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सच बात—देश की बात

हर क्षेत्रीय दल की जीत को मोदी के लिए चुनौती बताना गलत

modi-2 (1)कहा जा रहा है कि पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों ने जिस तरह अपना बोलबाला दिखाया है वह राष्ट्रीय दलों के लिए खतरे की घंटी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद ममता बनर्जी, एमके स्टालिन, पिनारायी विजयन और एन. रंगासामी पहले से और ज्यादा मजबूत क्षेत्रीय ताकत के रूप में उभरे हैं। इसलिए ममता बनर्जी के बारे में तो भविष्यवाणी की जाने लगी है कि वह 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को टक्कर देने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन बनाने का प्रयास कर सकती हैं। इसके पीछे यह भी तर्क दिया जा रहा है कि विधानसभा चुनावों के प्रचार के बीच ही तृणमूल कांग्रेस की ओर से कहा गया था कि ममता बनर्जी प्रधानमंत्री को टक्कर देने के लिए वाराणसी जा सकती हैं इसलिए मोदी अपने लिये कोई दूसरी सीट ढूँढ़ लें। अब तृणमूल ने उस समय भले जो कहा हो लेकिन सवाल उठता है कि क्या ममता बनर्जी वाकई केंद्र की राजनीति में लौटना चाहती हैं? यह भी सवाल उठता है कि क्या ममता बनर्जी नेता के रूप में संयुक्त विपक्ष को मान्य होंगी? सवाल यह भी उठता है कि क्या कांग्रेस ममता बनर्जी के नेतृत्व में चुनाव लड़ना चाहेगी ? यहां यह भी याद रखे जाने की जरूरत है कि ‘लोकतंत्र बचाओ’ अभियान के तहत ममता बनर्जी ने 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले भी राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी महागठबंधन बनाने का प्रयास करते हुए कोलकाता में बड़ी रैली का आयोजन किया था लेकिन वह प्रयास सफल नहीं हो सका था।

यहाँ हमको यह भी ध्यान रखे जाने की जरूरत है कि राज्यों के चुनाव में भाजपा को मात देने वाले क्षेत्रीय दल के नेता को एकाएक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुकाबले लाकर खड़ा कर दिया जाता है। अब चूँकि कांग्रेस राहुल गांधी के अलावा प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ खड़ा होने का मौका पार्टी के किसी और नेता को नहीं दे रही है और राहुल से इस कड़े मुकाबले का सामना किया नहीं जा रहा हो तो क्षेत्रीय दलों के नेताओं की महत्वाकांक्षा जागेंगी ही। अगर हम क्षेत्रीय दलों के बड़े नेताओं की बात करें तो उसमें एचडी देवेगौड़ा, शरद पवार, ममता बनर्जी, पिनारायी विजयन, नवीन पटनायक, एमके स्टालिन, अरविंद केजरीवाल, वाईएस जगन मोहन रेड्डी, के. चंद्रशेखर राव, फारुख अब्दुल्ला, चंद्रबाबू नायडू, उद्धव ठाकरे और मायावती जैसे नाम शामिल हैं। लेकिन सवाल उठता है कि क्या केंद्रीय स्तर पर बनने वाले संभावित मोर्चे के नेता के रूप में इनमें से किसी भी नाम को समर्थन देने के लिए कांग्रेस राजी होगी ? कांग्रेस की तो छोड़िये इनमें से कुछ दल के नेता तो आपस में ही एक दूसरे की टाँग खींचने में लगे रहते हैं। दूसरा हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इनमें से अधिकांश दल या तो कांग्रेस से टूट कर बने हैं या समय-समय पर कांग्रेस की दया पर निर्भर रहे हैं।

जनता को भाती है स्पष्ट बहुमत की सरकार

इसके अलावा हमें कोई भी विश्लेषण करने से पहले देश की जनता के बदले मिजाज को समझना चाहिए। देश में जब वर्ष 2014 में स्पष्ट बहुमत की सरकार बनी थी तो ऐसा 30 वर्ष से ज्यादा समय के बाद हुआ था। देश ने गठबंधन सरकारों की मजबूरियों को बहुत सहा है और 2014 तथा 2019 की स्पष्ट बहुमत वाली सरकार की कोई भी कार्य करने की राजनीतिक ताकत का कमाल भी देखा है। इसलिए आज की पीढ़ी स्पष्ट बहुमत वाली सरकार ही चुन रही है। केंद्र ही क्यों पिछले दस साल में जहां-जहां चुनाव हुए हैं तो एकाध अपवाद को छोड़ दें तो जनता ने सभी जगह या तो किसी एक पार्टी या फिर किसी चुनाव पूर्व गठबंधन को बहुमत प्रदान किया है। त्रिशंकु विधानसभाएं ही जब लगभग पुराने समय की बात हो गयी है तो त्रिशंकु संसद की तो कल्पना ही छोड़ दीजिये। ऐसे में महागठबंधन बनाने को आतुर रहने वाले क्षेत्रीय नेताओं को समझना होगा कि केंद्र में भाजपा से मुकाबला कांग्रेस के नेतृत्व में ही किया जा सकता है ना कि किसी क्षेत्रीय दल के नेतृत्व में बनने वाले गठबंधन से। जिस तरह विधानसभा चुनावों के समय क्षेत्रीय दल के नेता राष्ट्रीय दलों के नेताओं को यह समझाते हैं कि विधानसभा चुनाव क्षेत्रीय मुद्दों के आधार पर लड़े जाने चाहिए उसी तरह उन्हें समझना होगा कि देश के आम चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं।

यह सही है कि बड़ी महत्वाकांक्षाएं रखनी ही चाहिए लेकिन अगर कोई नेता या पार्टी देश पर राज करना चाहती है तो उसका पूरा एजेंडा भी स्पष्ट होना चाहिए। जो लोग आज ममता बनर्जी या पिनारायी विजयन, अरविंद केजरीवाल या एमके स्टालिन को भविष्य के राष्ट्रीय नेता के रूप में देख रहे हैं उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या भाजपा और कांग्रेस के अलावा किसी दल की कोई स्पष्ट आर्थिक या विदेश नीति है ? और अगर है तो क्या वह उसके बारे में जानत हैं। इसी तरह यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि रक्षा, संचार अथवा अन्य बड़े महकमों को चलाने का या उनको नयी दिशा देने का क्षेत्रीय दलों के पास क्या रोडमैप है ? बहरहाल, विधानसभा चुनाव 2021 के परिणाम भाजपा के लिए झटका कहे जा रहे हैं क्योंकि पार्टी ने जिस तरह की ऊर्जा इन चुनावों में लगायी थी उसके अनुरूप तो यह परिणाम नहीं ही हैं। अब पार्टी को अगली चुनौती अगले साल होने वाले पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में मिलेगी जहां उसे उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में अपनी पार्टी की सरकार को बचाना है। यदि वह ऐसा करने में सफल रहती है तो कितने भी महागठबंधन बन जायें 2024 में उसकी राह रोकना आसान नहीं होगा। यदि उत्तर प्रदेश भाजपा के हाथ से फिसला तो यकीनन केंद्र के लिए मुश्किलें खड़ी हो जायेंगी क्योंकि यह तो सभी जानते हैं कि दिल्ली का गद्दी का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आते ही उत्तर प्रदेश में भी सियासी हलचल तेज हो गई है क्योंकि अब बारी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की है। जल्द ही सियासी ‘तोपों’ का मुंह यूपी की तरफ मुड़ सकता है। विपक्ष पश्चिमी बंगाल के नतीजों से उत्साहित है और यूपी के श्रेत्रीय क्षत्रपों को भी लगने लगा है कि ममता बनर्जी की तरह वह भी भाजपा के लिये ‘खतरे की घंटी’ बन सकते हैं। पश्चिम बंगाल के नतीजों का ही असर है कि कुछ सियासतरदार ममता बनर्जी को मोदी के खिलाफ विकल्प के रूप में देखने लगे हैं। यह वह लोग हैं जो ममता की जीत तो देख रहे हैं, लेकिन इन्हें पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी का उभार नहीं दिख रहा है जो पिछले विधानसभा चुनाव में तीन सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार वह 80 के करीब पहुंच गई। वैसे ममता के विरोध में कांग्रेस समेत ऐसे दल भी हैं जिन्हें ममता बनर्जी नहीं भाती हैं

पश्चिम बंगाल के नतीजों से सबसे अधिक खुश समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी वाले हैं। अखिलेश यादव ने तो ममता बनर्जी के समर्थन में वोट करने की अपील भी की थी। इसलिए उनकी खुशी छिपाए नहीं छुप रही है। अखिलेश यादव ने ट्वीट करके ममता बनर्जी की बधाई दी है। इसके साथ ही अखिलेश ने कहा कि एक महिला पर अपमानजनक कटाक्ष दीदी ओ दीदी का जवाब जनता ने दिया है। इसके अलावा उन्होंने दीदी जिओ दीदी हैशटैग किया। अखिलेश ने अपने ट्विटर से एक तस्वीर पोस्ट की। इस तस्वीर में वह ममता बनर्जी को फूलों का एक बुके दे रहे हैं और ममता बनर्जी बहुत ही प्यार से अपना एक हाथ अखिलेश के गालों पर लगा रही हैं।

अखिलेश यादव ने टीएमसी और ममता बनर्जी को बधाई देते हुए ट्वीट में लिखा, ‘पश्चिम बंगाल में भाजपा की नफरत की राजनीति को हराने वाली जागरूक जनता, जुझारू सुश्री ममता बनर्जी जी और टीएमसी के समर्पित नेताओं व कार्यकर्ताओं को हार्दिक बधाई!’ अखिलेश ने आगे लिखा, ’ये भाजपाइयों के एक महिला पर किए गए अपमानजनक कटाक्ष ’दीदी ओ दीदी’ का जनता द्वारा दिया गया मुंहतोड़ जवाब है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने अभी तक ममता की जीत पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, वैसे भी मायावती किसी मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने से पहले काफी सोचती विचारती हैं। कांग्रेस के लिए जरूर पांच राज्यों के नतीजे किसी बड़े झटके से कम नहीं रहे हैं। खासकर पश्चिम बंगाल में तो वह मुंह दिखाने लायक भी नहीं रही। वहीं असम में भी कांग्रेस को बैकफुट पर रहना पड़ गया। कांग्रेस को केरल से भी काफी उम्मीद थी, यहां राहुल गांधी ने धुंआधार प्रचार भी किया था, परंतु पूरे केरल की बात तो दूर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र वायनाड की दो विधानसभा सीटों पर भी पार्टी प्रत्याशी जीत नहीं सके। ऐसा क्यों हुआ, इसकी वजह राहुल गांधी पहले ही बात चुके हैं कि वहां के लोगों में उत्तर भारतीयों के मुकाबले राजनैतिक समझ और दूरदर्शिता अधिक होती है।

बहरहाल, उम्मीद यही की जा रही है कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के नतीजे भी अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव पर काफी असर डालेंगे, जो नतीजे आ रहे हैं उससे तो यही लगता है कि गाँव की सरकार बनाने में समाजवादी पार्टी के साथ-साथ भाजपा की भूमिका प्रमुख रहने वाली है। भाजपा ने पंचायत चुनाव में पहली बार अपने सिंबल पर प्रत्याशी उतारे थे, भाजपा अपने सिंबल पर पंचायत चुनाव में प्रत्याशियों को उतार कर गाँव के वोटरों के बीच अपनी पैठ की थाह लेना चाहती थी। क्योंकि भाजपा पर हमेश शहरी पार्टी होने का आरोप लगता रहता था, जिसे वह धोना चाहती थी।

गौरतलब है कि अगले वर्ष मार्च के मध्य तक नई विधानसभा का गठन होगा, इसके चलते चुनाव प्रक्रिया फरवरी में शुरू हो सकती है। अभी तक तो यही लगता है कि सपा-बसपा और कांग्रेस अलग-अलग यूपी विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे। क्योंकि 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-सपा और 2019 के लोकसभा चुनाव के समय सपा-बसपा का गठबंधन कोई करिश्मा नहीं कर पाया था। कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल के नतीजों से यूपी के क्षेत्रीय क्षत्रपों का खुश होना स्वाभाविक है। इन्हें यूपी में भी ऐसे ही बदलाव होने की उम्मीद दिखाई दे रही है, लेकिन इस हकीकत को अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि यूपी और बंगाल के सियासी हालात काफी अलग हैं।

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