Pages Navigation Menu

Breaking News

संघ कार्यालय पर संघी-कांग्रेसियों ने फहराया तिरंगा
पंपोर में मुठभेड़ में तीनों आतंकवादी मारे गए  
वाराणसी में केजरीवाल को दिखाए काले झंडे

‘भविष्य के भारत’ पर मोहन भागवत की बातों का संदेश

mohan-bhagwat-12001राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत के भविष्य को लेकर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के साथ ही अपनी नीतियों, अपने क्रियाकलापों और उद्देश्यों के बारे में जिस तरह विस्तार से प्रकाश डाला उसके बाद कम से कम उन लोगों की उसके प्रति सोच बदलनी चाहिए जो उसे बिना जाने-समझे एक खास खांचे में फिट करके देखते रहते हैं। एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में संघ किस तरह बदलते समय के साथ खुद को बदल रहा है, इसका एक प्रमाण तो यही है कि उसने औरों और यहां तक कि अपने विरोधियों और आलोचकों को अपने ढंग के एक अनूठे कार्यक्रम में आमंत्रित किया। देश और शायद दुनिया के इस सबसे विशाल संगठन के नेतृत्व ने इन आमंत्रित लोगों के सवालों के जवाब भी दिए।भागवत ने कहा कि राममंदिर का निर्माण जल्द से जल्द होना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘कश्मीर में धारा 370 पर हमारा रुख सभी जानते हैं। हम इसे हटाने के पक्ष में हैं।’ मोहन भागवत ने इस दौरान जाति व्यवस्था, आरक्षण, अल्पसंख्यक, समलैंगिकता, जम्मू-कश्मीर और शिक्षा नीति जैसे कई मुद्दों पर आए सवालों के जवाब दिए। इस दौरान बताया गया कि उपस्थित लोगों की तरफ से 215 सवाल आए हैं।

भाजपा विरोध की राजनीति करने वाले अधिकतर दलों के नेताओं ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीन दिवसीय कार्यक्रम का जिस तरह बहिष्कार करते हुए उसे सगर्व सार्वजनिक भी किया उससे यही स्पष्ट हुआ कि जब संघ खुद में बदलाव लाने की सामथ्र्य दिखा रहा तब उसके आलोचक और विरोधी जहां के तहां खड़े रहने में ही खुद की भलाई देख रहे हैं। वे इसके लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन समझदार तो वही होता है जो खुद को देश, काल और परिस्थितियों के हिसाब से बदलता है। नि:संदेह संघ को जानने-समझने का यह मतलब नहीं कि उसका अनुसरण किया जाए, लेकिन इसका भी कोई मतलब नहीं कि उसकी नीतियों को समाज एवं राष्ट्रविरोधी करार देकर उसे अवांछित संगठन की तरह से देखा जाए या फिर उसका हौवा खड़ा किया जाए।

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने राष्ट्रीयता, भारतीयता के साथ समाज एवं राष्ट्र निर्माण की आवश्यकता पर जिस तरह अपने विचार व्यक्त किए उससे यह स्पष्ट है कि इस संगठन की दिलचस्पी राजनीति में कम और राष्ट्रनीति में अधिक है। उन्होंने समाज निर्माण को अपना एक मात्र लक्ष्य बताया। इस क्रम में उन्होंने हिंदू और हिंदुत्व पर जोर देने के कारणों का भी उल्लेख किया। इससे संघ और हिंदुत्व को लेकर व्याप्त तमाम भ्रांतियां दूर हुई होंगी, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि अभी भी कुछ भ्रांतियां और संदेह बरकरार होंगे। यह सही है कि संघ के इस कार्यक्रम का प्रयोजन लोगों को अपनी बातों से सहमत करना नहीं, बल्कि अपने बारे में जानकारी देना था, लेकिन उचित यही होगा कि वह इस तरह के आयोजन आगे भी करता रहे।

सतत संवाद-संपर्क तमाम समस्याओं के समाधान की राह दिखाता है। जब संघ हिंदुत्व को भारतीयता का पर्याय मानकर यह कह रहा है कि वह अन्य मत-पंथ के अनुयायियों को साथ लेकर चलना चाहता है तब फिर कोशिश यही होनी चाहिए कि इस अभीष्ट की प्राप्ति यथाशीघ्र कैसे हो। इस कोशिश में अन्य भी भागीदार बनें तो बेहतर। आखिर इससे बेहतर अवसर और क्या हो सकता है कि संघ सभी को आमंत्रित कर रहा है?जब संघ यह चाह रहा है कि वह राष्ट्र निर्माण के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ना चाहता है तो फिर उसकी कोशिश होनी चाहिए कि समाज का हर वर्ग उसके साथ जुड़े, क्योंकि सबल और समरस समाज के जरिये राष्ट्र निर्माण का काम कहीं अधिक आसानी से किया जा सकता है।

जाति व्यवस्था के बारे में एक सवाल का जवाब देते हुए मोहन भागवत ने कहा कि यह कभी जाति व्यवस्था रही होगी, अब जाति अव्यवस्था है। सामाजिक विषमता को बढ़ाने वाली सभी बातें बाहर होनी चाहिए। यह यात्रा लंबी है, लेकिन यह करनी ही होगी। संघ में किसी से जाति नहीं पूछी जाती। संघ में कोटा सिस्टम नहीं है। उन्होंने कहा, ‘हमें अपने जैसे को नहीं पकड़ना है, सबको पकड़ना है। सम्पूर्ण समाज का संगठन है। यात्रा लंबी है, हम उस तरफ बढ़ रहे हैं।’ गोरक्षा और मॉब लिंचिंग को लेकर पूछे गए सवाल के बारे में जवाब देते हुए उन्होंने कहा, ‘गाय ही नहीं, किसी भी मुद्दे पर भी कानून हाथ में लेना या तोड़फोड़ करना अपराध है। गोरक्षा होनी चाहिए, लेकिन गोरक्षकों और उपद्रवियों को में तुलना नहीं होनी चाहिए। गाय की रक्षा की गोसंवर्धन का ख्याल रखना चाहिए।’ उन्होंने कहा कि उपद्रवी तत्व का गोरक्षा से कोई लेना-देना नहीं है। यह बात भी रिसर्च में सामने आई है कि गाय की हाथ से सेवा करने वालों का आपराधिक भाव खत्म होता है। कई जेलों में इसका प्रयोग हो चुका है।

समलैंगिकता
मोहन भागवत ने कहा, ‘समाज का प्रत्येक व्यक्ति समाज का एक अंग है। उनकी व्यवस्था करने का काम समाज को ही करना चाहिए। समय बहुत बदला है, समय के साथ समाज भी बदलता है। स्वयं में कुछ अलग प्रकार का अनुभव करने वाले लोग समाज से अलग-थलग न पड़ जाएं, यह भी चिंता समाज को करनी चाहिए।’

आरक्षण और संघ
आरक्षण के सवाल पर जवाब देते हुए मोहन भागवत ने कहा, ‘सामाजिक विषमता को हटाकर समाज में सबको अवसर मिले। संविधान सम्मत आरक्षण को संघ का समर्थन है। आरक्षण कब तक चलेगा, इसका निर्णय वही करेंगे। आरक्षण समस्या नहीं है। आरक्षण की राजनीति समस्या है। समाज के सभी अंगों को साथ लाने पर ही काम करना होगा। जो ऊपर हैं, उन्हें झुकना होगा और जो नीचे हैं, उन्हें एडी ऊपर करके बढ़ना होगा। 100-150 साल तक समझौता करके समाज के सभी अंगो को साथ लाया जा सकता है तो यह महंगा सौदा नहीं है।’

राममंदिर पर यह बोले भागवत
राममंदिर निर्माण के सवाल पर उन्होंने कहा, ‘संघ के सरसंघचालक होने के नाते मेरा मत है कि राम मंदिर जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर बनना ही चाहिए। राम जहां आस्था का विषय नहीं हैं, वहां भी वह मर्यादा का विषय है। करोड़ों लोगों की आस्था का विषय है। देशहित विचार होता तो मंदिर बन चुका होता।’

शिक्षा में भारतीय मूल्य
शिक्षा नीति के सवाल पर जवाब देते हुए उन्होंने कहा, ‘धर्म की शिक्षा भले न दें, लेकिन देश की शिक्षा अनिवार्य है। शिक्षा का स्तर नहीं घटता, बल्कि शिक्षा देने वाले और शिक्षा लेने वालों का स्तर घटता है। हर कोई इंजीनियर या डॉक्टर नहीं बन सकता, जो करना उसे बढ़िया ढंग से करना। ज्यादा कमाने का मंत्र लेकर भेजेंगे तो दिक्कत होगी। शिक्षकों को भी यह ख्याल होना चाहिए कि वह देश का भविष्य गढ़ रहे हैं। डिग्री तो मिल रही है, लेकिन रिसर्च का काम कम हो रहा है। शिक्षा नीति में अमूल चूल परिवर्तन हो, संघ लंबे समय से यह मांग कर रहा है।’

भाषा के मुद्दे पर बोले भागवत
भाषा के मुद्दे पर बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा, ‘अंग्रेजी के प्रभुत्व की बात हमारे मन में है। हमें अपनी मातृभाषाओं को सम्मान देना शुरू करना होगा। किसी भाषा से शत्रुता की जरूरत नहीं। अंग्रेजी हटाओ नहीं, अंग्रेजी का हव्वा हटाओ। जितना स्वभाषा में काम करेंगे उतनी बात बनेगी। देश की उन्नति के नाते हमारी भाषा में शिक्षा हो। किसी एक भारतीय भाषा को सीखें, यह मन बनाना पड़ेगा।’

उन्होंने कहा, ‘हिंदी प्रांतों के लोगों को भी चाहिए कि दूसरे प्रांतों की भाषा को सीखना चाहिए। संस्कृत के विद्यालय घट रहे हैं, क्योंकि महत्व घट रहा है। अपनी विरासत को समझने के लिए संस्कृत भाषा को महत्व देना जरूरी है। भारत की सभी भाषाएं मेरी हैं, यह भाव होनी चाहिए।’

‘जनसंख्या को लेकर बने नीति’
जनसंख्या के मामले पर बोलते हुए संघ प्रमुख ने कहा, ‘संघ का प्रस्ताव है कि जनसंख्या का विचार एक बोझ के रूप में है, लेकिन जनसंख्या काम करने वाले हाथ भी देती है। डेमोग्राफिक बैलेंस की बात समझनी चाहिए। इसे ध्यान में रखकर नीति हो। अगले 50 साल को ध्यान में रखकर नीति बने। नीति को सब पर समान रूप से लागू किया जाए। संतान कितनी हो यह सिर्फ देश का नहीं बल्कि परिवार का भी विषय है।’

जम्मू-कश्मीर पर यह बोले भागवत
मोहन भागवत ने कहा, ‘धारा 370 और 35ए के बारे में हमारे विचार सब जानते हैं। हमारा मानना है कि ये नहीं होने चाहिए। भटके युवाओं के लिए देश संघ के स्वयंसेवक कार्य कर रहे हैं। वहां के लोगों का सहयोग और समर्थन भी मिलता है। मैं विजयदशमी के भाषण में बोला था, कश्मीर के लोगों के साथ मेल-मिलाप बढ़ना चाहिए।’ उन्होंने कहा कि एक देश के लोग एक कानून के भीतर रहें। समान नागरिक संहिता का मतलब सिर्फ हिंदू और मुसलमान ही नहीं है। सबके विचारों को ध्यान में रखकर किसी एक विचार पर मन बनना चाहिए।

संघ दुनिया का सबसे लोकतांत्रिक संगठन
भागवत ने कहा कि अगर सबसे लोकतांत्रिक संगठन को देखना है, तो संघ में आइए. संघ अब तक सबसे तानाशाह संगठन समझा जाता रहा है, लेकिन हर फैसला एक आम स्वयंसेवक के विवेक से और सामूहिक होता है. और फैसला एक होता है, इसलिए लोगों को लगता है कि एक व्यक्ति फैसले ले रहा है. ख़ास बात ये है कि संघ अपने खर्चे के लिए एक पैसा भी किसी बाहर वाले से नहीं लेता. अगर कोई देता भी है तो हम उसे वापस कर देते हैं. पूरा का पूरा खर्च गुरु दक्षिणा के कार्यक्रम पर चलता है. ये बात और है कि सेवा कार्य में लगे संघ के संगठन दान लेकर काम आगे ज़रूर बढ़ाते हैं.

संघ रिमोट कंट्रोल नहीं चलाता
मोहन भागवत ने रिमोट कंट्रोल वाली बहस पर भी विराम लगाने की कोशिश की. भागवत ने दो-टूक कहा कि रिमोट कंट्रोल जैसी कोई बात नहीं होती. बीजेपी और सरकार के साथ समन्वय बैठकें इसलिए नहीं होतीं कि कोई निर्देश देना होता है. चर्चा होती है और विचारों का आदान प्रदान होता है. संघ प्रमुख ने कहा कि संघ के अलग-अलग संगठन हैं और स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं. सभी संगठन नीति निर्णय के लिए स्वतंत्र हैं. उनके अच्छे या गलत कामों से संघ को जोड़ना गलत है. ये बात और है कि वो अगर अच्छा काम करेंगे तो संघ पूरी ताकत से उन्हें समर्थन देगा. संदेश बीजेपी के लिए भी था.

मुक्त नहीं युक्त भारत
मोहन भागवत के व्याख्यान की सबसे अहम बात इन्हीं लाइनों में छिपी थी, जब संघ प्रमुख ने कहा कि हम मुक्त वाले लोग नहीं, बल्कि युक्त वाले लोग हैं. अपने विरोधियों को भी साथ लेकर चलने वाला है संघ. संदेश बीजेपी को था जो कांग्रेस मुक्त भारत की बात करती है. और संकेत ये कि इससे संघ की स्वीकार्यता समाज के बाकी वर्गों में बढ़ेगी. इसलिए इशारों-इशारों में मोहन भागवत ने कहा कि कांग्रेस के रूप में देश की आज़ादी के लिए सारे देश में एक आंदोलन खड़ा हुआ, जिसमें अनेक सर्वस्वत्यागी महापुरुषों की प्रेरणा आज भी लोगों को प्रेरित करती है. जब कांग्रेस ने लाहौर में संपूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित किया तो डॉ. हेडगेवार ने सर्कुलर निकाल कर कहा था कि संघ फेरी निकालेगा यानी स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले कांग्रेस का सम्मान संघ करता है, क्योंकि कांग्रेस ही लड़ाई का एक चेहरा था. संदेश ये भी था कि आंदोलन में संघ ने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था.मोहन भागवत ने कहा कि देश के प्रतीक चिह्नों का भी संघ सम्मान करता है. फ्लैग कमिटी ने भगवा झंडे की भी सिफारिश की थी, पर तिरंगा आया तो संघ ने पूरा सम्मान किया. संघ प्रमुख ने साफ किया कि हर स्वयंसेवक तिरंगे का पूरा सम्मान करता है. संघ प्रमुख ने कहा कि जो संघ का विरोध करते हैं वो भी हमारे हैं और उनके विरोध में हमारी क्षति न हो इसकी चिंता हम ज़रूर करेंगे. संघ सर्व लोकयुक्त वाले लोगों का संगठन है और हम सबको जोड़ने के प्रयास में लगे रहते हैं, इसलिए सबको बुलाना हमारा प्रयास भी रहता है.

संघ महिला विरोधी नहीं
राहुल गांधी से लेकर कांग्रेस बार-बार यही आरोप लगाती है कि संघ में महिला नहीं हैं और वो महिला विरोधी हैं. मोहन भागवत ने इस पर भी संघ की लाइन साफ की. भागवत ने कहा कि 1931 में ही डॉ. हेडगेवार से पूछा गया कि आज वातावरण ऐसा नहीं कि पुरुष और महिला साथ काम कर सकें तो राष्ठ्रीय सेविका समिति बनायी गई. ये जब संघ बना तब से हुआ है. महिलाओं के लिए भी अलग-अलग काम चलते रहते हैं. ये संघ की कार्यपद्धति है. हम सभी को जोड़ने का प्रयास करते हैं.
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सभी मुद्दों पर बेबाक बातचीत की और संघ की दशा और दिशा भी तय कर दी. संघ को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में जब बहस छिड़ेगी तो भागवत की इन बातों का ध्यान तो सभी को रखना ही पड़ेगा. आखिर संघ प्रमुख जो कहते हैं वही संघ के लिए पत्थर की लकीर होती है.

Share

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *