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राम से दूर होती चली गई कांग्रेस

rajiv_ ram aur politicsराम मंदिर के लिए चला आंदोलन हो या इसके लिए हिंदुओं को एकजुट करने की पहल, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) व उससे जुड़े संगठन सबसे आगे रहे हैं। लेकिन, क्या राम मंदिर के लिए पूरा श्रेय इन्हें दिया जाना सही है? क्या कांग्रेस ने इसकी खातिर कुछ नहीं किया?

  • राममंदिर मुद्दे की नींव कांग्रेस ने 1948 में रखी थी
  • कांग्रेस राज में ताला खुला-मंदिर की नींव रखी गई
  • कांग्रेस के दौर में विवादित स्थल पर मूर्ति रखी गई

अयोध्या की विरासत जितनी पुरानी है, उतना ही पेचीदा यहां की जमीन पर उठा विवाद भी रहा है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राममंदिर निर्माण का काम शुरू हो रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 अगस्त को राम मंदिर का भूमि पूजन करेंगे. बीजेपी राज में आज भले ही राममंदिर बनने का सपना साकार हो रहा हो, लेकिन अयोध्या के विवादित स्थल पर मूर्ति रखने, बाबरी का ताला खुलवाने से लेकर राम मंदिर का शिलान्यास और मस्जिद का विध्वंस तक कांग्रेस के सत्ता में रहते हुए था. इसके बावजूद आखिर क्या वजह है कि राममंदिर का क्रेडिट कांग्रेस से ज्यादा बीजेपी के नाम है.भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या में 1528 में मीर बाकी पर मंदिर गिराकर मस्जिद बनाने का आरोप लगा और बाद में हिंदू-मुस्लिम समुदाय में विवाद का यही कारण बना. 1885 में राममंदिर के निर्माण की मांग उठी और यह मांग करने वाले थे महंत रघुवर दास. 1947 में देश आजाद हुआ और 1948 में महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई. इसी के बाद समाजवादियों ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई और आचार्य नरेंद्र देव समेत सभी विधायकों ने विधानसभा से त्यागपत्र दे दिया.कांग्रेस नेता उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने 1948 में हुए उपचुनाव में फैजाबाद से आचार्य नरेंद्र देव के खिलाफ एक बड़े हिंदू संत बाबा राघव दास को उम्मीदवार बनाया. गोविंद वल्लभ पंत ने अपने भाषणों में बार-बार कहा था कि आचार्य नरेंद्र देव भगवान राम को नहीं मानते हैं, वे नास्तिक हैं. मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की नगरी अयोध्या ऐसे व्यक्ति को कैसे स्वीकार कर पाएगी. इसका नतीजा रहा कि नरेंद्र देव चुनाव हार गए.

बाबा राघव दास की जीत से राम मंदिर समर्थकों के हौसले बुलंद हुए और उन्होंने जुलाई 1949 में उत्तर प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर फिर से मंदिर निर्माण की अनुमति मांगी. इसके बाद विवाद बढ़ने लगा तो पुलिस तैनात कर दी गई. तब कांग्रेस का केंद्र से लेकर राज्य तक में राज था. 22-23 दिसंबर 1949 की रात विवादित मस्जिद स्थल के अंदर राम-जानकी और लक्ष्मण की मूर्तियां रख दीं और यह प्रचार किया कि भगवान राम ने वहां प्रकट होकर अपने जन्मस्थान पर वापस कब्जा प्राप्त कर लिया है.

1950 में गोपाल सिंह विशारद ने भगवान राम की पूजा अर्चना के लिए अदालत से विशेष इजाजत मांगी थी. महंत परमहंस रामचंद्र दास ने हिंदुओं की पूजा जारी रखने के लिए मुकदमा दायर कर दिया. अस्सी के दशक में आस्था और मंदिर के आसपास की राजनीति मुख्य केंद्र में आ गई. कांग्रेस में राजीव गांधी का दौर आ चुका था और वीएचपी राम मंदिर मुद्दे को लेकर माहौल बनाने में जुटी हुई थी. एक फरवरी 1986 को एक स्थानीय अदालत ने विवादित स्थान से मूर्तियां न हटाने और पूजा जारी रखने का आदेश दे दिया. इसके बाद बाबरी का ताला खुला.

वीएचपी ही नहीं बीजेपी ने भी राम मंदिर को अपने एजेंडे में शामिल कर लिया. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बीजेपी को मात देने के लिए राम मंदिर के शिलान्यास की अनुमति दे दी. नारायण दत्त तिवारी उस समय सूबे के मुख्यमंत्री थे. नवंबर 1989 को वीएचपी सहित तमाम साधु-संतों ने राम मंदिर का शिलान्यास किया. 1989 के लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान की शुरूआत राजीव गांधी ने आयोध्या से की. इसके बाद राम मंदिर के समर्थन में भीड़ जुटाने केलिए बीजेपी ने अपना अभियान शुरू कर दिया.

25 सितंबर 1990 को बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी रथ यात्रा की शुरुआत की थी. इसी यात्रा के दो साल बाद 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने अयोध्या में बाबरी विध्वंस किया और विवादित ढांचे को गिरा दिया. यह वह समय था जब केंद्र में नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी और सूबे में कल्याण सिंह के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार. तब से कांग्रेस यूपी में आजतक वापसी नहीं कर सकी है.

कांग्रेस नेता कमलनाथ कह रहे हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने साल 1985 में मंदिर का ताला खोल दिया था. उन्होंने 1989 में ही शिलान्यास की बात कही थी, लेकिन हम इसे राजनीतिक मंच पर नहीं लाए. राजनीतिक मंच पर धार्मिक भावना नहीं लानी चाहिए. कांग्रेस ने मंदिर पर कोर्ट के फैसले का सम्मान किया. सभी भारतवासी मंदिर चाहते हैं. जब मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला हो गया, तो बीजेपी इसे क्यों भुनाने में जुटी हुई है? धार्मिक मामले पर बीजेपी को राजनीति बंद करना चाहिए.

वहीं, संघ विचारक और राज्यसभा सदस्य राकेश सिन्हा कहते हैं दोहरापन कांग्रेस के चरित्र का हिस्सा बन गया है. सत्ता को पाने के लिए अपनी विचाराधारा से भी कांग्रेस समझौता करती जा रही है. विवादित स्थल पर शिलान्यास जरूर कांग्रेस के दौर में हुआ था, लेकिन उस वक्त राजीव गांधी का समर्पण मंदिर के प्रति नहीं था बल्कि राजनीतिक अवसरवादिता थी और सत्ता को पाने के लिए उन्होंने कदम उठाया था. कांग्रेस नेता आज इतिहास याद दिला रहे हैं, यह उनकी सत्ता की लालसा को दर्शाता है. यह बात क्यों नहीं कहते हैं कि राममंदिर की राह में कांग्रेस कितने दिनों तक रोड़ा अटकाने का काम करती रही है.राकेश सिन्हा कहते हैं कि कांग्रेस पिछले दो दशक से अपनी विचाराधारा के संकट से जूझ रही है. विचाराधार में आई गिरावट के चलते ही उसके कार्यकर्ता भी दूर हुए हैं. कांग्रेस का सामाजिक जनाधार भी पूरी तरह से खिसक गया है, आज न तो उसके साथ दलित है और न ही मुस्लिम है. इसीलिए कांग्रेस के छत्रप हिंदूवाद से लेकर अल्पसंख्यकवद को अपना रहे हैं ताकि वो अपने राजनीतिक वजूद को बचाए रख सकें. यह भी कांग्रेस का अवसरवाद ही तो है.

राजीव गांधी का राम मंदिर और हिंदू प्रेम दांव पड़ा था उल्टा

अयोध्या की विरासत जितनी पुरानी है, उतना ही पेचीदा इसकी जमीन पर उठा विवाद रहा है. वो विवाद जिसने हिंदुस्तान की राजनीति में धर्म के लिए जगह पुख्ता की. राजनीति में धर्म की वो पैठ आजादी के बाद और बढ़ती गई. लेकिन अयोध्या को इसका नुकसान ही उठाना पड़ा. अगर धर्म ने रास्ता सुझाया होता, तो मंदिर-मस्जिद का विवाद 70 साल बाद भी इस मोड़ पर आज नहीं खड़ा होता….मंदिर वहीं बनाएंगे. अयोध्या को लेकर राजनीति का राग नया नहीं है, बल्कि इस राग में बाबरी मस्जिद के विध्वंस से लेकर दंगे फसाद की तमाम घटनाएं देश ने झेला है.

दरअसल ये पूरा विवाद सबसे तीखा मोड़ लेता है 1980 के दशक में जब वीएचपी की धर्मसंसद में राम मंदिर बनाने का प्रण होता है. इसके दो साल बाद एक अदालती आदेश आता है, जिसमें फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने मस्जिद का ताला खोलने का आदेश सुनाया. तब विवादित मस्जिद में पहले की तरह हिंदुओं को पूजा करने की इजाजत तो मिल गई, लेकिन सियासत ने एक और करवट ली.

राजीव गांधी सरकार में हुआ शिलांयास

नवंबर 1989 में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने हिंदू संगठनों को विवादित स्थल के पास शिलान्यास की इजाजत दे दी. माना जाता है कांग्रेस सरकार का ये फैसला शाहबानों केस के बाद नाराज हिंदू वोटबैंक और भ्रष्चाचार के आरोपों से घटते जनाधार को अपनी तरफ खींचने के लिए किया था. लेकिन कांग्रेस का दांव उल्टा पडा. आडवाणी जैसे नेताओं के साथ बीजेपी पूरे मंदिर आंदोलन को अपनी सियासी धारा में साध चुकी थी.मंदिर आंदोलन के उस उफान पर आडवाणी का बयान तब ऐसा सुना जाता था. तब ये आंदोलन वीएचपी और बजरंग दल जैसे दक्षिणपंथी संगठनों का हुआ करता था. इसके अगुवा अशोक सिंघल और बजरंग दल के युवा अध्यक्ष विनय कटियार सरीखे लोग हुआ करते थे.

मंदिर आंदोलन से बीजेपी में पड़ी जान

उस दौर के बदलते सियासी समीकरणों ने लालकृष्ण आडवाणी को इसका सबसे बड़ा चेहरा बना दिया. इसकी बुनियाद 1989 के आम-चुनावों में पड़ जाती है, जिसमें 9 साल पुरानी बीजेपी को 85 सीटें मिली. पार्टी ने मान लिया वीएचपी के राम मंदिर आंदोलन का समर्थन जनता ने स्वीकार कर लिया.अयोध्या की गलियों में राम मंदिर निर्माण का एक बड़ा हिमायती सियासत से भी मिल गया. ये हिमायत पार्टी की सेहत के लिए फायदेमंद था, ये 1989 के चुनावों में दिख चुका था. 2 की जगह 85 सीटें जीत कर बीजेपी तब वीपी सिंह की जनता दल सरकार को समर्थन दे रही थी. उधर मंदिर आंदोलन अपने पूरे उफान पर था.उस आंदोलन की आंच से सांप्रदायिक सौहार्द का माहौल गरम होने लगा था. अयोध्या में उपद्रव और दूसरे इलाकों में भड़की हिंसा में अनुमान के मुताबिक 800 लोग मारे जा चुके थे. लेकिन सरकार में शामिल बीजेपी का रुख मंदिर निर्माण को लेकर जस का तस था.

वीपी सिंह से वाजपेयी तक, अयोध्या पर हर सियासी पहल रही नाकाम

अयोध्या विवाद के समझौते की पहली कोशिश वीपी सिंह के समय में हुई, दोनों पक्षकारों से बातचीत के सिलसिले भी शुरू हो गए. लेकिन सियासत ने ऐसी करवट ली कि जो समझौते का ऑर्डिनेंस लाया जा रहा था उसे वापस ले लिया गया. इसके बाद अयोध्या विवाद के समाधान की दूसरी पहल तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के दौर में शुरू हुई और ये समाधान के करीब थी. लेकिन दुर्भाग्य था कि उनकी सरकार चली गई. उसके बाद नरसिम्हा राव ने प्रयास किया लेकिन फिर भी अंतिम हल तक नहीं पहुंचा जा सका

अयोध्या का एक सच ये भी है कि यहां की आब-ओ-हवा सियासत के साथ करवट बदलती है. वो चाहे 30 साल पहले जोर पकड़ता मंदिर निर्माण आंदोलन हो या 25 साल पहले का बाबरी विध्वंस. धर्म की नगरी में सियासत की गूंज हर घटना के साथ अलग सुनाई देती है. पिछले 25 साल में ही अयोध्या को लेकर सुर्खियां इतनी बदल चुकी हैं, कि अब अदालती दांवपेच से बेहतर सुलह समझौता ही लगता है. काश कि कोई फॉर्मूला सियासत ही सुझा देती.

मस्जिद-मंदिर और हिंदू-मुस्लिम पक्ष

अव्वल तो सहमति होती, तो ये विवाद इतने उलझे हुए मुकाम तक पहुंचता ही नहीं. अगर धर्म और विश्वास के आधार पर ऐसी दावेदारियां न होतीं, तो ऐसा नहीं था कि अयोध्या का विवाद सुलझता नहीं. इसके लिए पहल श्री श्री रविशंकर और मुगल वंशज प्रिंस याकूब के साथ पहली बार नहीं हो रही है, बल्कि बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के पहले से ही ऐसी कोशिशें शुरू हुईं. लेकिन नकामयाब रहीं.

पहली कोशिश वीपी सिंह के समय में हुई, दोनों पक्षकारों से बातचीत के सिलसिले भी शुरू हो गए. लेकिन सियासत ने ऐसी करवट ली कि जो समझौते का ऑर्डिनेंस लाया जा रहा था उसे वापस ले लिया गया. इसके बाद अयोध्या विवाद के समाधान की दूसरी पहल तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के दौर में शुरू हुई और ये समाधान के करीब थी. लेकिन दुर्भाग्य था कि उनकी सरकार चली गई. उसके बाद नरसिम्हा राव ने प्रयास किया लेकिन फिर भी अंतिम हल तक नहीं पहुंचा जा सका. इसके बाद सरकार के स्तर पर दोबारा समझौते के लिए कोई प्रयास नहीं हुआ.

बाबरी मस्जिद के ध्वंस और अपने पूरे कार्यकाल पर नरसिम्हा राव ने किताब भी लिखी, जिसके मुताबिक वो चाहते हुए भी इस घटना को रोक नहीं पाए और ये बात उन्हें देर तक कचोटती रही. शायद इसी पश्चाताप में उन्होंने विवाद के निपटारे की पहल भी की, लेकिन तब तक सबकुछ बदल चुका था. धर्म का लिहाज और राजनीति का एजेंडा सबकुछ.मगर अटल बिहारी वाजयेपी के सत्ता में आने के बाद ये मामला एक बार फिर सुगबुगाने लगा. मामले की गंभीरता को समझते हुए वाजपेयी ने प्रधानमंत्री कार्यालय में अयोध्या विभाग का गठन किया और वरिष्ठ अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को दोनों पक्षों से बातचीत के लिए नियुक्त किया.

वाजपेयी सरकार में भी मंदिर को लेकर कोई एजेंडा नहीं

वाजपेयी की अगुवाई में गठबंधन ही सही, बीजेपी की बहुमत वाली पहली सरकार केन्द्र में बनी थी. लेकिन राम मंदिर उसके राजनीतिक एजेंडे पर नहीं था. यहां तक कि 2002 में जब यूपी चुनाव के लिए घोषणा पत्र जारी करने की बात आई, तो बीजेपी ने राम मंदिर के निर्माण को उसमें शामिल करने से इनकार कर दिया.वाजपेयी की अनदेखी से विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों में सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ने लगी.  इसी के बाद वीएचपी ने 15 मार्च से अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करने की घोषणा कर दी. इसी कारसेवा में हजारों कार्यकर्ता अयोध्या में इकट्ठा हुए. इसी हुजूम से गुजरात लौट रहे कारसेवकों से भरी बोगी गोधरा में जलाई गई. उसके बाद का इतिहास आज भी हिंदुस्तान के दामन पर एक काला धब्बा है.अटल बिहारी वाजपेयी ने 2003 में कांची पीठ के शंकराचार्य के जरिए भी अयोध्या विवाद सुलझाने की कोशिश की थी. तब दोनों पक्षों से मिलकर जयेंद्र सरस्वती ने भी भरोसा दिलाया था, मसले का हल महीने भर में निकाल लिया जाएगा, लेकिन ऐसा तब भी कुछ नहीं हुआ.

एक ऐतिहासिक विरासत जो अपनी तामीर की पांच सदियों में जाने कितने सियासी उथल-पुथल और हुकूमती फरमानों की गवाह बनी. पर उसकी गवाही कभी अपने वजूद के काम नहीं आई. सदियों के साथ वो सियासी विवाद में उलझती गई. मस्जिद और मंदिर के दावों में बंटती गई. अयोध्या को लेकर आज भी परचम दोनों दावों का बुलंद होता है. इस पर फैसला अब अदालत को करना है.

इसी साल के अगस्त महीने की बात है. देश की सबसे ऊंची अदालत में जब 7 साल बाद मुकदमे के दस्तावेज खुले, तब दो रास्ते दिखे थे-एक रास्ता सर्वोच्च अदालत के अंतिम फैसले का और दूसरा पक्षकारों के बीच आपसी सुलह का.

कानून की भाषा में इसे ऑउट ऑफ कोर्ट सेटेलमेंट कहते हैं, जिसका विकल्प चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली खंडपीठ ने सुझाया था. चाहो तो आपस में मिल बैठकर मामला सुलझा लो. कोर्ट ऐसे किसी भी फैसले का सम्मान करेगी, जिसमें मुकदमे के तीनों पक्षों की बराबर सहमति हो.

हालांकि सुलह या उसके किसी फॉर्मूले का सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से कोई सीधा लेना-देना नहीं है. मंदिर-मस्जिद विवाद के तीनों पक्षकार यहां भी अयोध्या के दस्तावेजी सबूत और अपनी अपनी गवाहियों के साथ आमने-सामने हैं. बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साल 2010 में अरसे बाद अपना फैसला सुनाया तो तीनों पक्षकार ने सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और टाइटिल केस में याचिका लगाईं.इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पूरे विवादित परिसर को तीन बराबर हिस्सों में बांटा था. रामलला की मूर्ति वाली जगह कोर्ट ने रामलला विराजमान पक्ष को दी, जबकि सीता रसोई और राम चबूतरा निर्मोही अखाड़े के हवाले किया. बाकी का एक तिहाई हिस्सा कोर्ट ने सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया.हाईकोर्ट के फैसले से कोई पक्षकार सहमत नहीं हुई और उन्होंने फैसलों को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी. इस तरह सभी पक्षकार सुप्रीमकोर्ट पहुंचे.

समझौते की कोशिश

बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद कुछ और भी पक्षकार सामने आए, जिनमें शिया वक्फ बोर्ड खुद को अहम पक्ष मानता है. ये वही शिया वक्फ बोर्ड है, जिसने श्री श्री रविशंकर की अगुवाई में मंदिर-मस्जिद विवाद को खत्म करने का फॉर्मूला सुझाया. लेकिन सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड इसके फॉर्मूले से इत्तिफाक नहीं रखता. सुन्नी बोर्ड तो शिया वक्फ बोर्ड के मामले में किसी भी तरह की दावेदारी को ही खारिज करता है.

सुन्नी वक्फ बोर्ड का ये रुख 1946 से ही है, जब फैजाबाद जिला न्यायालय ने मस्जिद की जमीन पर शिया वक्फ बोर्ड का दावा खारिज कर दिया. शिया बोर्ड ने अदालत में इस बात का दावा 1940 में किया था कि बाबरी मस्जिद शिया समुदाय की है, लिहाजा इसका मालिकाना हक उसे सौंपा जाए. लेकिन अदालत ने उसका दावा खारिज कर दिया. तब से बाबरी मस्जिद की तरफ से अदालत में पैरवी सुन्नी वक्फ बोर्ड ही कर रहा है. लिहाजा शिया वक्फ बोर्ड का फार्मूला कौन सुने?शिया वक्फ बोर्ड ने हालांकि मस्जिद पर मालिकाना हक को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका लगाई है. लेकिन 2013 के वक्फ एक्ट के मुताबिक एक पेंच और भी है. एक्ट की धारा 29 के मुताबिक कोई भी वक्फ बोर्ड मस्जिद, कब्रिस्तान या दरगाह जैसी धार्मिक जगह और उसकी जमीन को ना तो बेच सकता है और ना ही किसी भी रूप में इसका ट्रांसफर कर सकता. लिहाजा इस रास्ते तो सुलह का कोई रास्ता निकलता नहीं दिखता.

अदालत से ही निकलेगा हल

आखिरी समझौते की सूरत अब अदालत में ही दिखती है. इसके लिए मंदिर के पक्षकार चाहते हैं मामले की सुनवाई प्रतिदिन हो, लेकिन मस्जिद पक्ष के पैरोकार ऐसी किसी भी जल्दबाजी में नहीं हैं. इसके अलावा एक पेंच ये भी है कि सुप्रीमकोर्ट में जो दस्तावेज जमा किए गए हैं, वो फारसी, अरबी सहित कई भाषाओं में हैं, जिनके अनुवाद भी होने थे. इसके बाद ही सुप्रीमकोर्ट मामले को पूरी तरह से समझेगा.जल्दबाजी सिर्फ अयोध्या को लेकर सियासत में है, वर्ना कानूनी लिहाज से तो अयोध्या में आदेश यथास्थिति बनाए रखने के ही हैं. ये आदेश सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2011 को सुनाया था. तब कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के बंटवारे के फॉर्मूले पर रोक लगाई थी और सारे पक्षों की अपील सुनने की बात कही थी.तब से लेकर आज तक अयोध्या में पानी बहुत बह चुका है. दिखने में अयोध्या के किनारे की सरयू नदी अब भी वैसी ही शांत है, मगर 6 साल में बदली सियासत के साथ धर्मनगरी का परचम भी बदल चुका है.

 इस समय कांग्रेस की भूमिका बेहद भ्रमित नजर आ रही है। 
  • इस समय कांग्रेस की भूमिका बेहद भ्रमित नजर आ रही है। दो ध्रुव बन गए हैं। राहुल गांधी, सोनिया गांधी, दिग्विजय सिंह, सलमान खुर्शीद समेत कई नेता भूमिपूजन के आयोजन पर सवाल उठा रहे हैं।
  • वहीं, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने ट्वीट किया- भगवान राम और माता सीता के संदेश और उनकी कृपा के साथ रामलला के मंदिर के भूमिपूजन राष्ट्रीय एकता, बंधुत्व और सांस्कृतिक समागम का अवसर बनेगा।
  • मध्यप्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भगवा चोला पहनकर हनुमान चालीसा का पाठ कराया। मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी की ओर से राम मंदिर के लिए 11 चांदी की ईंटें भेंट करने का ऐलान भी कर दिया।

क्या है कांग्रेस के भाजपा-संघ पर आरोप?

  • कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने राम मंदिर ट्रस्ट पर निशाना साधा और कांग्रेस नेतृत्व को भूमिपूजन कार्यक्रम में न बुलाने को लेकर कहा कि यह कार्यक्रम पूरी तरह से भाजपा-संघ का आयोजन हो गया है।
  • खुर्शीद ने कहा कि किसी एक नेता को नहीं, बल्कि इस कार्यक्रम में तो राजनीतिक स्पेक्ट्रम के सभी नेताओं को बुलाया जाना चाहिए। ट्रस्ट के पदाधिकारी मोदी सरकार के करीबी हैं और उनके कहने पर ही काम हो रहा है।
  • कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह ने कहा कि यह एक जनआंदोलन था। अब मंदिर साकार हो रहा है तो उसमें राजनीति क्यों लाई जा रही है? आंदोलन तो संघ के बनने से पहले से चल रहा था।

क्या अहमियत है कांग्रेस के लिए भगवान राम की?

  • बात शुरू होती है महात्मा गांधी से। उनका और भगवान राम का गहरा नाता था। उन्होंने अक्सर कहा कि मुझे ताकत भगवान राम के नाम से मिलती है। यह मुझे संकट के क्षणों से उबारती है। नई ऊर्जा देती है।
  • न केवल एक सच्चे रामभक्त की तरह महात्मा गांधी ने पूरे जीवन में राम नाम का जाप किया, बल्कि अपने जीवन में भी सरलता, सादगी और आत्म-समर्पण को अपनाया।
  • भगवान श्रीराम का ऐसा ही प्रभाव पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर भी था। उन्हें देश पर रामायण का असर पता था। उनके ही कहने पर 1985 में दूरदर्शन ने रामानंद सागर के रामायण का प्रसारण किया।
  • 1986 में उन्होंने उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीर बहादुर सिंह को मनाया और राम जन्मभूमि मंदिर के ताले खुलवाए। तभी तो हिंदुओं को भगवान श्रीराम के दर्शन का अवसर मिला।
  • 1989 में चुनावी भाषणों में वे अक्सर देश में रामराज्य लाने का वादा करते हुए शुरुआत करते। इतना ही नहीं, राजीव गांधी के काम भी भगवान राम और जन्मभूमि के प्रति उनका प्रेम दिखाते हैं।
  • नवंबर 1989 में उन्होंने विश्व हिंदू परिषद को राम मंदिर के शिलान्यास की अनुमति दी। तब तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह को भी शिलान्यास में भाग लेने के लिए भेजा था।
  • चेन्नई में अपनी आखिरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब राजीव गांधी से राम मंदिर पर प्रश्न पूछा गया था तो उन्होंने कहा था कि इस पर आम राय बनाने की काेशिशें जारी हैं। अयोध्या में ही राम जन्मभूमि मंदिर बनेगा।
  • यदि 1989 में राजीव गांधी की सरकार बनती तो शायद राम मंदिर के लिए प्रयास भी तेज हो गए होते। भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी तक इस बात का दावा करते दिखते हैं।

राजीव गांधी के बाद क्या कांग्रेस ने राम का साथ छोड़ दिया?

  • ऐसा कहना सही नहीं होगा। उनके बाद पीवी नरसिम्हा राव ने भी राम जन्मभूमि मंदिर के प्रति अपनी तैयारी दिखाई थी। केंद्र में उनकी ही सरकार थी, जब 6 दिसंबर, 1992 में बाबरी मस्जिद गिरा दी गई।
  • हालांकि, इसके कुछ ही दिन बाद यानी जनवरी 1993 में राव सरकार विवादित जमीन के अधिग्रहण के लिए एक अध्यादेश लेकर आई थी। इस अध्यादेश को 7 जनवरी 1993 को उस समय के राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने मंजूरी दी थी।
  • राष्ट्रपति से मंजूरी के बाद तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने इस बिल को मंजूरी के लिए लोकसभा में रखा। पास होने के बाद इसे अयोध्या एक्ट के नाम से जाना गया।
  • नरसिम्हा राव सरकार ने 2.77 एकड़ विवादित जमीन के साथ चारों तरफ 60.70 एकड़ जमीन को कब्जे में लिया। उस समय योजना अयोध्या में राम मंदिर, एक मस्जिद, लाइब्रेरी, म्यूजियम और अन्य सुविधाओं के निर्माण की थी।
  • हालांकि, बीजेपी ने राव सरकार के कदम का विरोध किया था। बीजेपी के साथ मुस्लिम संगठन भी विरोध में थे। राव सरकार ने इस मसले पर प्रेसिडेंशियल रेफरेंस का इस्तेमाल किया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने राय देने से मना कर दिया था।
  • सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि क्या राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद के विवादित जगह पर कोई हिंदू मंदिर या कोई हिंदू ढांचा था। 5 जजों की बेंच ने इन सवालों पर विचार किया था लेकिन कोई जवाब नहीं दिया था।

 नरसिम्हा राव के बाद तो जैसे राम का नाम ही कांग्रेस के लिए फोबिया हो गया?

  • राव सरकार के जाने के बाद कांग्रेस ने राम मंदिर के मुद्दे को छोड़ दिया। भाजपा ने इसे सीने से लगाए रखा। कांग्रेस में धीरे-धीरे राम, रामायण और रामराज्य को लेकर ही फोबिया विकसित हो गया।
  • 2009 में यूपीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामे में भगवान श्रीराम के अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिए। लाखों हिंदुओं की भावनाओं को इससे धक्का लगा। कांग्रेस को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा।
  • इसके बाद तो जैसे कांग्रेस नेताओं ने राम मंदिर के मसले पर बोलना ही बंद कर दिया। जो भी राम का नाम लेता, उसे कांग्रेस नेता संघी, सांप्रदायिक, हिंदुत्व एजेंट कहने लगे।
  • 1989 में उत्तरप्रदेश में कांग्रेस को हार मिली और उसके बाद वह हारती चली गई। मुस्लिम भी बाबरी ढांचे के गिरने के बाद उससे दूर होकर सपा जैसे क्षेत्रीय दलों के करीब होते गए।
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