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तालिबान ने तुर्की को दी चेतावनी, कहा- जल्द खाली करो अफगानिस्तान

afganistan turkiकाबुल तालिबान ने तुर्की को अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति बढ़ाने को लेकर अंतिम चेतावनी दी है। अमेरिकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेनाओं के अफगानिस्तान छोड़ने के बाद तुर्की अब काबुल एयरपोर्ट की जिम्मेदारी उठाने जा रहा है। यही कारण है कि तुर्की के करीब 1000 सैनिक अभी अफगानिस्तान में तैनात रहेंगे। इसी को लेकर तालिबान ने कहा है कि तुर्की का यह निर्णय अनुचित है। उन्होंने यह भी कहा कि हमारी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन है और हमारे राष्ट्रीय हितों के खिलाफ है।

अमेरिका को खुश करना चाहते हैं एर्दोगन
तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दोगन ने 9 जुलाई को कहा था कि तुर्की और अमेरिका इस बात पर सहमत हैं कि अफगानिस्तान से यूएस फोर्सेज की वापसी के बाद काबुल हवाई अड्डे को तुर्की की सेना के नियंत्रण में रखा जाएगा। अमेरिका से अपने संबंधों को सुधारने की कोशिश के तौर पर एर्दोगन ने अगले महीने सैनिकों के जाने के बाद काबुल हवाई अड्डे के लिए सुरक्षा प्रदान करने का वादा किया है।

तुर्की को पहले भी चेतावनी दे चुका है तालिबान
तालिबान ने एर्दोगन के इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा है कि तुर्की को भी 2020 के समझौते के अनुरूप अपने सैनिकों को वापस बुलाना चाहिए। इससे पहले भी तालिबान के प्रवक्‍ता सुहैल शाहीन ने तुर्की को अपनी सेना वापस बुलाने को लेकर चेतावनी दी थी। बीबीसी के साथ बातचीत में शाहीन ने कहा था कि तुर्की को अमेरिका के साथ 29 फरवरी, 2020 को हुए समझौते के तहत निश्चित रूप से अपनी सेना को वापस बुलाना होगा।

काबुल एयरपोर्ट पर कब्जे को लेकर इतना बेचैन क्यों तुर्की?
काबुल एयरपोर्ट के संचालन करने के पीछे तुर्की की सोची समझी रणनीति है। अमेरिका और तुर्की के बीच तनाव चरम पर है। अमेरिका ने तुर्की के रक्षा उद्योगों पर कई प्रतिबंध भी लगाए हुए हैं। रूस से नजदीकी के कारण नाटो में तुर्की की पूछ काफी कम हो गई है। इसलिए राष्ट्रपति एर्दोगन अपने देश से हजारों किलोमीटर दूर इस एयरपोर्ट की जिम्मेदारी संभालने की बात कर रहे हैं। इसके अलावा अफगानिस्तान का एयरस्पेस एक अंतराष्ट्रीय एयर रूट भी है। इसपर कब्जे का मतलब एशिया और यूरोप के आसमान पर कब्जा करना है।

काबुल एयरपोर्ट से तुर्की को क्या फायदा?
काबुल एयरपोर्ट के जरिए मध्य एशिया के हवाई क्षेत्र पर नजर रखी जा सकती है। अमेरिका इस एयरपोर्ट के जरिए ईरान, रूस और चीन तक हवाई घुसपैठ कर सकता है। इसके लिए अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने पाकिस्तान से बलूचिस्तान क्षेत्र में एक एयरबेस की मांग की थी। बदले में अमेरिका पाकिस्तान को आर्थिक सहायता बहाल करने को तैयार था। लेकिन, इमरान खान ने अमेरिका के इस प्रस्ताव को नकार दिया। जिसके बाद अमेरिका अब काबुल एयरपोर्ट को किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहता है।

पाकिस्तान को साथ लेना तुर्की की चाल तो नहीं?
काबुल एयरपोर्ट के संचालन में तुर्की पाकिस्तान और हंगरी की सहायता ले रहा है। हालांकि, सवाल यह उठ रहा है कि जब नाटो देशों को इस एयरपोर्ट को ऑपरेट किए जाने की बात की जा रही है तो तुर्की गैर नाटो पाकिस्तान को इसमें क्यों शामिल कर रहा है। इसके पीछे एर्दोगन का पाकिस्तान प्रेम साफ दिख रहा है। दरअसल वे पाकिस्तान के जरिए तालिबान को साधने की कोशिश में है। साथ में पाकिस्तान को काबुल में भारत के अभियानों पर नजर रखने की ताकत मिल जाएगी। वह मध्य एशिया में भारत के हवाई मिशनों पर भी नजर रख सकता है।

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