राज्यपाल ने आगे कहा, ‘मुख्यमंत्री ने कहा कि कूचबिहार में नरसंहार हुआ था। प्रांत में और कहीं हिंसा हो रही है, उसपर उन्होंने एक शब्द नहीं कहा। केवल राजनीति के लक्ष्य को संविधान को तार-तार नहीं कर सकते। अत्यंत विवशता में मैंने कठोर निर्णय लिया और संविधान की रक्षा करने के लिए राज्यपाल की हैसियत से हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में जाने का निर्णय लिया। कोई भी बाधा से मैं प्रभावित नहीं हो सकता है। मैं अपने संविधानिक ड्यूटी का पालन करूंगा। प्रजातंत्र की मूल भावना पर कुठराघात नहीं होना चाहिए। हर उस व्यक्ति को दंडित करना चाहिए, जिसने बंगाल के किसी भी भाग में कानून को अपने हाथ में लिया है। लेकिन अभी तक सरकार की कार्रवाई नजर नहीं आ रही है। राज्यपाल की भूमिका सिर्फ राजभवन में है, मु्झे यह स्वीकार नहीं है। राज्यपाल को मुट्ठी में नहीं रखा जा सकता है। प्रशासनिक आदेश संविधान से ऊपर नहीं है। राज्य के प्रथम सेवक के नाते मैं अपनी ड्यूटी निभाऊंगा।’

संविधान से बाहर कोई नहीं है’

राज्यपाल ने आगे कहा, ‘मैं मुख्यमंत्री के पत्र का जवाब दिया। संविधान के बाहर कोई नहीं जा सकता है।कोई प्रशासनिक आदेश संविधान को अवरुद्ध नहीं कर सकता है। इतिहास ममता बनर्जी और जगदीप धनखड़ का फैसला करेगा। मुझे कहते हुए बड़ा संकोच हो रहा है, बंगाल में कहां और क्या कुछ नहीं हो रहा है?लोग अपने अधिकारों को नहीं बचा पा रहे हैं। सुरक्षा के लिए गांव के गांव खाली हो गए हैं।कहां हैं मानवाधिकार बचाने वाली संस्थाएं? कहां है वह मीडिया? रक्त रंजित वातावरण को कुंठित करने के लिए यह समय टक्कर और टकराव का नहीं है।‌ सहभागिता का है। राज्य, अधिकारियों को अपनी मुट्ठी में नहीं रख सकते।