Pages Navigation Menu

Breaking News

जेपी नड्डा बने भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष

जिनको जनता ने नकार दिया वे भ्रम और झूठ फैला रहे है; प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

भारत में शक्ति का केंद्र सिर्फ संविधान; मोहन भागवत

पत्रकारों के जनसर्वे और सर्वोच्च न्यायालय के अयोध्या फैसले में कई समानताएं

20191112_223520 (1)मनोज वर्मा

नई दिल्ली।अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि और बाबरी ढांचे को लेकर सदियों चले विवाद ने भारत की राजनीति और सामाजिक तानेबाने को खासा प्रभावित किया।इसलिए अयोध्या का यह मुदृा मीडिया के लिए भी अहम रहा। अस्सी और नब्बे के दशक की बात हो या उसके बाद अयोध्या का मुदृस कभी अपने जनआंदोलन के चलते मीडिया की सुर्खी में रहा है तो कभी अयोध्या का यह विवाद कानूनी दांवपेंच और फैसलों के मीडिया के केंद्र में रहा। अयोध्या मन्दिर— मस्जिद विवाद को मिली मीडिया कवरेज ने तथ्यों और जनभावनाओं को अलग अलग स्तर पर सामने लाने का काम किया। समय के साथ अयोध्या से जुडी हर घटना को मीडिया में प्रमुखता जैसे जैसे मिली श्रीरामजन्मभूमि के लिए चला आंदोलन एक वृहद जनआंदोलन के रूप में उभर कर सामने आया।सितंबर 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले premises-photo-camera-television-journalistके बाद अयोध्या में मन्दिर मस्जिद विवाद को लेकर कई और सवाल खडे कर दिए थे लिहाजा दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन की अगुवाई में 2011—12 और 2012—13 में अयोध्यावावासियों की भावनाएं जानने के लिए पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अयोध्या में दो अलग अलग चरणों में जनसर्वे किया था।अयोध्या के मन्दिर मस्जिद भूमि विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय का जो फैसला 9 नवंबर 2019 को आया वह जनभावनाओं के अनुरूप आया। सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला जहां कानून,सबूत और अन्य दस्तावेज के आधार पर सुनाया, वहीं पत्रकारों के जनसर्वे में आम अयोध्यावासी ने अपनी श्रद्धा,विश्वास और मान्यताओं के आधार पर अयोध्या को लेकर अपने मन की बात का खुलासा किया था।
इसलिए पत्रकारों के जनसर्वे और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में कई समानताएं देखने को मिलती हैं।लिहाजा सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या मामले में जो फैसला सुनाया उसका अयोध्यावासियों ने स्वागत किया।

लोकतंत्र में लोग क्या चाहते हैं यह महत्वपूर्ण होता है। अयोध्या के लोगों की इसी राय को जानने के लिए दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन की अगुवाई में पत्रकारों ने वर्ष 2011—12 में अयोध्या में जनसर्वे किया था।इस जनसर्वे के करीब सात साल बाद जब अयोध्या पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला सामने आया तो अयोध्यावासियों की जनभावना के अनुरूप आया।इतना ही नहीं पत्रकारों के जनसर्वे और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में कई समानताएं भी उभर कर सामने आई।

जनसर्वे में 93 फीसदी अयोध्यावासियों ने किया था भूमि बंटवारे का विरोध

अयोध्या में सात पहले दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन ने किया था सर्वे

पांच हजार लोगों के बीच दो चरणों में किया गया था सर्वे

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला अयोध्यावासियों की जनभावना के अनुरूप

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने 9 नवंबर 2019 को अपने ऐतिहासिक निर्णय में कहा कि जहां रामलला विराजमान हैं मन्दिर वहीं बनेगा। कारण उसी विवादित स्थान का हिन्दू रामजन्मभूमि मानते आए हैं।इतना ही नहीं सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए रामलला जहां विराजमान हैं उस भूमि पर न तो निर्मोही आखडे को कोई हिस्सा दिया और न ही सुन्नी वक्फ बोर्ड को। सर्वोच्च न्यायालय ने मस्जिद,रामलला के मन्दिर से कहीं दूर अलग अन्य स्थान पर बनाने का फैसला सुनाया। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में जहां पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट को भी महत्वपूर्ण माना वहीं रामजन्मभूमि को लेकर लोगों की आस्था और मान्यताओं का उल्लेख भी अपने फैसले में किया।वैसे सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से पहले सितंबर 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आया था।जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुरातत्व रिपोर्ट, साक्ष्य,आस्था और दस्तावेजों के आधार पर यह माना था कि जहां रामलला विराजमान हैं वही रामजन्मभूमि है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मौटेतौर पर यह माना था कि जहां पर बाबरी ढांचा था उसके नीचे मन्दिरनुमा संरचना है। पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांट दिया था। एक हिस्सा रामलला विराजमान को दिया, दूसरा हिस्सा निर्मोही आखडे को और तीसरे हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया था। लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट का विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांटने का फैसला नए विवाद कारण बन गया और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट मन्दिर— मस्जिद के पक्षकार न्याय के लिए सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गए।इसलिए के साथ देशभर में यह सवाल भी उठने लगा कि विवादित भूमि को लेकर अयोध्या के लोग क्या चाहते हैं।इसी सवाल को ध्यान में रख दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन ने मीडिया एसोसिएशन फॉर सोशल सर्विस, उत्तर प्रदेश जर्नलिस्टस एसोसिएशन की फैजाबाद अयोध्या इकाई और अयोध्या फाउंडेशन नामक संस्थाओं के साथ मिलकर अयोध्या के स्थानीय लोगों के बीच जनसर्वे किया। लोगों से लिखित फार्म भरवाकर सर्वे का काम किया गया। सर्वे के तहत पहला सवाल तो यही लोगों से पूछा गया था कि विवादित भूमि पर अयोध्या के लोग क्या चाहते हैं?वहां मन्दिर बने या कुछ और? जहां रामलला विराजमान हैं क्या वहीं जन्मस्थान है? अयोध्या का मुद्दा राजनीतिक है या आस्था का?राजनीतिकरण के लिए कौन जिम्मेदार है? इलाहाबाद हाई कोर्ट के तीन हिस्सों में भूमि बंटबारे के फैसले से अयोध्यावासी संतुष्ट हैं या असंतुष्ट? इन सवालों के साथ अयोध्या के विभिन्न वर्गो के पांच हजार लोगों के बीच जनसर्वे को किया गया था।

दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन के अयोध्या में किए गए सर्वे के करीब सात साल बाद जब सर्वोच्च न्यायालय का कानूनी फैसला सामने आया तो जनभावना के अनुरूप आया।कई बिन्दुओं पर पत्रकारों के जनसर्वे और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में एक सी समानता निकली। मसलन…

1 अयोध्या के लोगों से यह सवाल किया था कि अयोध्या के लोग क्या चाहते हैं? वहां मन्दिर बने या मस्जिद या कुछ और?

दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन के सर्वे में लोगों की राय- 95 फीसदी लोगों ने कहा कि जहां रामलला विराजमान हैं वह उसी स्थान पर राम मन्दिर मानते हैं। रामलला विराजमान हैं वहीं मन्दिर निर्माण चाहते हैं। चार फीसदी लोगों ने सर्वधर्म स्थल के निर्माण की बात कहीं थी तो एक फीसदी ने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला — अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने जहां रामलला विराजमान है उसी स्थान पर मन्दिर निर्माण का आदेश दिया।

——-

2 अयोध्या के लोगों से सवाल पूछा गया था कि जहां रामलला विराजमान हैं क्या वहीं रामजन्मस्थान है? यह मुदृा आस्था का है या राजनीति का?

दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन के सर्वे में लोगों की राय— 98 फीसदी लोग ने सर्वे में कहा था कि जहां रामलला विराजमान हैं वह उसे ही रामजन्मभूमि मानते हैं। जबकि 98 फीसदी लोग ने अयोध्या के मुद्दे को आस्था का विषय बताया था। जबकि मात्र दो फीसदी लोगों ने इसे राजनीतिक मुद्दा बताया था

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला— न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि जहां रामललला विराजमान हैं लोग उसी स्थान को राम का जन्म स्थान मानते हैं। साथ ही न्यायालय ने अपने फैसले में आस्था की बात भी कई बार कही है।

——-
3 सर्वे में अयोध्या के लोगों से पूछा गया था कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के विवादित भूमि को रामलला विराजमान,निर्माही आखडे और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच तीन हिस्सों में बांटने के फैसले से आप संतुष्ट हैं या असंतुष्ट ?

दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन के सर्वे में लोगों की राय— सर्वे में 93 फीसदी अयोध्यावासियों ने भूमि बंटवारे के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर असहमति जताई थी।लोगों ने सर्वे में भूमि के तीन हिस्सों में बंटवारे के खिलाफ अपनी राय दी थी। सर्वे में लोगों ने भूमि बंटवारे को न्याय की दृष्टि से उचित नहीं माना था।साथ ही लोगों ने यह भी राय दी कि मन्दिर मस्जिद अगल बगल न बनाए जाएं क्योंकि ऐसा करने से टकराव और विवाद बना रहेगा।

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला— सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में विवादित भूमि पर जहां रामललला विराजमान हैं वहीं मन्दिर निर्माण करने के आदेश दिया। जबकि अयोध्या में कहीं ओर मस्जिद निर्माण के लिए पांच एकड भूमि सुन्नी वक्फ बोर्ड को देने की बात कही। सर्वोच्च न्यायालय ने भी भूमि को तीन हिस्सों में बंटाने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसला को उचित नहीं माना और भूमि का का मालिकाना हक रामलला के पक्ष में दिया।

——
4 जनसर्वे में अयोध्यावासियों से यह भी पूछा गया था कि वे अयोध्या विवाद का समाधान कैसे चाहते हैं कानून से, वार्ता से या किसी और प्रकार से?

दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन के सर्वे में लोगों की राय— 42 फीसदी लोग ने जहां कानून से फैसले की बात कहीं थी तो 40 फीसदी लोग ने वार्ता के जरिए विवाद को सुलझाने के पक्ष में अपनी राय दी थी। 18 फीसदी ने किसी भी तरह से समाधान करने की राय दी थी।

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला— अयोध्या विवाद पर रोजना सुनवाई शुरू करने से पहले सर्वोच्च न्यायालय ने सभी पक्षों से वार्ता के जरिए समाधान निकालने की अपील की। जब बात नहीं बनी तो सर्वोच्च न्यायालय ने चालीस दिन सुनवाई कर, साक्ष्यों व दस्तावेजों के आधार पर विवादित भूमि पर कानूनी फैसला सुना दिया।

जाहिर है न्यायपालिका और मीडिया लोकतंत्र के दो मजबूत आधार स्तंभ हैं और लोकतंत्र में जब न्यायपालिका और मीडिया तटस्था और पारदर्शिता के साथ अपना अपना दायित्व निभाते हैं तो अयोध्या जैसे मामलों के समाधान भी निकल आते हैं।अयोध्या पर पत्रकारों की प्रमुख संस्था दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन और अन्य संगठनों के सर्वे के रूप में जनभावना का प्रकटीकरण कानूनी फैसले के रूप में भी स्पष्ट दिखाई दिया।यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया की विश्वनियता को भी प्रमाणित करता है।साथ ही जनभावना को भी।अयोध्या के लोगों ने भी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को सहमति के साथ स्वीकार कर लिया।
……
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

Share

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *