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शाह बानो से शायरा बानो तक…तीन तलाक

jama-masjid-socialनई दिल्ली: तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है. देश की सर्वोच्च अदालत तय कर दिया है कि तीन तलाक महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन करता है या नहीं, यह कानूनी वैध है या नहीं और तीन तलाक इस्लाम का मूल हिस्सा है या नहीं? ऐसे में हम आपका ध्यान उस ओर दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि तीन तलाक का मुद्दा आखिर कोर्ट कैसे पहुंचा? वह कौन मुस्लिम महिला थी, जो तीन तलाक के खिलाफ न्याय मांगने के लिए कोर्ट पहुंची थीं? उस महिला का नाम है शाह बानो. तीन तलाक के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाली इस महिला के नाम पर ही इस मामले का नाम ‘शाह बानो केस’ पड़ा. मोहम्मद अहमद खान के खिलाफ शाह बानो की ओर से दायर की गई यह याचिका इस देश की करोड़ों मुस्लिम महिलाओं के अधिकार से जुड़ा है.

60 साल की शाह बानो को शौहर ने दिया था तलाक: मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली शाह बानो को 60 साल की उम्र में उसके पति मोहम्मद अहमद खान ने तलाक दे दिया था. तलाक के वक्त शाह बानो के पांच बच्चे थे. इन बच्चों के भरण-पोषण के लिए शाह बानो ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और पति से भत्ता दिलाने की गुजारिश की. निचली अदालत ने शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाया. हालांकि उसके पति के अपील के चलते यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया.

सरकार के कदम के चलते बदला कोर्ट का फैसला: सन 1980 के दशक में मुस्लिम समाज के लगभग सारे पुरुष शाह बानो की अपील के खिलाफ थे. शायद इसी का ख्याल करते हुए तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला अधिनियम पारित कर दिया. इसके आधार पर शाह बानो के पक्ष में सुनाया गया फैसला कोर्ट ने पलट दिया.

शाह बानो के पति ने कोर्ट में दी ये दलील: कोर्ट ने जब शाह बानो के पति मोहम्मद अहमद खान से पूछा कि आखिर वे भरण-पोषण भत्ता क्यों नहीं देना चाहते हैं? इसके जवाब में अहमद खान ने कहा, ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाकशुदा महिलाओं को ताउम्र भरण-पोषण भत्ता दिए जाने का कोई प्रावधान नहीं है.’

वहीं शाह बानो के वकील ने तर्क दिया, ‘दंड प्रक्रिया संहिता देश के प्रत्येक नागरिक (चाहे वह किसी भी धर्म का हो) पर सामान रूप से लागू होती है, ऐसे में वह भी भरण-पोषण भत्ते की हकदार हैं.’ कोर्ट ने शाह बानो की दलील को मानते हुए 23 अप्रैल 1985 को उनके पक्ष में फैसला दे दिया. मुस्लिम धर्म गुरुओं ने इस फैसले के विरोध में आवाज बुलंद कर दी. भारी दबाव के चलते तत्कालीन राजीव गांधी सरकार को मुस्लिम महिला अधिनियम पारित करना पड़ा. इस कारण शाह बानो जीतकर भी हार गईं.

16 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो को माना नजीर: साल 2001 में सुप्रीम कोर्ट में डेनियल लतीफी का मामला आया था. कोर्ट ने शाह बानो के 16 साल पुराने मामले को आधार मानते हुए तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के लिए भत्ता सुनिश्चित कर दिया.

शायरा बानो की याचिका पर फिर चर्चा में आया शाह बानो केस: उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली शायरा बानो का निकाह साल 2002 में इलाहाबाद के रिजवान अहमद से हुई थी. ससुराल वालों की दहेज प्रताड़ना, फिर पति के तलाक देने के बाद शायरा बानो कोर्ट पहुंचीं. आरोप है कि पति शायरा बानो को लगातार नशीली दवाएं देकर याददाश्त कमजोर कर दिया और साल 2015 में मायके भेजकर तलाक दे दिया था.

शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि वह तीन बार तलाक बोलकर तलाक देने की बात को नहीं मानती हैं. शायरा की याचिका में ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937’ की धारा 2 की वैध्यता पर भी सवाल उठाए गए हैं. यही वह धारा है जिसके जरिये मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह, ‘तीन तलाक’ (तलाक-ए-बिद्दत) और ‘निकाह-हलाला’ जैसी प्रथाओं को वैध्यता मिलती है. इनके साथ ही शायरा ने ‘मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939’ को भी इस तर्क के साथ चुनौती दी है कि यह कानून मुस्लिम महिलाओं को बहुविवाह जैसी कुरीतियों से संरक्षित करने में सार्थक नहीं है.

देश की सर्वोच्च अदालत में पांच धर्मों के जस्टिस मिलकर शायरा बानो के मामले पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. इस मामले पर फैसला सुनाने वाले जजों में चीफ जस्टिस जेएस खेहर (सिख), जस्टिस कुरियन जोसफ (क्रिश्चिएन), जस्टिस रोहिंग्टन एफ नरीमन (पारसी), जस्टिस यूयू ललित (हिंदू) और जस्टिस अब्दुल नजीर (मुस्लिम) शामिल रहे.

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