Pages Navigation Menu

Breaking News

यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों को निकालने के लिए ऑपरेशन गंगा

कोविड-19 वैक्सीन की एक खुराक मौत को रोकने में 96.6 फीसदी तक कारगर

हरियाणा: 10 साल पुराने डीजल, पेट्रोल वाहनों पर प्रतिबंध नहीं

सच बात—देश की बात

मोदी – योगी फैक्टर, चुनाव नतीजों के सियासी मायने

narendramodi-2पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम 2024 आम चुनाव से पहले सत्ता का सेमीफाइनल माना जा रहा था। इसका असर बहुत ही व्यापक होगा जिससे राष्ट्रीय राजनीति का चेहरा भी बदल जाएगा। पांच राज्यों हुए विधानसभा चुनावों के आये नतीजों के सियासी मायने स्पष्ट हैं। इस चुनाव में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ अपने पांच सालों के गर्वनेंस के आधार पर चुनावी मैदान में थे, उन्हें सफलता मिली। अरविंद केजरीवल पंजाब में दिल्ली मॉडल के साथ मैदान में चुनौती देने उतरे, उन्हें भी सफलता मिली। अब इसके बाद दोनों के गवर्नेंस मॉडल के बीच गहन चर्चा शुरू होगी। इसका असर राष्ट्रीय राजनीति में दिख सकता है। अरविंद केजरीवाल अपने मॉडल और राजनीति से राष्ट्रीय स्तर पर उभरने की कोशिश में हैं तो बीजेपी के लिए उत्तर  प्रदेश सबसे अहम राज्य है और योगी आदित्यनाथ अगली पीढ़ी के सबसे अहम नेता।पांच राज्यों के चुनाव के जनादेश से ब्रैंड मोदी एक बार फिर मजबूत होगा। कोरोना महामारी और modi_yogieबढ़ती महंगाई के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी इस चुनाव में बड़ी चुनौती थी। उस पर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पूरी ताकत झोंकने के बाद कुछ सवाल जरूर उठे थे, लेकिन इस चुनाव के परिणाम ने 2024 की लड़ाई से पहले मोदी फैक्टर को फिर बड़े पैमाने पर स्थापित किया। इसकी बदलौत बीजेपी अगले कुछ सालों तक और चुनावी नैया को पार कराने की उम्मीद कर सकेगी।बदले हालात के बावजूद मायावती अपनी पुरानी परंपरागत राजनीति के बदौलत इस बार भी मैदान में थीं। सिर्फ मुस्लिम और दलित वोट की बदौलत सत्ता पाने उतरीं मायावती बाकी वोट तो दूर दोनों से अपने बेस वोट को गंवाने लगीं। 2012, 2014, 2017 के बाद 2022 विधानसभा चुनाव में मिली अब तक की सबसे बड़ी हार के बाद अब मायावती के लिए यहां से अपनी पार्टी को बचाना सबसे बड़ी चुनौती है। एक समय मायावती सिर्फ उत्तर प्रदेश की ही नहीं बल्कि पूरे देश में दलित नेतृत्व का सबसे मजबूत चेहरा थीं। लेकिन अब इस चेहरे के चूक जाने से दलित नेतृत्व की एक ऐसी जगह खाली हो रही है जिसे भरने की कवायद सभी राजनीतिक दलों में दिख सकती है।उत्तर प्रदेश में बीजेपी को मिली बड़ी जीत का असर पड़ोस के राज्य बिहार पर भी देखा जा सकता है। वहां 2020 के आखिर में नीतीश कुमार की अगुवाई वाली एनडीए सरकार सत्ता में आने के बाद बीजेपी-जेडीयू के रिश्ते उठा-पटक भरे रहे हैं। बीच में ऐसी भी खबरें आईं कि नीतीश कुमार विपक्ष के राष्ट्रपति के उम्मीदवार हो सकते हैं। हालांकि, नीतीश ने इसका खंडन किया था। लेकिन अब बीजेपी बिहार में नीतीश पर दबाव बना सकती है।

up spराष्ट्रीय राजनीति में इस जनादेश से विपक्ष के मॉडल को बहुत ज्यादा हताशा मिली है। इससे विपक्षी पार्टियों को उबरने में वक्त लग सकता है। विपक्षी एकता में आया खालीपन, खासकर राष्ट्रीय स्तर पर और बढ़ सकता है। विपक्ष को अब ऐसे मुद्दों या सरकार की गलती का इंतजार करना होगा जहां से वह खुद को सियासी जमीन पर खड़ा कर सके। इसका असर फौरी तौर पर सोमवार से शुरू हो रहे संसद के बजट सत्र में देखा जा सकता है।कुछेक अर्थों में ये भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी और आम आदमी पार्टी यानी आप के लिए बेहद खास हैं। क्योंकि बीजेपी जहाँ चार राज्यों में अपनी सरकार बचाने में सफल रही है। वहीं दिल्ली प्रदेश में सत्तारूढ़ आप ने दिल्ली के बाद पंजाब जैसे बड़े राज्य को भी कांग्रेस से छीनकर अपने पास कर लिया है, वो भी दो तिहाई स्पष्ट बहुमत से। उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में बीजेपी को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो गया है। मणिपुर में बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल यू ने भी अच्छा प्रदर्शन किया है।वहीं, इन चुनावों ने यूपी की प्रमुख विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी यानी सपा और यूपी में कभी सत्तारूढ़ रही बहुजन समाज पार्टी यानी बीएसपी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस समेत विभिन्न छोटे-मोटे दलों को भी कुछ सीख देने की कोशिश की है, यदि इन पार्टियों का नेतृत्व इसे समझने की कोशिश करें तो। दो टूक कहा जाए तो इन पार्टियों को अपनी घिसी पिटी सियासी रणनीति में आमूलचूल बदलाव लाना होगा, अन्यथा बीजेपी से बची राजनैतिक जगह को आप भर देगी और गैर भाजपा विपक्ष दिल्ली-पंजाब की तरह हाथ मलता रह जायेगा।

देखा जाए तो आम चुनाव 2024 के पहले यूपी समेत पांच विधानसभा चुनाव 2022 को सेमीफाइनल करार देने वाले लोगों के लिए भी इसमें बहुत बड़ा सन्देश छिपा हुआ है। वाकई उत्तरप्रदेश और पंजाब जैसे दो बड़े राज्यों और उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर जैसे 3 छोटे राज्यों से आये चुनाव परिणामों ने एक बार फिर से यह बात स्थापित करने की कोशिश की है कि भारतीय राजनीति की परंपरागत चुनावी धारा बदल रही है और उसकी जगह एक नई आधुनिक धारा ले रही है, जो जातिवाद, क्षेत्रवाद, सम्प्रदायवाद, परिवारवाद, पूंजीवाद, बाहुबल, तुष्टिकरण जैसे पुराने राजनैतिक दांवपेंच से इतर सुशासन, विकासवाद, हिंदुत्व और संतुलित समीकरण को साधकर मूल्यों व वसूलों की राजनीति को बढ़ावा देने तथा सबको समान अवसर, सत्तागत सहूलियत व जनसुविधाएं देने की कोशिशों पर आधारित है। आप इसे हिंदुत्व की परिधि में सर्व समावेशी राजनीति को तरजीह भी समझ सकते हैं।

यही वजह है कि कुछेक अपवादों को छोड़कर बीजेपी लगातार आगे बढ़ रही है और सात-आठ साल पहले गठित आम आदमी पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसी सवा सौ साल पुरानी पार्टी की जगह धीरे धीरे ले रही है। क्योंकि समाजवादी सियासत करने वाले क्षेत्रीय दल भी कांग्रेसी सियासी लकीरों की नकल करने के कारण भारतीय राजनीति में लगातार अपनी प्रासंगिकता खोते चले जा रहे हैं। वैसे तो भाजपा विरोधी दलों ने कोरोना महामारी के बाद भूख, गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी, पेट्रोल-गैस की बढ़ती कीमतों, महंगी शिक्षा, बढ़ते अस्पताल बिल, पानी, भ्रष्टाचार, किसानी-मजदूरी, पुरानी पेंशन प्रणाली और मुफ्तखोरी की बौछार करके मुद्दों को गरमाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। परन्तु ताजा चुनाव परिणाम ने साबित कर दिया कि 5 राज्यों में जातिवादी, परिवारवादी, भ्रष्टाचारी तथा छद्म सेक्युलरवादी दलों को मतदाताओं ने खारिज कर दिया है और हिंदूवादी ताकतों के हाथों में सत्ता सौंप दी है, अपवाद स्वरूप पंजाब को छोड़कर, जहाँ आप की राजनीति कई मामलों में बीजेपी की नकल ही करार दी जाती है।

Punjab-Politics-newsवहीं, पंजाब में कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू, उप्र में सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य तथा उत्तराखंड में कांग्रेस नेता हरीश रावत की पराजय बहुत कुछ चुगली कर रही है कि आखिर इन तपे तपाये नेताओं की शिकस्त के मायने क्या हैं? शायद यह कि हिंदुस्तान को उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा जैसे स्पष्ट और पारदर्शी सनातनी नेता की जरुरत है, जो केंद्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नक्शेकदम पर चलकर देश को एक नई राजनैतिक दिशा देने को ततपर हैं। जिस तरह से दिल्ली, महाराष्ट्र, केरल, पश्चिम बंगाल के बाद अब पंजाब में बीजेपी को उम्मीदों के अनुरूप सफलता नहीं मिली है, उसके परिप्रेक्ष्य में यूपी, उत्तराखंड, मणिपुर व गोवा की ताजा राजनीतिक सफलता उसका उत्साह बढ़ाने को काफी है।सच कहा जाए तो उत्तर प्रदेश में 1985 की कांग्रेस सरकार के बाद बीजेपी की योगी सरकार ही ऐसी सरकार है जो फिर से सत्ता में अपनी वापसी कर रही है। लगभग 37 साल बाद बन रहे इस रिकॉर्ड के पीछे कई प्रमुख कारण हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो सीएम योगी आदित्यनाथ सत्ता में फिर से अपनी वापसी के लिए आत्मविश्वास से लबरेज रहे। क्योंकि उन्होंने सुशासन और विकास के अलावा जनता की हर छोटी बड़ी तकलीफ को समझकर उसे ईमानदारी पूर्वक दूर करने की कोशिश की और अपने अधिकारियों के ऊपर भी सतत निगरानी रखे।उन्होंने केंद्र सरकार की योजनाओं, यथा- प्रधानमंत्री आवास, राशन, आयुष्मान भारत, किसान सम्मान निधि, पीएम स्वनिधि योजना, उज्जवला योजना, बिजली कनेक्शन, मुद्रा लोन समेत व्यापारियों, महिलाओं और समाज के अन्य वर्गों के लिए लागू की गई योजनाओं को ईमानदारी पूर्वक लागू करवाया। वहीं, कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से निपटने के लिए सरकार की ओर से सबको कोरोना की मुफ्त वैक्सीन व समुचित इलाज के प्रयत्न भी प्रमुख कारण है, जिसे लोगों ने महसूस किया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा कानून व्यवस्था का सफल क्रियान्वयन और बाहुबलियों-भ्रष्टाचारियों के खिलाफ बुल्डोजर चलवाने का मुद्दा भी प्रमुख रहा है, क्योंकि जनता ऐसी ही सख्ती चाहती है। वहीं, भाजपा ने अपनी युगान्तकारी नीतियों से सभी सामाजिक वर्गों के बीच संपर्क का सघन अभियान चलाया। उसने महिलाओं, युवाओं के साथ ही सभी सामाजिक वर्गों व जातियों के बीच अपनी पैठ और गहरी की, जिसका सकारात्मक नतीजा यह हुआ कि भाजपा को सभी वर्गों का वोट मिला। अंत अंत तक सब लोग बीजेपी के पक्ष में जुटे रहे, पन्ना प्रमुखों ने घर-घर बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाया। जिलों में विधानसभा स्तर तक बनी चुनाव संचालन समितियों के माध्यम से भाजपा ने हर बूथ स्तर तक की निगरानी सुनिश्चित की। जबकि मीडिया का एक वर्ग और विपक्ष सत्ता विरोधी कयासों को तूल देते हुए आत्ममुग्ध रहा।

यूपी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पिछले छह महीने से भाजपा की पूरी मशीनरी चुनावों में जुटी रही। पीएम नरेंद्र मोदी समेत अमित शाह, जेपी नड्डा, राजनाथ सिंह  समेत पार्टी के सभी प्रमुख नेताओं को मैदान में उतारा गया। भाजपा की जन विश्वास यात्रा ने पूरे प्रदेश में भाजपा के पक्ष में माहौल बनाया। पीएम मोदी और योगी सरकार ने राजनीति में परिवारवाद और गुंडागर्दी को मुख्य मुद्दा बनाया गया। सपा ने ऐसे में जिन दागी चेहरों को टिकट दिए, उन्होंने भी कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर बीजेपी का साथ दिया। यूपी में एआईएमआईएम, जदयू, पीस पार्टी, वीआईपी व अन्य पार्टियों को भी निराशा हाथ लगी है, जबकि सपा की सहयोगी रालोद ने अपने प्रदर्शन में सपा की तरह ही अपेक्षित सुधार किया है, जिससे उसकी राजनीतिक पूछ निकट भविष्य में बढ़ेगी।

इसी प्रकार उत्तराखंड में तीन-तीन मुख्यमंत्री बदलने के बावजूद भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलना यह जाहिर करता है कि पार्टी रणनीतिकारों के राजनीतिक प्रयोग सफल रहे हैं। यह जीत इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि राजनेता व मीडिया यहां पर कांग्रेस की सत्ता में वापसी के संकेत दे रहे थे। लेकिन मतदाताओं के सकारात्मक मिजाज ने इन अटकलों की हवा निकाल दी। यहां बीएसपी को 2 सीट मिलना महत्वपूर्ण है, जो कभी यूपी में बीजेपी की सहयोगी पार्टी रही है।वहीं, गोवा में भी पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर को खोने के बाद और उनके पुत्र के पार्टी छोड़ने के बाद भी बीजेपी को वहां बहुमत मिलना यह साबित करता है कि बीजेपी का सियासी अंदाज लोगों को पसंद है। यह बात इसलिए कि यहां भी मीडिया कांग्रेस या आप के मजबूत होने और सत्ता में आने के संकेत दे रही थी, जो पूरी तरह से सच नहीं निकली। यहां कांग्रेस, एमजीपी के अलावा अन्य को भी सीटें मिली हैं, जिनमें से कुछ बीजेपी के स्वाभाविक मददगार साबित होंगे।

मणिपुर में भी बीजेपी को बहुमत मिला है, जबकि कांग्रेस, एनपीएफ, एनपीपी और अन्य की मजबूत स्थिति यह दर्शाती है कि यहां भी भाजपा का भविष्य उज्ज्वल है और कई दल रणनीतिक रूप से उसके लिए मददगार साबित होंगे। यहां पर एनडीए की सहयोगी जदयू ने भी अच्छा प्रदर्शन करके भाजपा को चौंका दिया है।जहाँ तक पंजाब की बात है तो वहां कांग्रेस का अंतर्कलह उसे ले डूबा और बीजेपी की पुरानी सहयोगी पार्टी अकाली दल बादल द्वारा बीजेपी का साथ छोड़ना उसकी सत्ता में फिर से वापसी पर विराम लगा दिया। इसकी भरपाई के लिए बीजेपी ने कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की नई पार्टी से अंतिम समय में समझौता तो कर लिया, लेकिन उससे चुनावी सफलता में तब्दील नहीं किया जा सका। इन्हीं बातों का फायदा वहां पर सियासी फील्डिंग कर रही आप को मिला और जनता ने उसकी रणनीति पर भरोसा जताकर दो तिहाई बहुमत दे दिया। हालांकि, इस बात की अटकलें लगाई जा रही हैं कि आप के पीछे खालिस्तानी ताकतें खड़ी हैं! जो कि कांग्रेस और बीजेपी की सियासी मुश्किलें भविष्य में बढ़ाएंगी ही।

 

Share

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »