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चुनाव में धर्म-जाति की चर्चा अवैध!

GTY_supreme_court_cases_jef_131003_16x9_992सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने  4-3 के बहुमत से फैसला दिया कि धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर वोट मांगना अवैध है। इसे “भ्रष्ट आचरण” माना जाएगा। ऐसा करने पर किसी विजयी उम्मीदवार की सदस्यता खारिज हो जाएगी। जजों के बहुमत की राय रही- चुनाव एक जागतिक (दुनियावी) क्रिया है, जबकि मनुष्य और ईश्वर का संबंध व्यक्तिगत चयन है। राज्य को इस अंतर को ध्यान में रखना चाहिए। इस फैसले का निहितार्थ है कि धर्म या ऐसी अन्य अस्मिता की राजनीति के लिए आगे से चुनावों में कोई जगह नहीं होगी।

लेकिन तीन जज इस फैसले से सहमत नहीं थे। उनकी राय थी कि धर्म, जाति, भाषा आदि समाज के एक बड़े तबके से हुए सामाजिक भेदभाव के प्रतीक भी हैं। उनकी तरफ से असहमत फैसला लिखते हुए जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा- ‘लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावी राजनीति का संबंध गोलबंदी (mobilization) से है। सामाजिक गोलबंदी शक्ति और औचित्य की तलाश का अभिन्न अंग है। अतः यह मानना अवास्तविक होगा कि धारा 123 (3) को पारित करते समय संसद का उद्देश्य लोकतंत्र के महान उत्सव में धर्म, जाति, नस्ल, समुदाय या भाषा के जिक्र को समाप्त करना था।’

सुप्रीम कोर्ट के सामने मामला जन-प्रतिनिधित्व कानून-1951 की धारा 123(3) की व्याख्या का था। कोर्ट में 1992 में भारतीय जनता पार्टी के नेता अभिराम सिंह ने याचिका दायर की थी। अभिराम सिंह 1990 में महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुने गए थे। 1991 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने उनकी सदस्यता इस आधार पर रद्द कर दी कि उन्होंने हिंदू धर्म के नाम पर वोट मांगे थे। पहले सिंह की याचिका तीन जजों की बेंच के सामने आई। बाद में इस बेंच ने धारा 123(3) की व्याख्या के लिए उस याचिका को पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेज दिया। अभी ये संविधान पीठ सुनवाई कर रही थी कि उसे सूचित किया गया कि उससे मिलती-जुलती याचिका नारायण सिंह नाम के एक व्यक्ति ने मध्य प्रदेश के भाजपा नेता सुंदरलाल पटवा के खिलाफ भी दायर की है। उस याचिका को पांच जजों की बेंच सात जजों की संविधान पीठ के पास भेज चुकी थी। तब अभिराम सिंह की याचिका को संबंधित बेंच ने भारत के प्रधान न्यायाधीश के पास भेज दिया, ताकि वे उसे भी सात जजों की बेंच के पास भेज सकें। लेकिन तब से ये मामला लंबित था।

इस बीच 1995 में जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता वाली तीन जजों की खंडपीठ का फैसला आया, जिसमें ये विवादास्पद व्यवस्था दी गई कि हिंदुत्व/ हिंदू धर्म के नाम पर वोट मांगने के आधार पर किसी विजयी उम्मीदवार की सदस्यता खारिज नहीं हो सकती, क्योंकि हिंदुत्व/ हिंदू धर्म कोई महजब नहीं, बल्कि एक जीवन पद्धति है। इस टिप्पणी के खिलाफ तीन याचिकाएं दायर की गई थीं। फरवरी 2014 में जस्टिस आरएम लोढा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इन याचिकाओं को भी सात सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेज दिया। पिछले साल अक्टूबर में सात सदस्यीय बेंच ने हिंदुत्व की व्याख्या संबंधी याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। उसने कहा कि इस मसले को वह नहीं छुएगी।

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