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भाजपा से गठबंधन तोड़ेगी शिवसेना ?

shiv senaमुंबई। महाराष्ट्र में राजनीतिक दम खम रखने वाली पार्टी शिवसेना अपनी सहयोगी पार्टी भाजपा से नाराज चल रही है। शिवसेना ने सोमवार को बीजेपी को फाइनल अल्टीमेटम दे दिया। शिवसेना सांसद संजय राउत ने बताया कि बीजेपी को अपने काम के तरीकों में बदलाव लाने और महंगाई पर रोक लगाने को लेकर एक आखिरी अल्टीमेटम दिया गया है। पार्टी एनडीए के साथ रहेगी या नहीं, इस पर आखिरी फैसला शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ही लेंगे। मातोश्री में शिवसेना विधायकों और नेताओं की रिव्यू मीटिंग हुई। 2019 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए ये मीटिंग बुलाई गई थी।

सूत्रों का कहना है कि मीटिंग जैसी ही शुरू हुई, पार्टी विधायकों ने सहयोगी दल बीजेपी पर जानबूझकर उनके क्षेत्र की अनदेखी का आरोप लगाया। विधायकों ने कहा कि बीजेपी उनके इलाके के विकास में रोड़े अटका रही है। उधर, शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा कि देश में बढ़ रही पेट्रोल की कीमत के खिलाफ शिवसेना जल्द ही राज्य में एक बड़ा आंदोलन करेगी। शिवसेना के सभी विधायकों ने एक सुर में बीजेपी से अलग होने की बात कही, जिसके बाद पार्टी ने महाराष्ट्र सरकार को अपने तौर-तरीकों में बदलाव लाने का अल्टीमेटम दिया और ऐसा न होने पर एनडीए से अलग होने की बात कही।

संजय राउत ने कहा, मीटिंग में सभी विधायकों और सांसदों के साथ चर्चा हुई। महंगाई बढ़ रही है और लोगों में हताशा भी बढ़ रही है। लोगों में महंगाई को लेकर चिढ़ है। मीटिंग में उद्धव ठाकरे ने सांसदों और विधायकों के साथ इस बारे में चर्चा की कि बीजेपी के साथ गठबंधन में रहना है या नहीं।ऐसा है सरकार का गणितमहाराष्ट्र में हुए महानगरपालिका चुनाव में शिवसेना ने बीजेपी से अलग होकर चुनाव लड़ा था। बीएमसी की 227 सीटों में से शिवसेना को 84 और बीजेपी को 82 सीटों पर जीत हासिल हुई थी।

विधानसभा में दोनों की है गठबंधन सरकार पार्टी सीटें कुल 288] भाजपा 122 शिवसेना 63कांग्रेस 42एनसीपी 41अन्य 20 लोकसभा: 48 में से 18 पर शिवसेनामहाराष्ट्र में लोकसभा की कुल 48 सीटें हैं, इनमें से 23 सीटों पर बीजेपी और 18 सीटों पर शिवसेना का कब्जा है। कांग्रेस के पास सिर्फ 4 और एनसीपी के पास दो सीटें हैं। महाराष्ट्र का सबसे बड़ा किसान संगठन स्वाभिमानी शेतकरी संगठन पहले ही एनडीए से अलग हो चुका है। संगठन के चीफ सांसद राजू शेट्टी ने 30 अगस्त को कहा था कि स्टेट एग्जीक्यूटिव की मीटिंग में यह फैसला लिया गया। मई 2014 में एनडीए के सरकार बनाने के बाद यह पहला मामला था, जब कोई पार्टी गठबंधन से अलग हुई। यह संगठन गोपीनाथ मुंडे की मध्यस्थता के बाद साढ़े तीन साल पहले एनडीए में शामिल हुआ था।

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