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दो दृष्टिकोणों का टकराव

supreme-court-of-indiaसुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले से मुद्दा यह उठा है कि क्या लोकतंत्र को समाज की वास्तविक संरचना और माहौल से अलग करके देखा जाना चाहिए? धारा 123 (3) के संबंधित अहम सवाल यह उठता है कि इसके जरिए संसद आखिर क्या हासिल करना चाहती थी? वह महज धर्म, जाति, भाषा, नस्ल, समुदाय के आधार पर वैमनस्य का फैलाव रोकना चाहती थी, अथवा हर हाल में इनकी चर्चा रोकना चाहती थी? साफ है कि संविधान पीठ के बहुमत और अल्पमत फैसलों में भारतीय संविधान, नागरिकता और सार्वजनिक जीवन को लेकर दो तरह की दृष्टियां व्यक्त हुई हैं। हालांकि अब बहुमत ने जो कहा, वही देश का कानून है, लेकिन बहुलतावादी और विभिन्नताओं से परिपूर्ण जनतंत्र में उपरोक्त दोनों में से कौन-सी दृष्टि अधिक स्वीकार्य है- इस पर मतभेद जारी रहेंगे।

एक दृष्टि में लोकतंत्र की बुनियादी शर्त ऐसे नागरिक हैं, जो सार्वजनिक और अपने निजी जीवन को अलग-अलग रखते हों। यानी जब वे राजनीतिक निर्णय लेते हों, तब वे धर्म, जाति आदि जैसे पहलुओं से उनसे जुड़ी भावनाओं का ख्याल ना करते हों। वे आधुनिक अर्थ में धर्मनिरपेक्ष हों। लेकिन दूसरा नजरिया यह है कि ऐसे नागरिक महज कल्पना में होते हैं। समाज में ऐसे गिने-चुने लोग ही होते हैं। और जब धर्म या जाति से लोगों के विशेषाधिकार तय होते हों अथवा इन आधारों पर उनका शोषण होता हो, तो ये पहलू राजनीति में ना उठें- यह संभव नहीं है।

क्या स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए यह अनिवार्य है कि धर्म, जाति, भाषा आदि की चुनावों में चर्चा बिल्कुल रोक दी जाए? क्या मतदाताओं के सामने किसी भी प्रकार के मुद्दे या विचार की चर्चा पर रोक लगाने की सोच अपने-आप में अलोकतांत्रिक नहीं है? क्या यह मतदाताओं के विवेक पर अविश्वास करना नहीं है? संविधान पीठ के बहुमत फैसले में कहा गया कि चुनाव एक सेकुलर गतिविधि है। क्या सेकुलरिज्म का अर्थ यह है उस व्यवस्था में धर्म की चर्चा ही ना हो? और क्या यह सेकुलरिज्म की एक प्रकार की धारणा को सब पर थोपना लोकतांत्रिक है? क्या हर हाल में जाति, धर्म या भाषा के आधार पर होने वाली गोलबंदी या राजनीति अवांछित है?

कुछ विशेषज्ञों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा भी उठाया है। संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की आजादी भारत के नागरिकों को प्राप्त है। लेकिन इसी अनुच्छेद की उपधारा 2 के तहत इस आजादी पर विवेकपूर्ण प्रतिबंध का प्रावधान है। जब यह संवैधानिक व्यवस्था मौजूद है, तो जन-प्रतिनिधित्व कानून की एक धारा की इतनी सख्त व्याख्या का क्या औचित्य है? एक महत्त्वपूर्ण मसला 1995 के जस्टिस वर्मा की अध्यक्षता वाली पीठ के फैसले का है। हालांकि वर्तमान संविधान पीठ ने हिंदुत्व या हिंदू धर्म की व्याख्या करने से इनकार कर दिया, इसके बावजूद इस संदर्भ में ये प्रश्न नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्या ताजा फैसले से जस्टिस वर्मा का फैसला निष्प्रभावी हो गया है? कहने का मतलब यह कि क्या अब हिंदुत्व या हिंदू धर्म के नाम पर वोट मांगना अवैध हो जाएगा? अथवा, वह फैसला अभी कायम है और हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगने पर ताजा फैसला लागू नहीं होगा?

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