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महारानी पद्मावती की बलिदान की कहानी……

आज हम बात करेंगे रानी पद्मावती की. हमारे इतिहास में बहुत सी ऐसी कथाएँ प्रचलित हैं जिनके ऐतिहासिक आधार नहीं मिलते लेकिन ये कथा लोगो के जन मन में बस चुकी हैं. ऐसी ही एक कथा हैं रानी पद्मावती की कथा. रानी पद्मावती चित्तौड़ के राजा रतन सिंह की पत्नी थी. परम रूपवती, परम मोहक, ऐसा रूप की अँधेरे में भी उजाला कर दे. पद्मिनी बहुत खूबसूरत थी, योवन ओर जोवरव्रत की कथा मध्यकाल से लेकर वर्तमानकाल के चरणों, कवियों ओर ध्र्मप्रच्राको ओर लोक गायकों के द्वारा अलग अलग रूपों में व्यक्त की जाती हैं. रानी पद्मावती के पिता का नाम गन्धर्व सिंह ओर माता का नाम चम्पावती था, चित्तौड़ की इस रानी के रूप की चर्चा दूर दूर तक फ़ैल गयी थी. दिल्ली के सुलतान तक भी रानी के रूप की चर्चा पहुंची. 13वी शताब्दी के अंतिम दिन चल रहे था. दिल्ली की गद्दी पर सुलतान अल्लाउदीन खिलजी का शासन था.

रानी की रूप की चर्चा को सुनकर सुल्तान चित्तौड़ पहुंचा और राजा रतन सिंह से निवेदन करने लगा की वे एक बार अपनी रानी का चेहरा दिखा दे पर राजा रत्न सिंह ने अल्लाउदीन के इस निवेदन को ख़ारिज कर दिया पर अल्लाउदीन नहीं माना ओर राजा रतन सिंह से बार बार हठ करने लगा ओर आखिरकार प्रजा की भलाई को देखते हुवे रानी पद्मावती अल्लाउदीन को अपना चेहरा दिखाने के लिए राज़ी हो गयी पर रानी ने कहा वो पराये मर्द के सामने इस तरह नहीं आएंगी.आखिरकार ये उनकी मर्यादा का सवाल हैं. रानी सरोवर के बीच अपने महल की सीढियों पर आएगी ओर सुलतान कमरे में लगे बड़े बड़े शिशो से उनका प्रतिबिंब देखेंगे. इस तरह राजकुल की मर्यादा भी कायम रहेगी ओर सुलतान रानी के दर्शन भी कर पाएगा. ठीक समय पर सहेलियों से घिरी रानी महल की सीढियों पर आई इतनी दूर से भी रानी के रूप को देखकर सुलतान चकित रह गया ओर रानी के रूप का प्रतिबिम्ब देखकर सुलतान उन पर मोहित हो गया ओर मन ही मन यह निश्चय करने लगा की वो रानी को हासिल कर के ही रहेगा.

राजा रत्न सिंह अपने राज्य में आए मेहमान की मेहमान नवाजी में कोई कमी नहीं करना चाहते थे इसीलिए वे स्वयं सुलतान को अपने महल के बाहर छोड़ने गए. दोनों बातचीत में इतना खो गए की राजा को पता ही नहीं चला की कब उनके राज्यों के सातो द्वार पीछे निकल गए. झाड़ियो में सुलतान अल्लाउदीन के सैनिको ने राजा रत्न सिंह पर हमला बोल कर उन्हें कैद कर लिया और महल में सन्देश पहुंचा दिया गया की राजा को यदि जीवित देखना चाहते हो तो रानी को सुलतान के आगे पेश करो. रानी सोच में पड़ गयी की अब वो क्या करे. एक और बात मर्यादा की थी तो दूसरी ओर सवाल पति का.राह पर सैनिको ने महाराजा रत्न सिंह को छुडाने के बहुत प्रयत्न किये लेकिन सब असफल रहे ओर अल्लाउदीन बार बार यही कहलवा रहा था की रानी को तत्काल उनके सामने पेश किया जाए. रानी पद्मावती हमारे पड़ाव में आएगी तभी हम रजा रत्न सिंह को मुक्त करेंगे अन्यथा नहीं. मायके से आए अपने सम्बन्धी गोरा ओर उनके भतीजे से रानी ने इस विषय में बात की. रानी ने भी अल्लाउदीन की तरह एक युक्ति सोची ओर उसके राज्य में कहलवाया की वो एक ही शर्त में पड़ाव पर आएंगी जब उन्हें महाराजा रत्न सिंह से एक बार मिलने दिया जाए ओर इसके साथ ही उनकी सभी दासियों का पूरा खलीफा भी उनके महल में आने दिया जाए. इस प्रस्ताव को सुलतान ने स्वीकार कर लिया. योजना अनुसार रानी पद्मावती की पालकी में उनकी जगह उनका ख़ास सम्बन्धी काका गोरा बैठा ओर दासियों की पालकी में राजपूत बैठे जो सभी शस्त्रों के साथ थे.

 पालकियो को उठाने वालो की जगह भी सैनिको ने ले ली थी ओर इस तरह से उनका पड़ाव सुल्तान के महल तक पहुंचा ओर अचानक से उन पर हमला कर दिया. राजपूतो का इस तरह हमला अल्लाउदीन सहन नहीं कर पाया ओर महल में भगदड़ मच गयी ओर इस भगदड़ में रत्न सिंह अपने राज्य में वापस आने में सक्षम हुवे. इतिहास की किताबे बताती हैं की अल्लाउदीन ने चित्तौड़ पर हमला कर दिया पर चित्तौड़ का किला नज़रबंद था इसीलिए अल्लौद्दीन किले में नहीं जा सका जिसके चलते किले में खान पान की कमी होने लगी. सुलतान के सामने चित्तौड़ के सैनिको की संख्या बहुत कम थी जब राज्यों की स्त्रियों को ये महसूस होने लगा की चित्तौड़ की हार निश्चित हैं तो उन्होंने दुश्मनों के हाथ आने से अच्छा मृत्यु को गले लगाना सही समझा. चित्तौड़ में जोहर की प्रथा थी जब पुरुष युद्ध के लिए जाते थे तो स्त्रियाँ अपने मान सम्मान की रक्षा जोहर में बैठ कर करती थी. जोहर को सजाया गया. 16,000 राजपुताना महिलाएं सोलह श्रृंगार कर के वीर गाथाएं गाते हुवे घर से निकली. दुर्ग मैदान में विशाल चिताए सजाई गयी. कुलीन रानी ने कई महिलाओं समेत अपनी इज्ज़त को बचाने के लिए जोहर यानी आग में कूद कर अपनी जान देना बेहतर समझा. पहली रानी चिता में कूदी और फिर उनके पीछे पीछे सभी महिलाए भी इसके बाद युद्ध को जीतता हुआ सुलतान जब महल में प्रवेश कर रहा था तो उसे केवल सूनी गलिया ही दिखाई दी या जलती दिखाई दी तो वो थी एक बड़ी चिता. इसके साथ हम सभी को मिला एक पृष्ठ इतिहास का जो महारानी पद्मावती की बलिदान की कहानी कह रहा था. सोच कर ही रूह काँप जाती हैं की हमारी देश की विरंगनाए इज्ज़त की खातिर जल गयी. 6 महीने और 7 दिन के खुनी संघर्ष ओर विजय के बाद भी असीम उत्त्सुकता के साथ खिलज़ी ने चित्तौडगढ में प्रवेश किया लेकिन उसे एक भी पुरुष, स्त्री या बालक जीवित ना मिले इससे पता चलता हैं की आखिर में विजय किसकी हुई ओर किसने उसकी अधीनता स्वीकार की. उसके स्वागत के लिए बची थी तो सिर्फ जोहर की प्रज्ज्वलित आग और जगह जगह बिखरी लाशें जिन पर मंडरा रहे थे गिद्द ओर कवें.

जयपुर के नाहरगढ़ में किले की शूटिंग के दौरान फिल पद्मावती की शूटिंग के में फिल्म निर्माता संजय लीला भासली के साथ हुई मार-पीट के बाद ही पद्मावती की गाथा सबको याद आ गयी. शूटिंग के दौरान राजपूतना करनी सेना के कार्यकर्ताओं ने वहां आकर तोड़-फोड़ की और आरोप लगाया की भंसाली द्वारा रानी पद्मावती की फिल्म को गलत तरीके से दिखाया गया हैं. भंसाली ने अपनी फिल्म में राजपूत रानी और सुलतान के बीच प्रेम सम्बन्ध दिखाए जो की सरासर गलत हैं उनकी मांग हैं की भंसाली अपनी फिल्म से उन दृश्यों को हटा दे और इतिहास के साथ छेड़छाड़ ना करे.  हो सकता हैं की आगे आने वाले समय में भंसाली की फिल्म में किसी और तरह से सच्चाई को दिखाया जाएगा क्यूंकि अब तक उन्हें समझ आ चूका होगा की उन्होंने एक समुदाय के लोगो की भावना को आहात किया हैं. आज भी खिलजी की क्रूरता और रानी के साहस की कहानी सुनते ही दिल सहर उठता हैं. राजस्थान सहित भारतवर्ष के इतिहासकार, लेखक यहाँ तक की साहित्याकार भी उनके बारे में बहुत कुछ लिखते हैं. रानी पद्मावती राजपूत समाज के लिए आदर्श पात्र हैं. ऐसे पात्र पर फिल्म बनाते समय सतर्कता की जरुरत होती हैं ताकि किसी भी समुदाय की भावनाओं से खिलवाड़ ना हो. देश की गौरवपूर्ण सभ्यता यहाँ की संस्कृति यहाँ तक की इसके इतिहास के साथ भी कोई छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए.

 

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