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कुपवाड़ा का एक पूरा गांव खड़ा हो गया आतंक के खिलाफ

kupwaraकश्मीर की खूबसूरत वादियों में आतंक का जहर घोलने वालो के खिलाफ स्थानीय लोगों के बलिदान और जज्बे की कई कहानी यहां सुनने को मिलती है। स्थानीय पुलिस में जवान से एसआई बने गुलाम रसूल खान की कहानी भी आतंक के खिलाफ जज्बे की कहानी है। रसूल बताते हैं कि आतंक से लड़ते हुए उनके परिवार के 12 लोगों की जान चली गई। लेकिन न उन्होंने न ही उनके परिवार ने हिम्मत नही हारी। कुपवाड़ा में उनका गांव औरा आतंक के खिलाफ लड़ाई की मिसाल बन गया। इस गांव में ज्यादातर लोग फौज और पुलिस में हैं।

भाई बहन परिवार बना निशाना 
रसूल ने बताया कि 90 के दशक से लगातार उनके तीन चाचा, सगे भाई, बहन, फूफा मौसरी बहन सबको आतंकियो ने निशाना बनाया। एक भाई की डेड बॉडी भी नही मिली। आतंकी चाहते थे कि उनका परिवार आतंकियो के खिलाफ प्रशासन को सहयोग न करे। उनसे पुलिस की नौकरी छोड़ने को कहा गया।

हम हिंदुस्तानी, बस कश्मीर का भला चाहिए 
रसूल गर्व से कहते हैं कि हम हिंदुस्तानी हैं। जब हमारे पूर्वजों ने हिंदुस्तान में कश्मीर का विलय कर लिया तो हम किसी भी ऐसे व्यक्ति की खिलाफत करेंगे जो देश के खिलाफ काम करे। धारा 370 के बारे में इनका कहना है कि हमें हर कदम में हिंदुस्तान के साथ रहना है। बस यहां के लोगों का भला होना चाहिए।

पुलिस में कई रसूल 
दरअसल जम्मू कश्मीर पुलिस में ऐसे कई रसूल हैं जिन्होंने खुद और उनके परिवारों ने आतंक से लड़ते हुए बलिदान दिया है। यही लोग फौज और शासन, प्रशासन की आतंकरोधी मुहिम की बुनियाद हैं। दहशत फैलाने के लिए इनके परिजनों को निशाना बनाया जाता है।

घुसपैठ के बाद दक्षिण कश्मीर चले जाते हैं आतंकी 
अब कुपवाड़ा का इलाका अपेक्षाकृत शांत है। क्योंकि आतंकियो को यहां पनाह नही मिल पाती। इधर पाक सीमा से आतंकी घुसपैठ करते भी हैं तो दक्षिण कश्मीर की ओर चले जाते हैं।

दक्षिण कश्मीर में ज्यादा समस्या 
इस समय दक्षिण कश्मीर ही सुरक्षा बलों के आतंकरोधी अभियान का फोकस बन गया है। आतंक की कमर तोड़ने के लिए जबरदस्त अभियान चलाया जा रहा है। आतंक के स्रोत पर हमले की रणनीति के लिए टेरर मोनिटरिंग ग्रुप के तहत कई एजेंसिया मिलकर काम कर रही हैं।

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