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राम या रामायण से सीख

shri-ramcharitmanas-ramayana-original-imae9etv7jdxyneqवाल्मीकि कृत रामायण को पढ़ने और रामानंद सागर की रामायण को देखने में बहुत फर्क है। पढ़ने के दौरान आपको जीवन, ज्ञान और धर्म की कई बातें पढ़ने और सीखने को मिलेगी। जानते हैं कि हम राम या रामायण से क्या सीख सकते हैं।

1. कलिकाल में राम का नाम ही तारणहार है : दक्षिण भारत में राम के जीवन चरित्र को लेकर चर्चा होती है और उन्हें आदर्श मानकर उदाहरण दिए जाते हैं। वहां राम के जीवन को लेकर लोगों में बहुत उत्सुकता है, लेकिन उत्तर भारत में राम के जीवन से लोग कोई शिक्षा नहीं लेते बल्कि उन्होंने राम को पूज्जनीय बना दिया है। अर्थात पूजा तक ही सीमित रखा है। राम की याद भी तभी आती है जब रामनवमी आती है। विडंबना है कि राम के मंदिरों से ज्यादा तो शनि के मंदिरों में भीड़ रहती है। जो आपको डराता है आप उसे पूजते हो और जो आपसे प्रेम करता है आप उसे उपेक्षित कर देते हो। तब क्या सीखोंगे राम से? आप तो जगत पालक, उद्धारक और भक्त वात्सल्य को छोड़कर शनि की शरण में ही जाओ।
2. त्याग की भावना रखो : हम देश और समाज की बात नहीं करते लेकिन कम से कम आप अपने परिवार के प्रति तो त्याग की भावना रखो। प्रभु श्री राम ने राजमहल त्याग कर वनवास धारण किया। यह देखकर लक्ष्मण ने भी उनके साथ सभी सुख त्याग दिए, भारत ने अयोध्या का त्याग कर 14 वर्ष तक वनवासियों की तरह नंदीग्राम में जीवन बिताया। भरत जी नंदिग्राम में रहते हैं, तो शत्रुघ्न जी उनके आदेश से राज्य संचालन करते हैं। लक्ष्मण की पत्नी चाहती तो अपने पिता जनक के यहां चली जाती लेकिन नहीं उन्होंने भी सभी सुखों का त्याग कर दिया। यह देखकर शत्रुघ्न ने अपनी पत्नी श्रुतिकीर्ति से दूरी बना ली। भारत की पत्नी मांडवी ने भी भारत के साथ तपस्वियों जैसा जीवन बिताया। बड़े भाई पर संकट आया तो सभी भाइयों ने भी संकट को वरण कर लिया।इस महाकाव्य में राजा दशरथ की तीनों रानियों और चारों बेटों का चरित्र अलग-अलग होता है। लेकिन इस विविधता के बावजूद उनमें किस तरह की एकजुटता रहती है यह हर परिवार के लिए दुःख के समय से बाहर निकलने की सीख है।
3. बुराई से डरो : रामायण की सबसे बड़ी सीख थी बुराई पर अच्‍छाई की जीत। हमेशा अच्छे और सच्चे बने रहो। बुरी नियत से कोई कार्य मत करो। रामायण अनुसार व्यक्ति जब बुराई करता है तो उसे देखने वाले दो लोग होते हैं। एक वह खुद और दूसरा काल पुरुष या उस व्यक्ति के ईष्टदेव। इसलिए बुराई से डरो।
4. ऊंच नीच की भावन से बचो : प्रभु श्रीराम ने अपने जीवन से यह बताया और सिखाया कि संसार में कोई छोटा या कोई बड़ा नहीं होता। कोई उच्च वर्ग का या कोई निम्न वर्ग का नहीं होता है। प्रभु श्रीराम वन में वनवासियों और आदिवासियों की तरह ही रहे। उनका केवट, जटायु, संपाती, शबरी, वानर, ‍रीछ आदि कई जनजातियों ने साथ दिया। वे कई ऋषि मुनियों के आश्रम के साथ ही आदिवासियों की झोपड़ी में भी रहे थे। सिर्फ राम ही नहीं संपूर्ण रामायण में हर पात्र ऊंच और नीच के विचारों से मुक्त है।
भगवान श्री राम ने अपने जीवन में सभी से समान और सम्यक व्यवहार रखा। न किसी को राजा समझा और न रंक। न शक्तिशाली समझा और न कमजोर। उन्होंने पशु और पक्षियों के साथ भी वैसा ही व्यवहार किया जैसे कि एक मनुष्य के साथ किया जाता है। उनका विनम्र आचरण और अपने से बड़ों और छोटों सबको सम्मान देना हम सबको एक सीख देता है।
5. कुसंगति से बचो : रामायण हमें शिक्षा देती है कि अच्‍छी संगति में रहो। कुसंगति में रहकर महापंडित भी राक्षस बन जाते हैं। जिस तरह रावण की संगत गलत थी उसी तरह कैकय की संगत भी गलत थी। नकारात्मक और अपराधिक किस्म के लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। इसलिए हमें सीख मिलती है कि हमें अच्छी संगति में रहना चाहिए ताकि नकारात्मकता हम पर हावी ना हो।
6. भक्ति में है शक्ति : संपूर्ण ब्रह्मांड में लक्ष्मण, भरत और हनुमानजी जैसा भक्त खोजना मुश्किल है। निःस्वार्थ सेवा और भक्ति का ही कमाल है कि बड़े बड़े समुद्र को लांघा जा सकता है, पहाड़ों को उठाया जा सकता है और समुद्र पर सेतु बांधा जा सकता है।जिन लोगों की भक्ति बदलती रहती है वे अधम मनुष्य अपना जीवन व्यर्थ गंवा देते हैं। संसार में प्रभु श्रीराम की भक्ति ही तारने वाली और संकटों से बचाने वाली है। भक्तों में वह भक्त श्रेष्ठ है जो श्रीराम और उनके भक्तों का भक्त है।हनुमानजी की भक्ति हमें यह बताती है कि हमें अपने आराध्य के चरणों में बिना किसी संदेह के अपने आप को समर्पित कर देना चाहिए। जब हम अपने आपको उस सर्वव्यापक के चरणों में समर्पित कर देते हैं, तो हमें निर्वाण या मोक्ष की प्राप्ति होती है और जन्म-मरण से छुटकारा मिलता है।
7. बदले की भावना न रखो : प्रभु श्रीराम से बदला लेना चाहती थी सूर्पणखां। रावण के मन में भी अपनी बहन सूर्पनखा के अपमान का बदला लेने की भावना थी। बदले की भावना रखने वाला क्रोध, विश्वासघात और प्रतिशोध के खुद के जाल में खुद ही उलझता जाता है। अक्सर लोग दूसरे को नुकसान पहुंचाने के चक्कर में बदले की आग में खुद को ही जला बैठते हैं। कई लोग तो बहुत ही छोटी सी बात को लेकर ही बदला लेने के बारे में सोचने लगते हैं, जो कि बहुत ही बुरी स्थिति है।
8. धैर्य और शांति : प्रभु श्रीराम का धैर्य देखते ही बनता है। उन्होंने कभी भी क्रोध, व्यग्रता या बैचेनी का परिचय नहीं दिया बल्कि विपरित परिस्थिति में धैर्य दिखाया और समस्याओं के समाधना की बात सोची। सिर्फ राम ही नहीं रामायण का हर पात्र इसी का परिचय देता है।वीर पुरुषों में ही धैर्य होता है। इस धैर्य के कारण ही प्रभु श्रीराम के मुख पर परम शांति है।
उनका शांत और दया भाव से एक पुत्र, पति, भाई और एक राजा की जिम्मेदारियों का निर्वहन करना हमें आपसी प्रेम और सम्मान जैसे मानवीय गुणों से अवगत कराता है। एक खुशहाल और संतुष्ट जीवन के लिए धैर्य और शांति से काम लेने की जरूरत होती है।
9. वचन का पालन करो : श्री राम से यह शिक्षा मिलती है कि प्राण जाई पर वचन ना जाई। प्रभु श्रीराम ने अपने जीवन में कई लोगों को वचन दिया और उसे पूरा भी किया। सुग्रीव को राजपद दिया, वि‍भीषण को लंकेश बनाया और जामवंत ने जब कहा कि प्रभु इस युद्ध में तो मेरा पसीना ही नहीं निकला तब श्रीराम ने वचन दिया की आपकी इच्‍छा द्वापर में पूरी करूंगा। तब श्रीराम ने श्रीकृष्ण रूप में जामवंतजी से युद्ध किया और उनका पसीना बहा दिया।
10. हर पात्र से मिलती है शिक्षा : रामायण के हर पात्र से हमें मिलती है शिक्षा। कैकयी से यह शिक्षा मिलती है कि साथ में चमचे मत रखो या मंथरा जैसे सलाहकार मत रखो। दशरथ से यह शिक्षा मिलती है कि ऐसा कोई वचन मत दो जो मुसीबत खड़ी कर दे। हनुमानजी और लक्ष्मण जी से यह शिक्षा मिलती है कि प्रभु का प्रत्येक वचन ही हमारा जीवन और आदेश है। लक्ष्य को भेदना ही हमारा लक्ष्य है।
11. राज धर्म का पालन : प्रभु श्रीराम ने राजधर्म का पालन करने के लिए माता सीता का परित्याग कर दिया था। उन्होंने अपने राज्य की प्रजा को हर तरह से सुखी रखा।
अंत में कहेंगी की रामायण से हमें माता-पिता की आज्ञा का पालन करना, भाइयों से प्रेम करना, गुरु का आदर करना, अपने से छोटों को प्रेम और सम्मान देना, एक पत्निव्रत धर्म का पालन करना, पति के प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखना, राजधर्म और कर्तव्य का पालन करना। बुराइयां छोड़कर भक्तिपूर्ण जीवन यापन करना और भौतिक सुख की जगह कम साधनों को अपनाना आदि सभी हमें रामायण से शिक्षा मिलती है। संपूर्ण रामायण भोगवादि संस्कृति के विरुद्ध त्याग और तप की महिमा की शिक्षा देती है।
12  खुद को बनाओ आइडियल : प्रभु श्रीराम ने अपने जीवन को इस तरह मैनेज किया कि आज भी उनके कार्य, व्यक्तित्व और शासन को याद किया जाता है। प्रभु श्रीराम के पास अनंत शक्तियां थीं लेकिन उन्होंने उसका कभी भी दुरुपयोग नहीं किया जैसा की रावण ने किया। रावण ने अपनी शक्तियों का प्रदर्शन किया लेकिन राम ने मर्यादा और विनम्रता का। वे यह सोचकर जीए कि मैं लोगों के लिए यदि मैं गलत चला तो संपूर्ण भारत गलत राह पर चलेगा। इसलिए आप जीवन के किसी भी क्षेत्र में हो घर में ऑफिस में या और कहीं आप यह मत भूलों की लोग आपको जज कर रहे हैं।

13. टीम को दो नेतृत्व का मौका : प्रभु श्रीराम अपने साथ दो लोगों की टीम लेकर चले थे। पहली उनकी पत्नी और दूसरा उनका भाई। तीनों ने मिलकर टीम वर्क किया, लेकिन नेतृत्व श्री राम के हाथ में ही दे रखा था। लेकिन प्रभु श्रीराम ने अपने साथ के सभी लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई ऐसे मौके आए जबकि नेतृत्व उन्होंने दूसरों के हाथ में दिया। श्रीराम ने रणनीति, मूल्य, विश्वास, प्रोत्साहन, श्रेय, दूसरों की बातों को ध्यान और धीरज से सुनना और पारदर्शिता को अपने सामने रखा और अपने वनवास काल में एक बहुत बड़ी टीम बनाकर सभी को नेतृत्व करने का मौका दिया।
14. संपूर्ण जीवन हो योजनाओं भरा : प्रभु श्रीराम ने अपने जीवन का हर कार्य एक बेहतर योजना के साथ संपन्न किया। उन्होंने पहले ऋषि मुनियों को भयमुक्त कर उनका समर्थन हासिल किया, सुग्रीव को राजा बनाया। तमिलनाडु के तट से श्रीलंका तक पुल बनाना आसान कार्य नहीं था। वाल्मीकि के अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो। उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुलर्निर्माण करने का फैसला लिया।दूसरी ओर रावण जैसे संपन्न, शक्तिशाली और घातक हथियारों से लैसे व्यक्ति और उसकी सेना से लड़ना आसान नहीं था लेकिन श्रीराम के पास योजना थी साथ ही उन्होंने अपने साथियों से भी कई तरह की योजनाओं पर वार्तालाप किया। यदि आपके पास कोई योजना नहीं है तो आप जीवन में अपने लक्ष्य को नहीं भेद सकते हो। लक्ष्य तभी भेदा जा सकता है जबकि एक बेहतर योजना हो जिस पर टीम कार्य कर सके।
15. समानता : अपने टीम के लोगों के एक समान ही समझना और सभी को समान रूप से प्रोत्साहन और सम्मान देना ही टीम को बिखरने से रोकता है। एक समझदार मैनेजर टीम को तभी साथ लेकर आगे बढ़ सकता है जबकि वह किसी को भी बड़ा या छोटा न समझता हूं। असमान समझने से टीम में निराशा और उपेक्षा का भाव विकसित होता है। भगवान राम चूंकि राज परिवार से थे। लेकिन उन्होंने अपने व्यवहार से ऐसा कभी भी प्रकट नहीं होने दिया। वे वनवासियों के बीच वनवासी की तरह ही रहे। वे चाहते तो केवट या सबरी को बिना गले लगाए भी अपना वनवास गुजार सकते थे। लेकिन उन्होंने उक्त सभी के साथ ही जटायु, संपाति और तमाम आदिवासियों को गले लगाया और उन्होंने मनुष्य को बस मनुष्य ही समझा। उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति के निजी दर्द को भी समझा। ऐसा करने से उनके साथ लोगों में समानता का विश्वास पैदा हुआ।
16. योग्यता को समझने की क्षमता : प्रभु श्रीराम यह भलिभांति जानते थे कि किस व्यक्ति से कब कौनसा काम किस तरह कराना है। उन्होंने हनुमान को दूत बनाकर भेजा और उसके बाद अंगद को दूत बानाकर भेजा। वे जानते थे कि दोनों में क्या भेद है और दोनों क्या कर सकते हैं। उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति को उसकी योग्यता अनुसार उसे कार्य सौंपा लेकिन उन्होंने लोगों के ऐसे कार्य भी सौंपे जिसमें वे उन्हें दक्ष करना चाहते थे। दक्षता बढ़ाने के लिए भी उन्होंने कार्य सौंपे।
17. विशाल सेना का गठन : जब प्रभु श्री राम की पत्नी सीता का रावण हरण करके ले गया तब श्रीराम के समक्ष सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया था। वह वन-वन सीता को खोजने के लिए भटके और उन्होंने अपनी बुद्धि और कौशल से आखिर यह पता लगा ही लिया की सीता कहां है। फिर उन्होंने सुग्रीव के लिए बाली का वध किया और सुग्रीव का समर्थन हासिल किया। इसी तरह उन्होंने कई राजाओं की सहायता की।श्री राम का जब रावण युद्ध हुआ तो वे कोई अयोध्या से सेना लेकर नहीं गए थे। वहीं उन्होंने मैनेजमेंट कर सेना तैयार की। उन्होंने वानर और रक्ष जाती के लोगों को एकत्रित किया और एक विशाल सेना का गठन कर दिया। खास बात तो यह कि न वेतन, न वर्दी, न आर्म्स और उस सेना से विजय हासिल की। कम संसाधन और कम सुविधाओं और संघर्ष के बावजूद उन्होंने पुल बनाकर लंका में प्रवेश किया और विजय हासिल की।
18. समस्याओं में समाधान ढूंढना : प्रभु श्रीराम के समक्ष कई बार ऐसा मुश्किल हालत पैदा हुए जबकि संपूर्ण टीम में निराशा के भाव फैल गए थे लेकिन उन्होंने धैर्य से काम लेकर समस्याओं के समाधान को ढूंढा और फिर उस पर कार्य करना प्रारंभ किया। उन्होंने सीता हरण से लेकर, अहिराणण द्वारा खुद का हरण और लक्ष्मण के मुर्च्छित हो जाने तक कई तरह के संकटों का सामना किया लेकिन उनकी उत्साही टीम ने सभी संकटों पर विजयी पाई। संटक उसी व्यक्ति के समक्ष खड़े होते हैं जो उनका हल जानता है। सफलता का रास्ता आपके खिलाफ खड़ा किया गया विरोध और संकट ही बनाता है।

रामायण और  रामचरितमानस के उत्तर कांड में फर्क क्यूं?

रामायण या रामचरित मानस के उत्तर कांड के संबंध में बहुत लोगों को इस बात का संशय है कि इसमें घटनाओं का वर्णन वैसा नहीं है जैसा कि शोधकर्ता मानते हैं। रामायण और रामचरित मानस दोनों ही का उत्तर कांड बहुत ही भिन्न है। ऐसा क्यों? यह शोध का विषय हो सकता है। रामानंद सागर द्वारा उत्तर कांड के नाम से उत्तर रामायण नाम का सीरियल बनाया गया है। आओ जानते हैं दोनों ही रामायण के काण्ड का फर्क।
1. वाल्मीकि कृत रामायण का उत्तर कांड : उत्तरकाण्ड में राम के राज्याभिषेक के अनन्तर कौशिकादि महर्षियों का आगमन, महर्षियों के द्वारा राम को रावण के पितामह, पिता तथा रावण का जन्मादि वृत्तान्त सुनाना, सुमाली तथा माल्यवान के वृत्तान्त, रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण आदि का जन्म-वर्णन, रावणादि सभी भाइयों को ब्रह्मा से वरदान-प्राप्ति, रावण-पराक्रम-वर्णन के प्रसंग में कुबेरादि देवताओं का घर्षण, रावण सम्बन्धित अनेक कथाएँ, सीता के पूर्वजन्म रूप वेदवती का वृत्तान्त, वेदवती का रावण को शाप, सहस्त्रबाहु अर्जुन के द्वारा नर्मदा अवरोध तथा रावण का बन्धन, रावण का बालि से युद्ध और बालि की कांख में रावण का बन्धन, सीता-परित्याग, सीता का वाल्मीकि आश्रम में निवास, निमि, नहुष, ययाति के चरित, शत्रुघ्न द्वारा लवणासुर वध, शंबूक वध तथा ब्राह्मण पुत्र को जीवन प्राप्ति, भार्गव चरित, वृत्रासुर वध प्रसंग, किंपुरुषोत्पत्ति कथा, राम का अश्वमेध यज्ञ, वाल्मीकि के साथ राम के पुत्र लव कुश का रामायण गाते हुए अश्वमेध यज्ञ में प्रवेश, राम की आज्ञा से वाल्मीकि के साथ आयी सीता का राम से मिलन, सीता का रसातल में प्रवेश, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न के पुत्रों का पराक्रम वर्णन, दुर्वासा-राम संवाद, राम का सशरीर स्वर्गगमन, राम के भ्राताओं का स्वर्गगमन, तथा देवताओं का राम का पूजन विशेष आदि वर्णित है।
2. तुलसीदास गोस्वामी कृत रामचरितमानस का उत्तर कांड : इसमें मंगलाचरण, भरत विरह तथा भरत-हनुमान मिलन, अयोध्या में आनंद, श्री रामजी का स्वागत, भरत मिलाप, सबका मिलनानन्द, राम राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुति, वानरों की और निषाद की विदाई, रामराज्य का वर्णन, पुत्रोत्पति, अयोध्याजी की रमणीयता, सनकादिका आगमन और संवाद, हनुमान्‌जी के द्वारा भरतजी का प्रश्न और श्री रामजी का उपदेश, श्री रामजी का प्रजा को उपदेश (श्री रामगीता), पुरवासियों की कृतज्ञता, श्री राम-वशिष्ठ संवाद, श्री रामजी का भाइयों सहित अमराई में जाना, नारदजी का आना और स्तुति करके ब्रह्मलोक को लौट जाना, शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ मोह, गरुड़जी का काकभुशुण्डि से रामकथा और राम महिमा सुनना, काकभुशुण्डि का अपनी पूर्व जन्म कथा और कलि महिमा कहना, गुरुजी का अपमान एवं शिवजी के शाप की बात सुनना, रुद्राष्टक, गुरुजी का शिवजी से अपराध क्षमापन, शापानुग्रह और काकभुशुण्डि की आगे की कथा, काकभुशुण्डिजी का लोमशजी के पास जाना और शाप तथा अनुग्रह पाना, ज्ञान-भक्ति-निरुपण, ज्ञान-दीपक और भक्ति की महान्‌ महिमा, गरुड़जी के सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डि के उत्तर, भजन महिमा, रामायण माहात्म्य, तुलसी विनय और फलस्तुति और रामायणजी की आरती का वर्णन मिलता है।

वाल्मीकि कृत उत्तर कांड में राम के रावण वध की आगे की गाथा का वर्णन है, जिसमें राम का राज्याभिषेक, सीता परित्याग, वाल्मीकि आश्रम में लव और कुश का जन्म, बचपन और सीता का जीवन। शत्रुघ्न द्वारा लवणासुर का वध और इसके अलावा पूर्व के ऋषि मुनियों और राजाओं की गाथा का वर्णन मिलेगा।
दूसरी ओर गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस में शिव और पार्वती का रामकथा के संबंध में संवाद, काकभुशुण्डि और गरुढ़ संवाद सहित ज्ञान और उपदेश की बातें ही ज्यादा हैं। इसमें सीता परित्याग और लव एवं कुश के बारे में उल्लेख नहीं मिलता है।विद्वान लोग मानते हैं कि ऋषि वाल्मीकि राम के समकालीन थे और गोस्वामी तुलसीदास राम के भक्त थे। यदि प्रमाण की बात सामने आए तो वाल्मीकि रामायण को ही प्रमाण मानना चाहिए, क्योंकि वही सही रामायण है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस को लिखने के पूर्व वाल्मीकि कृत रामायण सहित दक्षिण भारत की रामायण को भी पढ़ा था। अत: उन्होंने सभी को पढ़कर लिखा जबकि वाल्मीकि ने राम के जीवन को देखकर रामायण को लिखा था।
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