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रोहिंग्या को वापस भेजने के लिए थाईलैंड का आइडिया….

रोहिंग्या शरणार्थियों को देश की आतंरिक सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए भारत सरकार ने अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्याओं को वापस म्यांमार भेजने की बात जरूर कही है, लेकिन सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आखिर इन लोगों को वापस भेजा भी जाए तो आखिर कैसे?फिलहाल सरकार इस समस्या से निपटने के लिए रास्ता खोज रही है. सरकार की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 40 हजार रोहिंग्या अवैध रूप से रह रहे हैं. ये रोहिंग्या जम्मू, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान समेत दिल्ली और एनसीआर में रह रहे हैं. इन लोगों पर आतंकवादियों से कनेक्शन का आरोप लगता रहा है. इसी वजह से अन्य देश भी इन्हें शरण देने को राजी नहीं दिख रहे.म्यांमार में हिंसा फैलने के बाद रोहिंग्या भारत, थाईलैंड, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल समेत कई देशों में अवैध रूप से बस तो गए, लेकिन थाईलैंड को छोड़ कोई भी देश इन्हें अब तक वापस नहीं भेज सका है. दरअसल, थाईलैंड ने रोहिंग्याओं को वापस भेजने के लिए एक अलग रास्ता निकाला.

क्या किया था थाईलैंड ने…

2014 में थाईलैंड ने रोहिंग्याओं को वापस भेजने का फरमान जारी किया था. जिसके बाद से अब तक 1300 रोहिंग्याओं को वापस भेजा जा चुका है. थाई ऑथोरिटीज ने रोहिंग्याओं को स्वेच्छा से वापस भेजने का निर्णय किया था. सरल भाषा में कहें तो थाईलैंड ने रोहिंग्याओं को यह छूट दी थी कि वो वापस कैसे जाएं यह उनकी मर्जी पर निर्भर करता है.उस वक्त थाईलैंड में रोहिंग्याओं को निर्वासित करने की जिम्मेदारी संभाल रहे लेफ्टिनेंट जनरल फार्नु कर्दलारफोन ने एपी को बताया कि, “हमने रोहिंग्याओं को उनकी इच्छा के अनुसार 100 से 200 के ग्रुप में भेजा. उनका मानना था कि रोहिंग्या थाईलैंड में अपना भविष्य नहीं देखते हैं. इसीलिए हमने उन्हें वापस भेज दिया.” हालांकि, इस तरह रोहिंग्याओं को वापस भेजने पर मानव अधिकार संगठनों ने थाईलैंड की कड़ी आलोचना की थी.

क्यों अपने ही देश से भाग रहे हैं रोहिंग्या…

मालूम हो कि म्यांमार में रोहिंग्या की आबादी 10 लाख के करीब है. रोहिंग्या समुदाय 15वीं सदी के शुरुआती दशक में म्यांमार के रखाइन इलाके में आकर बस तो गया, लेकिन स्थानीय बौद्ध बहुसंख्यक समुदाय ने उन्हें आज तक नहीं अपनाया है. यही वजह रही है कि म्यांमार में सैन्य शासन आने के बाद रोहिंग्या समुदाय के सामाजिक बहिष्कार को बाकायदा राजनीतिक फैसले का रूप दे दिया गया और उनसे नागरिकता छीन ली गई.

2012 में रखाइन में कुछ सुरक्षाकर्मियों की हत्या के बाद रोहिंग्या और बौद्धों के बीच व्यापक दंगे भड़क गए. तब से म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ हिंसा जारी है. यही वजह है कि रोहिंग्या दूसरे देशों में शरण ले रहे हैं. अब आगे देखना होगा कि भारत रोहिंग्याओं को वापस भेजने के लिए थाईलैंड का रास्ता अपनाता है या नहीं.

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