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राइट टू प्राइवेसी बुनियादी हक; सुप्रीम कोर्ट

supreme-court--647_032916041853नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि किसी शख्स का प्राइवेसी का अधिकार स्वाभाविक और हमेशा साथ रहने वाला है। जस्टिस अभय मनोहर सप्रे ने कहा, “राइट टू प्राइवेसी व्यक्ति के जन्म साथ ही मिलता है और उसकी आखिरी सांस तक रहता है।” बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने गुरुवार को एक राय में यह फैसला सुनाया कि राइट टू प्राइवेसी बुनियादी हक है। कोर्ट ने कहा कि ये कॉन्स्टिट्यूशन के आर्टिकल 21 के तहत आता है। आर्टिकल 21 राइट टू लाइफ एंड पर्सनल लिबर्टी से जुड़ा है।

1) जज: जिन्होंने बताया कि राइट टू प्राइवेसी क्या है?
जस्टिस एएम सप्रे: ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती है कि कोई शख्स ऐसे किसी अधिकार के बगैर सार्थक जीवन का आनंद उठा सकता है। हालंकि, ये अधिकार पूर्ण अधिकार नहीं है और सरकार के पास सामाजिक, नैतिक और जनहित को देखते हुए इस पर तय और मुनासिब प्रतिबंध लगाने का अधिकार है। मेरी राय में किसी भी शख्स के लिए राइट टू प्राइवेसी एक स्वाभाविक अधिकार है, जो कि किसी भी शख्स को जन्म के साथ ही मिलता है। ये अधिकार उस शख्स की आखिरी सांस तक साथ रहता है। ये किसी शख्स से अलग नहीं किया जा सकता है। अलग शब्दों में कहें तो ये इंसान के साथ ही पैदा होता है और उसी के साथ खत्म होता है।
जस्टिस आरएफ नरीमन: संसद में सामान्य बहुमत के जरिए कानून बनाया या खत्म किया जा सकता है और सत्ताधारी पार्टी कानून द्वारा दी गई किसी भी सुरक्षा से छुटकारा पा सकती है। लेकिन, मौलिक अधिकार संविधान में समाए हुए हैं। ऐसे में ऐसे अधिकार हैं, जिनका इस्तेमाल इस देश की जनता कर सकती है, भले ही उन्होंने सरकार को चुना क्यों ना हो। राइट टू प्राइवेसी एक जरूरी बुनियादी अधिकार रहेगा, भले ही इससे सरकार की ताकत में बदलाव क्यों ना होता हो।
2) हलचल : जो फैसला आने के बाद शुरू हुई
– सुप्रीम कोर्टा का फैसला आने के बाद टॉप मिनिस्टर्स में हलचल मच गई। खासतौर से विश्व के सबसे बड़े बायोमेट्रिक आईडी कार्ड प्रोग्राम आधार के इस्तेमाल को लेकर। कानून और IT मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद और पीएम के प्रिंसिपल सेक्रेटरी नृपेंद्र मिश्रा फाइनेंस मिनस्टर अरुण जेटली के पास इस मामले पर चर्चा करने के लिए गए।
– फैसले के तुरंत बाद UIDAI के सीईओ अजय भूषण पांडेय ने रविशंकार प्रसाद को कॉल किया, जिसके बाद प्रसाद जेटली से मिलने के लिए पुहंचे। हालांकि, पांडेय ने इस फैसले पर कमेंट करने से इनकार कर दिया।
– हालांकि, एक अधिकारी ने नाम ना बताने की शर्त पर कहा कि कोर्ट का फैसला सरकार के नजरिए से मेल खाता है।
3) रुख : जो सरकार ने जाहिर किया
अमित शाह:
 राइट टू प्राइवेसी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत है। ये मौलिक अधिकारों और निजी स्वतंत्रता को मजबूत करेगा। प्राइवेसी के ढांचे पर आज जो बातें बना रहे हैं, वही लोग इस बात के लिए जिम्मेदार हैं कि दशकों तक भारत के पास मजबूत प्राइवेसी कानून नहीं रहा। कांग्रेस झूठमूठ का जश्म मना रही है।
रविशंकर प्रसाद: सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत है। लेकिन, कोर्ट ने इस बात की पुष्टि की है कि राइट टू प्राइवेसी पूर्ण अधिकार नहीं है और ये वाजिब प्रतिबंध लगाए जाने का मुद्दा है। कोर्ट ने उसी बात की पुष्टि की है जो सरकार ने पार्लियामेंट में आधार बिल पेश करते वक्त कही थी। सरकार ने कहा था कि प्राइवेसी फंडामेंटल राइट हो सकती है, लेकिन इस पर वाजिब प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।
4) आरोप : जो विपक्ष ने लगाए
सोनिया गांधी:
 राइट टू प्राइवेसी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला व्यक्तिगत अधिकारों, मर्यादा के लिए नए युग की शुरुआत है और ये आम आदमी की जिंदगी में सरकार की ओर निरंकुश अतिक्रमण और जासूसी पर कड़ा प्रहार है। कांग्रेस और उसकी सरकारें उन अपोजिशन पार्टियों के साथ कोर्ट में खड़ी रही, जिन्होंने सही बात के लिए और निरंकुश कोशिशों के खिलाफ आवाज उठाई।
कपिल सिब्बल: नरेंद्र मोदी सरकार को राइट टू प्राइवेसी को फंडामेंटल राइट ना घोषित करने की गलत सलाह दी गई। ये विफलता व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मसले पर सरकार की संकीर्ण मानसिकता को दिखाती है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐतिहासिक, प्रगतिशील और फायदेमंद है।
राहुल गांधी: सुप्रीम कोर्ट का फैसला फासीवादी ताकतों के खिलाफ बड़ी चोट है। ये बीजेपी की “जासूसी के जरिए दमन’ की नीति को नकारता है। राइट टू प्राइवेसी को एक शख्स की आजादी और मर्यादा का अभिन्न हिस्सा बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत है।
5) राय: जो लीगल एक्सपर्ट्स दे रहे हैं
सोली सोराबजी (सीनियर एडवोकेट):
 ये सुप्रीम कोर्ट का एक अच्छा नजरिया है कि वो पहले के फैसलों को पलटने में हिचकिचाई नहीं। ये बेहद प्रोग्रेसिव जजमेंट है और लोगों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करेगा। प्राइवेसी बुनियादी अधिकार है, जो कि हर शख्स को मिला है।
इंदिरा जयसिंह (सीनियर एडवोकेट): उम्मीद है कि भारत के लोग अब किसी भी तरह की ताकझांक से सुरक्षित रहेंगे। ये जश्न मनाने का दिन है। प्राइवेसी एक बुनियादी अधिकार है और रोजमर्रा की जिंदगी पर इसका सीधा असर पड़ता है। आधार को लेकर कोई भी निर्णयात्मक स्टेटमेंट नहीं दिया जा सकता है। कोई भी मौलिक अधिकार पूर्ण नहीं है, ये हमेशा ही जरूरी प्रतिबंधों का मुद्दा रहते हैं।
सुप्रीम कोर्ट को क्या तय करना था?
– 9 जजों की कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच को ये फैसला करना था कि राइट टू प्राइवेसी को मौलिक अधिकारों के तहत रखा जा सकता है या नहीं।
बेंच ने क्या फैसला सुनाया?
– सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राइट टू प्राइवेसी बुनियादी हक है। यह फैसला सुनाने वाली 9 जजों की कॉन्स्टिट्यूशन बेंच की अध्यक्षता चीफ जस्टिस जेएस खेहर कर रहे थे। बेंच में जस्टिस जे चेलेमेश्वर, जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस आरके आग्रवाल, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस अभय मनोहर सप्रे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजय कृष्ण कौल और जस्टिस एस अब्दुल नजीर शामिल थे।
– इनमें चीफ जस्टिस, जस्टिस नरीमन और जस्टिस नजीर हाल ही में तीन तलाक पर फैसला सुनाने वाली बेंच में भी शामिल थे।
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