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मीडिया की आजादी के सवाल

naidu_story_647_062216113439_071116052321_071817124628_0जानवर और इंसान में यही फर्क है कि इंसान कुछ नियमों से संचालित होता है, जो व्यवस्थित जीवन की जरूरी शर्त है, अन्यथा तो एक जंगल राज होगा, जहां बलशाली ही राज करता है। व्यवस्थित जीवन का मतलब है, एक तरह का संवाद संतुलन, जो किसी एक घटक को किसी भी स्तर पर निरंकुश होने का अधिकार नहीं देता। आजादी कैसी भी हो, आत्मसंयम मांगती है। भारतीय संविधान कुछ मौलिक अधिकार देता है, लेकिन कुछ मर्यादाएं भी तय करता है। अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार पर भी यही लागू होता है। लेकिन भारत जैसे महान और जीवंत लोकतंत्र में यह स्वतंत्र मीडिया की आवाज भोथरा करने का जरिया नहीं बन सकता।

लोकतंत्र का मतलब ही आत्मानुशासन है। इसकी सफलता सार्वजनिक जीवन और विकास-प्रक्रिया में जागरूक लोगों की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी पर निर्भर है। बदले में यह सूचनाओं और स्वतंत्र विचारों के मुक्त प्रवाह की गारंटी देता है। रोजमर्रा के जीवन के सभी पहलुओं और राज्य के कामकाज से संबंधित सभी आवश्यक तथ्यों और आंकड़ों के  प्रति जागरूक जनता का सशक्तीकरण स्वतंत्र, निष्पक्ष और वास्तविक लोकतंत्र की कुंजी है। मीडिया इस भूमिका को और मजबूत करने का काम करता है। मीडिया को तो इतना सशक्त होना चाहिए कि वह इस कार्य को और ज्यादा मजबूती से अंजाम दे सके।

फिर मीडिया की आजादी पर कुछ बंदिशें क्यों? संविधान सभा की बहस के दौरान एक विचार आया था कि शर्तों या प्रतिबंधों के साथ अभिव्यक्ति की आजादी का कोई अर्थ नहीं। एक और भी विचार था कि दुनिया में कहीं भी पूरे तौर पर ऐसी आजादी नहीं है। बाद वाली बात मानी गई। सर्वोच्च न्यायालय अभिव्यक्ति और बोलने की आजादी सहित नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सबसे बड़ा रक्षक है। प्रेस की आजादी भी संविधान के इसी प्रावधान में निहित है। सर्वोच्च न्यायालय वर्षों से इन्हीं आधारों पर मीडिया की आजादी की रक्षा करता रहा है। अंतिम स्थिति यही है कि किसी के व्यक्तिगत नागरिक अधिकारों से परे मीडिया पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। संविधान में कुछ ऐसे प्रावधान हैं, जो विदेश संबंध, सार्वजनिक आदेश, अपराध की स्थिति में उत्तेजना फैलाने से रोकने, देश की संप्रभुता और अखंडता और सुरक्षा के सवाल, आचरण की नैतिकता और अदालत की अवमानना या मानहानि जैसे मामलों में कुछ प्रतिबंध जरूर लगाते हैं। इनमें से प्रथम तीन प्रतिबंध संविधान (प्रथम संशोधन) ऐक्ट 1951 और चौथा 16वें संविधान संशोधन के जरिए 1963 में अस्तित्व में आया।

एक व्यक्ति की बोलने की आजादी वहां खत्म होती है, जहां दूसरे की शुरू होती है, क्योंकि दोनों के अधिकार समान हैं। चैनिंग अर्नाल्ड बनाम किंग एम्परर मामले में प्रिवी कौंसिल ने यही कहा था। कौंसिल ने माना था कि, ‘पत्रकार की आजादी आम आजादी का ही हिस्सा है। उनके (पत्रकारों) दावों की सीमा, उनकी आलोचनाएं या उनकी टिप्पणी अपने आप में व्यापक हैं, लेकिन किसी अन्य विषय से उनकी वैसी तुलना नहीं की जा सकती।’ सच है कि व्यक्ति हो या मीडिया, आजादी का संतुलित और तार्किक इस्तेमाल होना चाहिए और बोलने की आजादी का अधिकार इससे अलग नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय ने कई अवसरों पर मीडिया की भूमिका के महत्व को रेखांकित किया है। रमेश थापर बनाम स्टेट ऑफ मद्रास मामले में मुख्य न्यायाधीश पतंजलि शास्त्री की मान्यता थी- ‘बोलने और प्रेस की आजादी किसी भी लोकतांत्रिक संगठन की आधारभूत जरूरत हैं, क्योंकि मुक्त विमर्श और जनता को शिक्षित किए बिना किसी लोकप्रिय सरकार की कल्पना ही नहीं की जा सकती।’ भारत सरकार बनाम एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा,‘ एकतरफा जानकारी, भ्रामक जानकारी, गलत सूचना या सूचना न होना, ये सभी समान रूप से एक ऐसे अज्ञानी समाज की रचना करते हैं, जहां लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं रह जाता या यह मजाक बनकर रह जाता है। बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी में जानकारी लेने और देने का अधिकार शामिल है और विचार रखने की आजादी इसमें निहित है।’

राष्ट्र निर्माण में मीडिया की भूमिका और योगदान को देखते हुए सूचना तक इसकी पहुंच की राह या इसके प्रसार में बाधा नहीं डाली जानी चाहिए। चूंकि मीडिया की आजादी संविधान प्रदत्त है, इसलिए जरूरत पड़ने पर कार्यपालिका के हस्तक्षेप की बजाय इसके लिए कानून बनाया जाना चाहिए। ऐसे समय में, जब तकनीक की प्रगति के साथ मीडिया नया आकार ग्रहण कर रहा हो, उसके सामने नए तरह की चुनौतियां हों, तो बदलते संदर्भों के साथ हमें भी संविधान प्रदत्त व्यवस्थाओं के आलोक में ही तार्किक और व्यावहारिक समाधान निकालने की जरूरत है।

राज्य और चौथे स्तंभ के बीच मीडिया रेग्यूलेशन लंबे समय से विवाद का मुद्दा बना रहा है, लेकिन न्यू मीडिया के दौर में ‘गोपनीयता पर हमले’ के रूप में इस पर नई बहस छिड़ी है। ऐसे समय में जब तेजी से विकसित हो रहे समाजों में राज्य अब भी एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में मौजूद हो, और जीने और आजादी के अधिकार के अभिन्न पहलू के रूप में ‘व्यक्तिगत’ का उभरना और निजता की रक्षा जैसे सवाल नई परिभाषा गढ़ रहे हों, तो संवाद के लिए भी नई भाषा और नए तरीके ईजाद करने होंगे। व्यक्ति की प्रतिष्ठा अहम है और गोपनीयता इसमें अंतर्निहित है।

आजादी से पहले और बाद में मीडिया ने सशक्त भूमिका निभाई है, और इसे आगे भी ऐसी ही भूमिका निभानी होगी। हालांकि बीते कुछ सालों में सरकार, संगठनों व व्यक्तियों द्वारा मीडिया के तौर-तरीके प्रभावित करने के कुछ उदाहरण भी दिखे हैं। अधिकारों का इस्तेमाल और अपने अनुकूल वातावरण मीडिया का मौलिक अधिकार है, पर इनमें कुछ जिम्मेदारियां भी निहित हैं। अधिकार व जिम्मेदारी का सौहार्दपूर्ण निर्वहन स्वतंत्र मीडिया के विकास के लिए समय की मांग है।

सनसनी के लिए कोई जगह नहीं। अफवाहें फैलाना और पीत पत्रकारिता आत्मघाती हैं। मीडिया की विश्वसनीयता के लिए सूचनाओं की पुष्टि सबसे मजबूत आधार है, जिसके अभाव में अपुष्ट सूचनाएं कल्पनाओं को जन्म देकर माहौल बिगाड़ सकती हैं। ‘प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ के अवसर पर मीडिया को जिम्मेदारी और व्यावसायिकता के बीच तालमेल बनाते हुए नई लकीर खींचने की जरूरत है। अन्य सभी हितधारकों को भी इसके अनुकूल माहौल बनाने में सहयोगी भूमिका निभानी होगी, क्योंकि लोकतंत्र और राष्ट्र-निर्माण में हम सबकी बड़ी भूमिका है।

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