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योगी को मिला मोदी का साथ, कुछ मंत्रियों की धड़कनें बढ़ी

yogi modi 2नई दिल्ली ( मनोज वर्मा ) उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी चुनावी मोड में आ गई है।मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ एक रणनीति के तहत कुपचार का अभियान चलाया जा रहा है और इसका कारण यह है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के पास योगी का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए विपक्ष और भाजपा के भीतर से एक वर्ग ने योगी आदित्यनाथ को बदनाम करने के लिए खबरों को प्लांट करने का काम किया। वैसे भाजपा के केंद्रीय नेताओं को भी इस बात का अहसास है कि भाजपा के पास इस समय योगी के अलावा राज्य में कोई चेहरा नहीं है जो चुनाव जितवा सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद योगी उत्तर प्रदेश में भाजपा के दमदार नेता हैं जिन्हें लोग पंसद करते हैं। यागी की हिन्दुत्व वाली छवि विरोधियों पर भारी है। योगी सरकार पर भ्रष्टाचार का कोई ठोस आरोप नहीं है।भाजपा नेतृत्व योगी मंत्रीमंडल को चुनाव से पहले कसना चाहता है ताकि कोई कसर ना रहे इसलिए बैठकों का दौर चला। भाजपा योगी के नेतृत्व में ही उत्तर प्रदेश का चुनाव लडेगी।

योगी के नेतृत्व में ही उत्तर प्रदेश का चुनाव लडेगी भाजपा

राज्य में हुए पिछले दो लोकसभा और 2017 के विधान सभा चुनाव में बीजेपी को शानदार जीत दिलाने के रणनीतिकार और तब के पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के कंधों पर इस बार भी यूपी में भाजपा का बेड़ा पार करने की जिम्मेदारी डाली गई है। इसी लिए चार साल तक जो कुछ यूपी में चलता रहा, उससे आगे बढ़कर पार्टी आलाकमान ने सोचना शुरू कर दिया है। चुनावी साल में वोट बैंक मजबूत करने के लिए पुराने साथियों को मनाया जा रहा है तो पार्टी के नाराज नेताओं/कार्यकर्ताओं को भी उनकी ‘हैसियत’ के हिसाब से ‘ईनाम’ देने की तैयारी कर ली गई है। लम्बे समय से खाली पड़े तमाम आयोगों-बोर्डों आदि के पद भरे जाएंगे तो कुछ नेताओं को पार्टी में पद देकर नवाजा जाएगा। दिल्ली में मोदी, अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात के बाद इसके लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कुछ ऐसे कदम उठाने को तैयार हो गए हैं जिससे मिशन-2022 को पूरा करने में कोई अड़चन नहीं आए। कहा यह भी जा रहा है कि कुछ शर्तों के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने मंत्रिमंडल का विस्तार भी करेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया जाएगा जिससे योगी का कद छोटा होता दिखे और विपक्ष को घेरने का मौका मिल जाए। अगर यह कहा जाए कि योगी का दिल्ली दौरा उनके लिए काफी सफल रहा तो इसमें कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी।

 दिल्ली दौरे पर गए योगी तब थोड़ा नरम पड़े जब उन्हें इस बात का अहसास करा दिया गया 2022 के विधानसभा चुनाव उनकी अगुवाई में ही होंगे। वह ही स्टार प्रचारक होंगे और वह ही भावी सीएम भी रहेंगे। आलाकमान से इस तरह के आश्वासन मिलने के बाद ही योगी अपने मंत्रिमंडल में कुछ बदलाव करने पर सहमत हुए। वहीं प्रधानमंत्री मोदी से मिलने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उनकी शान में कसीदे पढ़ते दिखे। योगी और पार्टी आलाकमान के बीच आशंकाओं के बादल छंटे तो पार्टी के भीतर से ‘ऑल इस वैल’ की गूंज सुनाई पड़ने लगी। करीब आधा दर्जन नये मंत्री बनाए जा सकते हैं। दावेदारों में कांग्रेस से बीजेपी में आए जितिन प्रसाद और एमएलसी एके शर्मा के अलावा अपना दल (एस) और निषाद पार्टी के एक नेता के भी मंत्री बनाए जाने की चर्चा हैं। एक-दो मंत्री योगी की पंसद के भी बनाए जायेंगे।  चुनावी साल में यूपी में चार एमएलसी सीटें खाली हो रही हैं। इनको भरते समय भी जातिगत गणित का विशेष ध्यान रखा जाएगा।

कुल मिलाकर अमित शाह ने सीएम योगी को एक रास्ता दिखा दिया है जिसके तहत योगी को ‘बैकलॉग‘ खत्म करने के साथ यूपी की चुनावी तैयारियों को धार देना होगा। वहीं चुनावी तैयारियों को तेज देते हुए बीजेपी ने विधानसभा प्रभारी और चुनाव संयोजकों की निुयक्ति की तैयारी शुरू कर दी है। जिलों से इसके लिए नाम मांगे गए हैं। प्रदेश भाजपा में मोर्चों, प्रकोष्ठों के कई पद खाली हैं। इन पर भी नियुक्ति की कवायद तेज कर दी गई है। संगठन में भी अग्रिम मोर्चों, प्रकोष्ठों और प्रकल्प में मंडल स्तर तक नियुक्यिां की जाएंगी। माना जा रहा है कि सब कुछ सही तरीके से चला तो चुनावी तैयारी के पहले चरण में जुलाई तक संगठन और सरकार में विभिन्न पदों के करीब एक लाख से अधिक कार्यकर्ताओं को समायोजित कर दिया जाएगा।संगठन में भी महिला मोर्चा, युवा मोर्चा, किसान मोर्चा, ओबीसी मोर्चा, एससी मोर्चा, एसटी मोर्चा, अल्पसंख्यक मोर्चा जैसे प्रमुख मोर्चा, मीडिया विभाग, मीडिया संपर्क विभाग सहित अन्य विभागों व प्रकोष्ठ में प्रदेश, क्षेत्रीय, जिला और मंडल स्तर तक टीमों का गठन किया जाएगा। हाल ही पार्टी का पद छोड़कर पंचायत चुनाव लड़ने वाले पदाधिकारियों की जगह भी नए कार्यकर्ताओं की नियुक्तियां की जाएंगी। प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह के अनुसार सरकार और संगठन में सभी रिक्त पदों पर नियुक्तियां के बाद करीब एक लाख से अधिक कार्यकर्ताओं का समायोजन हो जाएगा।बात खाली पड़े तमाम प्रकोष्ठों, आयोगों और बोर्डों की कि जाए तो तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं को राज्य अल्पसंख्यक आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग सहित अन्य आयोगों, निगमों, बोर्डों व समितियों में नियुक्त किया जा सकता है। प्रमुख आयोगों में अध्यक्ष पदों पर नियुक्ति के लिए दावेदारों के नाम पर सरकार और संगठन के प्रमुख लोगों के बीच मंथन चल रहा है। उक्त पदों को इस तरह से भरा जाएगा, जिससे जातीय व क्षेत्रीय संतुलन का संदेश आम जन तक जाए। अपनी जाति-समाज में प्रभाव रखने वालों की इन पदों पर विशेष तौर पर नवाजा जाएगा।

उत्तर प्रदेश में भाजपा की सत्ता बन रहे यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यूपी मजबूत रहेगा तभी दिल्ली बच पाएगी। जब तक यूपी में बीजेपी हाशिये पर थी, तब तक दिल्ली में भी वह ठहर नहीं पा रही थी। यूपी बीजेपी के साथ मोदी-अमित शाह के लिए काफी महत्वपूर्ण है। यूपी में बीजेपी को नीचे से ऊपर तक पहुंचाने का श्रेय अमित शाह को ही जाता है। 2013 में जब उन्हें प्रभारी बनाकर भेजा गया था, तब यूपी में पार्टी के 50 से भी कम विधायक और 10 सांसद थे, गुटबाजी भी चरम पर थी। 2014 के चुनाव से पहले शाह ने ही यह सब खत्म किया। यूपी में गठबंधन का प्रयोग भी उनकी ही देन थी। बीजेपी के लिए फायदे का सौदा यह भी है कि यूपी में विपक्ष बिखरा हुआ है और इसके एकजुट होने की संभावनाएं इसलिए काफी कम हैं क्योंकि विपक्ष गठबंधन के सभी प्रयोग कर चुका है, लेकिन उसे सफलता हाथ नहीं लगी। न कांग्रेस-सपा और न ही बसपा-सपा गठबंधन को कामयाबी मिली थी।

गौरतलब है कि पंचायत चुनाव हो या फिर विधान सभा के उप-चुनाव में कई बीजेपी विधायकों के क्षेत्र में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था और जनता भी इन नेताओं से नाराज चल रही है। इनको टिकट दिया गया तो इनका चुनाव हारना तय है। लखनऊ में नब्ज टटोलने के बाद अब दिल्ली में मिशन यूपी 2022 का खाका खींचा जाएगा। इसमें पूरा जोर कोरोना महामाारी से हुए नुकसान की भरपाई पर रहेगा। इसके तहत मंत्रिमंडल में कुछ बदलाव के साथ विस्तार व अधिकारियों की चुनाव तक नए सिरे से तैनाती हो सकती है। संगठन में निचले स्तर पर व सरकार के कुछ मंत्रियों की भूमिका बदलने तथा नौकरशाही के कुछ प्रमुख चेहरों की काट-छांट तक ही समिति रखने का मुख्य आधार सत्ता विरोधी लहर को थामना ही होगा, लेकिन योगी के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होगी, क्योंकि आलाकमान को डर इस बात का भी है कि स्वच्छ छवि वाले योगी को लगा कि आलाकमान द्वारा उनको अपमानित किया जा रहा है तो योगी विद्रोही रूख भी अख्तियार कर सकते हैं।

दरअसल, पंचायत चुनाव के नतीजों ने भाजपा को बेचैन कर रखा है। प्रदेश की नौकरशाही को महत्व और नेताओं की अनदेखी को लेकर भाजपा कार्यकर्ताओं, सांसदों व विधायकों की शिकवा-शिकायतें शुरू से ही मुखर रही थीं। पर, कोरोना की दूसरी लहर के दौरान भाजपा के ही लोगों का व्यवस्था को लेकर सार्वजनिक रूप से सवाल खड़ा करना और इसी बीच पंचायत चुनाव के नतीजे भाजपा की उम्मीदों के अनुसार न आना, संघ से लेकर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक की चिंता का सबब बन गया है। भले ही संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले और भाजपा के बीएल संतोष के प्रदेश दौरे व लखनऊ प्रवास पूर्व निर्धारित थे, लेकिन दोनों ने अपने दौरे का एजेंडा बदल कर जिस तरह 2022 की चुनावी चुनौतियों के समाधान पर केंद्रित कर दिया उससे यूपी को लेकर बीजेपी आलाकमान की चिंता को समझा जा सकता है। लगभग दो दशक बाद पूर्ण बहुमत के साथ प्रदेश की सत्ता में आई भाजपा का शीर्ष नेतृत्व तथा संघ किसी भी स्थिति में प्रदेश को खोना नहीं चाहता है। उसे पता है कि यूपी हारने का मतलब क्या होता है? संतोष के दौरे के एजेंडे से भी यह साफ झलकता दिखा था। भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) बीएल संतोष के सामने अपनी पीड़ा रखने वालों में ज्यादातर मंत्री ऐसे थे जिनकी पहचान मुखर या असंतुष्ट के तौर पर है। अलबत्ता कुछ ऐसे मंत्रियों ने भी संतोष से मुलाकात की जिन्हें लेकर विवाद चल रहा है। संतोष के सामने असंतोष जाहिर करने वाले योगी सरकार के मंत्री कितना संतुष्ट हो पाते हैं यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन विवादित मंत्रियों की धड़कनें जरूर बढ़ी हुई हैं।

 

 

 

 

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