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बाबरी मस्जिद पर शियाओं का दावा..

ayodhya baberसुप्रीम कोर्ट में अब तक राम जन्मभूमि ढहाने के मामले में सुनवाई हुई थी, अब बनाने के मामले में होगी. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर दिन प्रतिदिन सुनवाई करने की अपील पर सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार से सुनवाई करने जा रहा है. इस मामले में नया मोड़ शिया वक्फ बोर्ड की याचिका से भी आया है. शिया मुसलमानों के पास इसके लिए अपने तर्क और दावे हैं.पहले इस मामले में तीन मुख्य पक्षकार रामजन्मभूमि न्यास, सेंट्रल वक्फ बोर्ड और मोहम्मद हाशिम हैं. इस बार जल्दी सुनवाई के लिए बीजेपी सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने याचिका लगाई है.शिया वक्फ बोर्ड ने पहले तो कोर्ट में हलफनामा देकर विवादित स्थल पर अपना दावा जताते हुए कहा कि उनकी मंशा है कि पूरी जगह पर राम मंदिर बने और जो विवादित जमीन का जो एक तिहाई हिस्सा वक्फ को दिया जाना है वो थोड़ी दूर मुस्लिम बहुल इलाके में दे दिया जाए ताकि टंटा हमेशा के लिए खत्म हो जाए.

इस हलफनामे के तीन दिन बाद शिया वक्फ बोर्ड ने नई याचिका भी इसी मंशा के साथ दाखिल कर दी. उसमें ये कहा गया है कि इतिहास में ये बात दर्ज है कि बाबर अयोध्या और इस इलाके में 5-6 दिन ही रहा था. कहा जाता है कि उसने यहां मस्‍जिद बनाने को कहा था. उसके बाद उसके सिपहसालार मीर बाकी ने यहां मस्‍जिद बनाई. हो सकता है कि इसके लिए उसने मंदिर तोड़े हों.

ये है पूरा मामला

बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी की दलील है कि मीर बाकी शिया थे. मस्‍जिद बनाकर उन्होंने इसे अल्लाह के सुपुर्द कर दिया. इस मस्‍जिद के पहले मुतवल्ली यानी संरक्षक वही थे. इसके बाद शिया ही सदियों तक इस मस्‍जिद के मुतवल्ली रहे. 1946 में जब स्थानीय अदालत ने शिया समुदाय का हक खारिज किया उस वक्त देश में अफरातफरी मची थी. बस तब से अब तक इस आदेश को चुनौती देने का समय ही नहीं आया. अब विवाद सुलझने के आसार हैं तो शिया वक्फ बोर्ड ने भी अपना दावा फिर जताया है और 1946 के फैसले में मौजूद खामियां और विवादित मसलों की नुक्ताचीनी अब हो जाए तो बेहतर है. ये अलग बात है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने शिया बोर्ड की  दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया है. उनका कहना है कि असली पक्षकार तो वही हैं. 70 साल बाद अब शियाओं का ये दावा गैर कानूनी है.

उधर शिया वक्फ बोर्ड की नुमाइंदगी सुप्रीम कोर्ट में करने वाले वकील एमसी धींगड़ा का कहना है कि बाबर के आदेश पर मीर बाकी के मसजिद बनाने को लेकर हमने इतिहास के पन्नों के आधार पर एक दलील दी है. ये महज एक सबमिशन है. लेकिन कानून के पंडितों की राय है कि ये सबमिशन भी एक तरह की स्वीकारोक्ति यानी एडमिशन जैसा ही है.. कि बाबर के सिपहसालार ने मंदिर तोड़ कर मस्‍जिद का निर्माण किया. यानी वहां पहले कोई मंदिर था. इस दलील की पुष्टि एएसआई की खुदाई की रिपोर्ट भी करती है.  शिया वक्फ बोर्ड के हलफनामे और अब याचिका ने इसकी पेचीदगी बढ़ा तो दी है लेकिन अब कोर्ट में इस मामले की दिन प्रतिदिन आधार पर सुनवाई होने से ये बड़ा मामला भी जल्द निपटने के आसार भी बढ़ गये हैं.

 

 

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