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देश में समान नागरिक संहिता हो; दिल्ली हाईकोर्ट

सच बात—देश की बात

देश में समान नागरिक संहिता हो; दिल्ली हाईकोर्ट

highcourt_dदिल्ली हाईकोर्ट ने देश में समान नागरिक संहिता को लेकर अहम बात कही है। मीणा जनजाति की एक महिला और उसके हिंदू पति के बीच तलाक के मुकदमे की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने कहा कि देश में समान नागरिक संहिता की जरूरत है और इसे लाने का यही सही समय है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मामले में जरूरी कदम उठाने को कहा है।इस केस में पति हिन्दू मैरिज एक्ट के हिसाब से तलाक चाहता था, जबकि पत्नी का कहना था कि वह मीणा जनजाति की है, ऐसे में उस पर हिन्दू मैरिज एक्ट लागू नहीं होता। पत्नी ने मांग की थी कि उसके पति की तरफ से फैमिली कोर्ट में दायर तलाक की अर्जी खारिज की जाए। उसके पति ने हाईकोर्ट में पत्नी की इसी दलील के खिलाफ याचिका लगाई थी।

धर्म, जाति के अंतर खत्म हो रहे: कोर्ट
कोर्ट ने कहा कि भारतीय समाज में जाति, धर्म और समुदाय से जुड़े फर्क खत्म हो रहे हैं। इस बदलाव की वजह से दूसरे धर्म और दूसरी जातियों में शादी करने और फिर तलाक होने में दिक्कतें आ रही हैं। आज की युवा पीढ़ी को इन दिक्कतों से बचाने की जरूरत है। इस समय देश में समान नागरिक संहिता होनी चाहिए। आर्टिकल 44 में यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर जो बात कही गई है, उसे हकीकत में बदलना होगा।

क्या है यूनिफॉर्म सिविल कोड?
संविधान के भाग 4 में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का ब्योरा है। संविधान के आर्टिकल 36 से 51 के जरिए राज्य को कई मुद्दों पर सुझाव दिए गए हैं। इनमें उम्मीद जताई गई है कि राज्य अपनी नीतियां तय करते समय इन नीति निर्देशक तत्वों का ध्यान रखेंगे। इन्हीं में से आर्टिकल 44 राज्य को सही समय पर सभी धर्मों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने का निर्देश देता है। आसान शब्दों में समझें, तो यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी देश के सभी नागरिकों के लिए एक जैसा पर्सनल लॉ और लागू करना राज्य की ड्यूटी है।

देश में अभी क्या स्थिति है?
देश में अभी हिंदू और मुसलमानों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ हैं। इसमें प्रॉपर्टी, शादी, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामले आते हैं। यूनिफॉर्म सिविल कोड पर पॉलिटिकल बहस होती रही है। अक्सर सेक्युलरिज्म से जुड़ी बहस में भी इसे शामिल किया जाता रहा है। जो लोग इसके समर्थन या विरोध में हैं, उनकी इसके सोशल और रिलीजियस असर को लेकर अलग-अलग सोच है। भाजपा हमेशा से इसके फेवर में रही है, जबकि कांग्रेस विरोध करती रही है।

पहली बार कब सुर्खियों में आया?
1985 में शाहबानो केस के बाद यूनिफॉर्म सिविल कोड सुर्खियों में आया। सुप्रीम कोर्ट ने तलाक के बाद शाहबानो के पूर्व पति को गुजारा भत्ता देने का ऑर्डर दिया था। इसी मामले में कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि पर्सनल लॉ में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होना चाहिए। राजीव गांधी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संसद में बिल पास कराया था।

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