैं. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हार के साथ किशोर का संग-साथ तो एक झटके में टूट गया, पर राहुल ने सबक जरूर सीख लिए. कांग्रेस के एक महासचिव कहते हैं, ”किशोर के साथ राहुल को यह समझ में आया कि मोदी जिसके लिए जाने जाते हैं, उन्होंने अपने बारे में वह धारणा कैसे बनाई. उन्हें अहसास हुआ कि मोदी का मुकाबला करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि उन्हें उनके ही खेल में मात दी जाए.”

उत्तर प्रदेश की हार के दो महीनों के भीतर राहुल ने अपनी पसंदीदा लोकसभा सांसद दिव्या स्पंदना को पार्टी की सोशल मीडिया इकाई का अध्यक्ष बना दिया. खुद उन्होंने ट्विटर पर अपने एहतियात बरतने वाले नजरिए को तिलांजलि दे दी और एक के बाद एक ऐसे ट्वीट दागने लगे जो मोदी सरकार पर हमले करते हुए मजाकिया और गहरी सूझबूझ से भरे थे. राहुल के दक्रतर के एक सदस्य कहते हैं, ”उन्हें ट्विटर पर आने के लिए हमें बहुत ज्यादा मनाना पड़ा, पर अब उन्हें इसमें मजा आ रहा है और अपने ट्वीट वे खुद लिखते हैं.” वे यह भी कहते हैं, ”जब कुछ मीडिया चैनलों ने गुजरात चुनावों के बाद फिल्म देखने के लिए उनकी आलोचना की, तो उन्होंने बहुत उम्दा ट्वीट किया, ”अगर बीजेपी के पास फिल्म की फ्रेंचाइजी होती तो उसका नाम लाइ हार्ड होता.”

उत्तर प्रदेश से राहुल ने जो सबसे बड़ा सबक सीखा, वह था ध्रुवीकरण की ताकत और यह कि हिंदू वोटों को गोलबंद करने में भाजपा कैसे कामयाब रही. कांग्रेस के एक राज्यसभा सदस्य कहते हैं, श्श्वे धर्मनिरपेक्षता में अब भी भरोसा करते हैं, पर जरूरत लोगों को यह समझाने की है कि भाजपा कोई अकेली हिंदुओं की रखवाली पार्टी नहीं है.” इसलिए मुस्लिम वोट बैंक के नुक्सान की कीमत पर भी कांग्रेस अध्यक्ष गुजरात के चुनाव अभियान के दौरान 27 मंदिरों में गए और मस्जिदों में जाकर पलड़ा बराबर करने की उन्होंने कोई कोशिश नहीं की. और यह दिखाने के लिए कि यह चुनावी पैंतरा भर नहीं था, वे चुनावों के बाद सोमनाथ मंदिर में फिर गए. जबरदस्त ध्रुवों में बंटे चुनावी माहौल में खुद को शिव भक्त बताने वाले राहुल के लिए धर्म अब निजी मामला नहीं रह गया है.

यह व्यावहारिक नजरिया राहुल की सियासत का नया पहलू है. अभी तक उनकी सियासत को खुद उन्हीं की पार्टी के लोग ‘एनजीओ टाइप’ करार देते रहे थे. यह व्यावहारिक नजरिया ही उन्हें सितंबर में अमेरिकी विश्वविद्यालय ले गया था, जो उनकी नई सियासी शख्सियत का लॉन्च पैड बना. उस यात्रा का मकसद हालांकि चंदे के लिए विदेशों में रह रहे हिंदुस्तानियों तक पहुंचना था. हरियाणा के एक बड़े नेता कहते हैं, ”कांग्रेस अमीर नेताओं की गरीब पार्टी है. पार्टी के कुछ पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री पूरे लोकसभा चुनाव का खर्चा उठा सकते हैं. पर अगर आप हमारे खजाने को देखें तो हमारे पास अपने उम्मीदवारों के चुनाव का बुनियादी खर्चा उठाने तक की रकम भी नहीं है.”

जनवरी 2018 में दुबई की यात्रा फिलहाल स्थगित कर दी गई है, जो ज्यादा रकम उगाहने के मकसद से ही तय की गई थी. जनधारणा प्रबंधन से पार्टी को गुजरात चुनावों में ‘नैतिक जीत’ और सोशल मीडिया पर बढ़त भले हासिल हो गई हो, पर राहुल जानते हैं कि भाजपा के खिलाफ लड़ाई पार्टी के संगठन और खजाने को मजबूत किए बगैर नहीं जीती जा सकती. 2017 का साल इस सफर की शुरुआत भर था.

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